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सच की पाठशाला

- सुरेन्द्र बंसल -
हमारी शिक्षा से पाठशाला तो बरसों पहले गायब हो चुकी है। आज विकास का ढिंढोरा पीटते हुए हम शिक्षा के उस दौर में हैंं, जहां अपनी आंखें गंवा कर चश्मा खरीद रहे हैं। आज़ादी के बाद शिक्षा की चिंता में दो पीढिय़ां झोंकने के बावजूद हम हाथों से धूल ही झाड़ रहे हैंं। कुछ बड़े शिक्षण संस्थानों को अक्सर शिक्षा की चिंता होती रहती है, जिनमें नई तालीम से लेकर कृष्णमूर्ति फाउंडेशन की ऋषि वैली तथा अज़ीम प्रेम जी के शिक्षण संस्थान भी शामिल हैं। फिर एन.सी.ई.आई.आर.टी., यू.जी.सी. जैसे बड़े स्काईलैब टाईप प्रयोगों से भी कोई नया प्रयोग, नया चिंतन, नई दिशा जैसा निकलता नहीं दिखा। उल्टे संसार के तेज़ रफ्तारी जूतों में पैर फंसाने की होड़ में हम अपनी संस्कृति, परम्पराएं,लोकजीवन, लोकशिक्षण को मूर्खताओं की श्रेणी में रखते चले गए। प्रगतिशीलता की लाल जिल्दों वाली किताबों से देश गायब होने लगा। सरकारी स्कूल तो सरकारी फाइलों से भी मिटने लगे। शिक्षा मंत्रालय कभी किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ने अपने पास नहीं रखा। परिणामत: पब्लिक स्कूलों पर लीडरों, डीलरों का कब्ज़ा बढ़ता गया और ऐसा वातावरण बना कि क्या मजाल कोई साधारणजन इन स्कूलों के पास भी फटक सके।
तमाम परपराएं इन तथाकथित पब्लिक स्कूलों के दरवाज़ों पर ही रोक दी गईं। लेकिन इतिहास गवाह है कि आंधियां कैसी भी हों, कुछ दीये जलते रहते हैं। ऐसे ही धूलधूसरित विकास और प्रगतिशीलता की आंधियों के बीच पंजाब के गुरदासपुर जिले का बाबा आया सिंह रियाडक़ी कॉलेज दीये की मानिन्द टिमटिमा रहा है। यह कॉलेज सन् 1925 के गुलामी के दौर से लेकर आज तक न केवल टिका रहा बल्कि अपने दृढ़ सकंल्प के कारण धीरे-धीरे मिसाल बनता चला गया। शिक्षा जगत के तमाम कड़वे अनुभवों भरे दौर में इस मीठे संस्थान में सेवा, सुमिरन, सहयोग, सादगी, शुचिता, ईमानदारी, सभी किरत (कर्म) तथा परोपकार का व्यापहारिक पाठ पढ़ाया जाता है। इसकी स्थापना रियाडकी क्षेत्र के परोपकारी संत बाबा आया सिंह जी ने 1925 में पुत्री पाठशाला के रूप में की थी। उन्होंंने इसकी शुरुआत गुरुबाणी के ‘‘गुरुमुख पर उपकार उमाहा’ यानी जो गुरु का सच्चा सेवक है, वह सामाजिक काम भी बड़े चाव से करता है, जैसे महावाक्य से की। आया सिंह जी अपने जीवन का अंतिम अध्याय बंद होने तक इसी महावाक्य को पगडंडी मान कर चलते रहे। आया सिंह जी के जाने के बाद 1975 में श्री स्वर्ण सिंह विर्क मात्र 14 लड़कियों को लेकर इस विद्यालय की पुर्नस्थापना में जुटे। किस्सा आपातकाल का है। जिस वर्ष तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया वह वर्ष ‘महिला वर्ष’ के रूप में मनाया जा रहा था। देश भर में महिलाओं पर केन्द्रित कार्यक्रम हो रहे थे।
