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हम भी हैं दौड़ में...

- हेमलता चतुर्वेदी -
पिछले कुछ वर्षों से दसवीं और बारहवीं बोर्ड के परीक्षा परिणाम चौंकाने वाले आ रहे हैं। कई छात्र करीब-करीब शत-प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण हो रहे हैं। इस साल का बोर्ड परीक्षा परिणाम भी ऐसा ही रहा। सीबीएसई हो या राज्यों के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, हर परिणाम में छात्रों का एक वर्ग 80 से 100 प्रतिशत के ग्रुप वाला हो गया है तो एक 80 और उससे कम प्रतिशत पाने वाले छात्रों का। सर्वाधिक संख्या इसी ग्रुप के विद्यार्थियों की है। वे ही सबसे ज्यादा परेशान छात्र भी हैं। कारण, दसवीं के परिणाम के आधार पर 80 प्रतिशत या उससे अधिक अंक प्राप्त छात्रों को मनपसंद स्कूल व विषय आसानी से मिल जा रहे हैं, बाकियों को चाहे-अनचाहे साधारण स्कूल तथा विषय चुनने पड़ते हैं। इसी प्रकार बारहवीं कक्षा में भी ज्यादा से ज्यादा 100 प्रतिशत और कम से कम 90 प्रतिशत वालों की तो पौ बारह है। क्योंकि उन्हें उनके मनचाहे शीर्ष कॉलेजों में से किसी न किसी एक में दाखिला मिल ही जाता है। सामान्यत: इनकी कट ऑफ ही करीब 90 प्रतिशत रहती है। बाकी 90 प्रतिशत से कम अंक वालों को फिर एक बार समझौता करना पड़ता है। उनको कोई अन्य विकल्प चुनना पड़ता है, जो उनकी सफलता सुनिश्चित कर सके।
ऐसे में देखा जा रहा है कि देश के भविष्य की बुनियाद बनने वाली पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग (80 प्रतिशत से कम अंक लाने वाला) पढऩे के दौर में ही संघर्ष की ऐसी सुरंग में धकेला जा चुका है, जिसके भीतर घुप्प अंधेरा है और रोशनी तक पहुंचने का रास्ता काफी लम्बा। क्या इसी प्रकार हम देश का निर्माण करेंगे ? अगर ‘सबका साथ,सबका विकास’ को सार्थक करना है तो इस गंभीर पक्ष की ओर ध्यान देना अत्यधिक आवश्यक है। यह जो ‘मीडियॉकर’ किशोर और युवा वर्ग तैयार हो रहा है, इसे अच्छी संभावनाएं नहीं दिखीं तो आगे चल कर इसका नाकारा हो जाना तय है। फिर देश निर्माण में चाह कर भी कोई भूमिका नहीं निभा पाएगा। क्योंकि हर नौकरी के लिए सभी वर्ग के अभ्यर्थी आवेदन कर रहे हैं। जाहिर है नियोक्ता सर्वश्रेष्ठ को प्राथमिकता देगा। इसलिए यह मध्यम अंकों वाले छात्र हर जगह से निराश हो कर बैठ जाते हैं। न तो ये अपने स्तर से निम्रतर विकल्प चुन सकते हैं और न इन्हें बेहतर विकल्प आसानी से मिलता है। गंभीर समस्या बन रहे इस वर्ग के लिए पृथक नीति निर्माण की आवश्यकता है। इस संदर्भ में हाल ही आया मद्रास हाईकोर्ट का एक फैसला अनुकरणीय है। कोर्ट ने एक युवती की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि ऊंची डिग्री वाले व्यक्ति छोटे पदों के लिए आवेदन नहीं कर सकते हैं। चेन्नई मेट्रो रेल लिमिटेड ने आर लक्ष्मी प्रभा का आवेदन इसलिए खारिज कर दिया था,क्योंकि पद के लिए आवश्यक योग्यता इंजीनियरिंग में डिप्लोमा मात्र थी और लक्ष्मी बीई थी। इसके खिलाफ ही लक्ष्मी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जहां उसकी अपील खारिज हो गई।