पंजाब में भी ऐसे ही किसी कार्यक्रम में स्वर्ण सिंह विर्क एक श्रोता के नाते शामिल थे। मंच से वक्ता महिलाओं के उत्थान के लिए तरह-तरह के दावे पेश कर रहे थे। स्वर्ण सिंह जी को नेताई ढोल बर्दाश्त नहीं हुए। उन्होंने भरी सभा में उठकर कहा, ‘आप नाहक झूठ बोल रहे हंंैं। हम जानते हैं कि आप कुछ नहीं करेंगे।’ मंच से किसी ने पलट कर कहा, ‘तो जनाब आप ही करके दिखाएं’ बस यही पलटवार स्वर्ण सिंह जी के लिए जीवन मरण का प्रश्न बन गया। उन्होंने उसी घड़ी पाठशाला बनाने की ठान ली। उन दिनो लोग बच्चियो को पढ़ाने तक मे रुचि नही रखते थे, स्कूल भेजना तो दूर की बात। स्वर्ण सिंह जी गांव-गांव लगभग मुनादी वालो की तरह घूमे। बच्चियो को पढ़ाना क्यो ज़रुरी है इस पर घंटो लोगों से बात करते। अनेक गांवों की धूल-मिट्टी फांकने के बाद मात्र कुछ परिवार अपनी लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए तैयार हुए।
स्वर्ण सिंह जी ने इन 14 बच्चियो के साथ एक निशुल्क पाठशाला का शुभारंभ किया। लेकिन 20 परिवारों ने फिर भी अपनी बच्चियों को स्कूल जाने से रोक लिया। लेकिन स्वर्ण सिंह जी अब प्रत्येक आंधी में अड़ोल दीया बन चुके थे। उन्होंने अकेले उन 14 बच्चियों को पढ़ाना शुरु किया। बोर्ड परीक्षा में ये सभी बच्चियां प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुईं। बस कारवां बनने लगा। आज इस शाला में लगभग 4000 विद्यार्थी पढ़ते हैं, जिनमें 2500 लड़कियां हैं। बिना फीस से शुरु हुए स्कूल में अधिकतम सालाना टयूशन फीस मात्र 1,000 रुपए है और हॉस्टल की सालाना फीस 7,500 रुपए मात्र है। स्वर्ण सिंह जी और उनके परिवार के अथक परिश्रम से स्कूल की व्यवस्था कुछ ऐसी बनी, जहां पैसों की मामूली ज़रुरत पड़ती है। पढ़ाई करने वाले और प्रशासन दोनों आत्मनिर्भर हैं। इस कॉलेज में सब काम छात्राएं ही करती हैं। शिक्षक यहां नाम मात्र ही हैं। छात्राएं ही शिक्षक हैं। सभी सीनियर विद्यार्थी अपने से निचली कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं। यह व्यवस्था ऊपर से नीचे तक नियमित तौर पर चलती है। पढ़ाई में कोई कमी न छूट पाए इसके लिए ‘ईच वन टीच वन’ का प्रावधान है। पढ़ाई में कमज़ोर किसी बच्चे को मूर्ख नहीं माना जाता। संस्थान के अन्य काम भी विद्यार्थियों के ही जि़म्मे हैं। हॉस्टल के सभी बच्चों का तीनों समय का भोजन छात्राएं ही पकाती हैं। पूरे कॉलेज में लड़कियों के 12 ग्रुप हैंं। प्रत्येक ग्रुप की बारी 2 महीने बाद आती है। कौन सा ग्रुप कब भोजन पकाएगा, यह पहले से तय है। यह सब काम छात्राएं मिलकर तय करती हैं।
करीब 15 एकड़ में फैले कॉलेज मेंं 10 एकड़ भूमि में खेती होती है। ज़रूरत का अनाज, सब्जियां और दालें विद्यार्थी खुद ही उगा लेते हैं। कॉलेज की ऊर्जा ज़रुरतों को कॉलेज का सोलर पावर स्टेशन पूरा करता है। ईंधन के मामले में भी कॉलेज आत्म निर्भर है। इसके निजी गोबर गैस प्लांट से पूरे कॉलेज का खाना तैयार होता है। भोजन पकाने के लिए सूखी घास का प्रयोग होता है। प्रतिदिन सवेरे घास काटने की 45 मिनट की सामूहिक कक्षा होती है। मात्र इतना ही नहीं,शाला के पास अपनी आटा चक्की, मसाला चक्की, तेल पिराई और गन्ने का रस निकालने वाली मशीन भी हैं। पूरे कॉलेज में न कोई नौकर, न चपरासी, न धोबी, न चौकीदार। सभी कामों के साथ छात्राएं हॉस्टल की वार्डन का जि़म्मा भी संभालती हैं। समय-समय पर कॉलेज में होने वाले निर्माण कार्यों में लड़कियां मज़दूरी भी करती हैं। कॉलेज प्रांगण में ही एक गोदाम में ज़रूरत की तमाम चीज़ें संभाल कर रख दी जाती हैं। प्रति वर्ष कॉलेज साल भर के कबाड क़ी बिक्री करके दो लाख रुपए के करीब कमा लेता है।
विद्यार्थियों को निरन्तर यह शिक्षा दी जाती है कि किसी भी चीज़ को बेकार न मानें। जहां तक संभव हो, उसका सदुपयोग करें। कॉलेज की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था भी लड़कियां ही संभालती हैं। कॉलेज के भीतर बनी स्टूडेंट कमेटी ही सब फैसले लेती है। सभी छात्रों के बीच चुनाव करके ही पांच सदस्सीय कमेटी चुनी जाती है। फिर यह पांच सदस्सीय कमेटी 22 अलग-अलग समितियां चुनते हैं, जिनमें दाखिली कमेटी, अनुशासन कमेटी, सफाई कमेटी आदि शामिल हैं। कॉलेज की पूरी फीस का पैसा और पूरा हिसाब भी छात्राएं ही संभालती हैं।
कॉलेज के प्रिंसीपल विर्क साहिब की भूमिका नाम मात्र ही है। पूरा संस्थान छात्राएं बेहद उत्साह के साथ स्वयं ही चलाती हैं। एक बार गुरदासपुर के डी.सी. स्कूल देखने आए, उनको स्कूल बेहद पसन्द आया। उन्होंने प्रिंसीपल से पूछा कि हम आपके लिए क्या कर सकते हैं? प्रिंसीपल साहिब ने दो-चार मांगों की पर्ची उन्हे पकड़ा दी। कॉलेज की स्टूडेट कमेटी को जैसे ही इस बात का पता चला तो उन्होंने प्रिंसीपल साहिब को पूरी नाराज़गी के साथ जुर्माना लगाया और चेतावनी भी दी कि भविष्य में किसी भी नेता या अधिकारी के आगे हाथ न पसारा जाए। शाला का पूरा वातावरण ऐसा बनाया गया कि उसमें सभी धर्मों की अच्छी बातों का सम्मान हो। देश के किसी भी कोने से कोई भी बच्चा यहां आकर पढ़ सकता है। स्कूल की अन्य विशेषताओं सहित एक विशेषता यह भी है कि यहां का कोई भी बच्चा न तो झूठ बोलता है और न ही नकल करता है। नकल सिद्ध करने वाले को 21,000 रुपए के नकद पुरस्कार का ऐलान बहुत पहले हो चुका है। इन सबके बीच संस्थान के 70 प्रतिशत बच्चे प्रथम श्रेणी में उतीर्ण होते हैं। पंजाब पर आए संकट के बादलो का असर शाला पर भी होने लगा था। लेकिन स्वर्ण सिंह जी उस दौर में भी कतई विचलित नहीं हुए। वे आसपास के गांवों से आतंक प्रभावित परिवारों की अनाथ बच्चियों को स्कूल में आश्रय देते रहे। वे लगभग 150 बच्चियां लेकर आए। उन्हें पढ़ा-लिखाकर मन से मज़बूत बनाया। कईयों की बाद में शादी भी की गई। स्वर्ण सिंह जी का पूरा परिवार शाला परिसर में ही रहता है तथा 24 घंटे कॉलेज के कामों में ही व्यस्त रहता है। इस संकल्पवान संस्था ने कभी सरकारी अथवा गैर सरकारी अनुदान की मांग नहीं की। निस्संदेह बाबा आया सिंह रियाडक़ी कॉलेज गुरदासपुर मे ‘पाठ’ नहीं पढ़़ाया जाता बल्कि ‘बच्चों’ को पढ़ाया जाता है। यहां सभी बच्चे ‘हम’ की शिक्षा ले रहे है ‘मै’ की नहीं, जिस दौर में पंजाब कैंसर, नशे और हरित क्रांति के संताप के दौर से गुजर रहा हो, ऐसे मेंयह शाला निपट सूचना की बजाय सोचने की शिक्षा दे रही है। ऐसी संकल्पशील शाला के बानी स्वर्ण सिंह को अहमद फराज का शेर समर्पित करना चाहता हूं-
वो हीलागर हैं,जो मजबूरियां शुमार करें
चराग हमने जलाए हवा के होते हुए।

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