बढ़ते अंक औसत छात्रों की मुसीबत
हर साल प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही है तो उनके अंक प्रतिशत की सीमा भी। इस वर्ष करीब 31 लाख विद्यार्थी सीबीएसई परीक्षा में शामिल हुए और परीक्षा परिणाम 83.4 प्रतिशत रहा। इसमें भी व्यक्तिगत अंक प्रतिशत साल दर साल नई ऊंचाईयां छू रहा है। इस वर्ष 95 प्रतिशत से अधिक अंक लाने वाले विद्यार्थियों की संख्या 17,639 रही, जो परीक्षा देने वाले कुल छात्रों की संख्या का 1.67 प्रतिशत है। साथ ही 75 प्रतिशत से अधिक अंक लाने वाले छात्रों की संख्या अनुमानित तौर पर 40 से 50 प्रतिशत रही। छात्रों के निजी अंक प्रतिशत बढऩे के बहुत से कारण हो सकते हैं।
मोटे तौर पर तो एक ही कारण दिखाई देता है- बढ़ती प्रतिस्पदर्धा के चलते विद्यार्थी कड़ी मेहनत करते हैं। इसी का नतीजा अंतिम परिणाम में आने वाले बढ़े प्रतिशत के रूप में दिखाई देता है। दूसरा संभावित कारण है-कॉपी चैकिंग के दौरान अंक देने में बरती जा रही उदारता। इस संबंध में नाम न छापने की शर्त पर केंद्रीय विद्यालय के एक पूर्व प्राचार्य ने चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 में ही शिक्षा विभाग ने एक निर्देश जारी किया था कि हिन्दी की कॉपी जॉंचते समय वर्तनी की अशुद्धि के नंबर न काटे जाएं। ऐसे में हिन्दी विषय में भी छात्रों का पा्रप्तांक प्रतिशत बढग़या। ऐसे ही कुछ अन्य कारणों का विश्लेषण किया जा सकता है। कारण जो भी हों, सीबीएसई बारहवीं कक्षा के परीक्षा परिणामों में 95 प्रतिशत और उससे अधिक अंक आना सामान्य बात हो गई है। हालांकि यह गलत नहीं है लेकिन इसका एक साइड इफैक्ट इस रूप में सामने आ रहा है कि प्रतिष्ठित कॉलेजों की सीटें इन्हीं शीर्ष विद्यार्थियों के दाखिले से भर जाती हैं और दूसरे वर्ग वाले औसत छात्र मुंह देखते रह जाते हैं।
बारहवीं नतीजों का महत्व
चूंकि बारहवीं के बाद शैक्षणिक स्तर स्कूली से एक कदम बढक़र कॉलेज शिक्षा का हो जाता है। इसलिए स्कूली पढाई के इस अंतिम चरण की रिपोर्ट खास महत्व रखती है। इसी के आधार पर देश-विदेश के कॉलेजों में दाखिले के मार्ग खुलते हैं। इसके अलावा कई बड़ी कम्पनियां नियुक्ति के लिए तय मापदंडों में बारहवीं कक्षा के अंकों को अलग महत्व देती हैं। कुछ सरकारी नौकरियां बारहवीं पास अभ्यर्थियों के लिए होती हैं, इनके लिए बारहवीं में प्राप्त अंकों को आवेदन के लिए आवश्यक मापदंड माना जाता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कक्षा 12 के अंकों का महत्व आपके करियर विकल्प के अनुसार बढ़ जाता है। साधारण सा गणित है कि उच्चतर अंक यानी उच्च करियर अवसर। परंतु दिया तले अंधेरा वाली बात यहां एक बार फिर सामने आती है कि श्रेष्ठतम की चकाचौंध में उससे थोड़ा ही कमतर रहने वाला किशोर-युवा वर्ग हर जगह हताश हो रहा है, क्योंकि श्रेष्ठ विद्यार्थियों की संख्या जो बढ़ती जा रही है। जहां इतिहास और पेंटिंग जैसे विषयों में शत प्रतिशत अंक आने लगे हों, वहां कुल स्कोर प्रतिशत बढऩा अचरज की बात नहीं रही।
80 प्रतिशत अंक वाले क्या करें?
कहने को आजकल किसी भी क्षेत्र में विकल्पों की कोई कमी नहीं है। इन ‘मीडियॉकर’ विद्यार्थियों के सामने सरकारी नौकरी से लेकर स्व रोजगार, व्यापार और स्टार्ट अप जैसी कई संभावनाएं हैं। परन्तु क्या ये सभी इसमें सफल हो पाते हैं? कुछेक को छोड़ कर ज्यादातर नहीं! ऐसे में क्यों नहीं सरकार इस वर्ग पर अतिरिक्त ध्यान दे कर सिर्फ इन्हीं छात्रों के लिए ऐसे विकल्प गढ़े कि इन्हें भी समाज में सम्मानजनक स्थान मिले। क्योंकि इसी दूसरी पंक्ति के लोग नौकरी के अभाव में कई बार या तो छोटे काम में संतोष कर लेते हैं या फिर हताश बेरोजगारों की जमात में शामिल हो जाते हैं।

बदलाव के संभावित उपाय
जहां तक नौकरियों का सवाल है, सरकारी नौकरी की विज्ञप्ति आते ही उक्त दोनों ही वर्ग के अभ्यर्थी तुरंत आवेदन करते हैं। तभी तो निम्र ग्रेड तक की सरकारी नौकरी के लिए उच्च शिक्षित और पीएचडी डिग्रीधारियों तक के आवेदन आने लगे हैं। ऐसी विषमता होने से भर्ती प्रक्रिया और उसके बाद चयनित अभ्यर्थियों के बारे में सवाल उठने लाजिमी हैं। किसी को अधिक योग्य होने के बावजूद निम्र ग्रेड का काम करने में कोई आपत्ति नहीं है, तभी कम योग्य यानी कि ‘मीडियॉकर’ वर्ग के विद्यार्थी को इसी वजह से उसके लायक काम नहीं मिल पा रहा। कुछ उपायों से ये समस्या दूर की जा सकती है। जैसे-
- भर्ती निकालते वक्त कैडर के अनुसार पात्रता मापदंड निर्धारित किए जाएं।
- लिपिक पद है तो 80 प्रतिशत से अधिक अंक वाले आवेदन न करें।
- चतुर्थ श्रेणी का पद है तो 50 प्रतिशत से अधिक अंक वाले आवेदन न करें।
- उच्च एवं उच्चतर पदों के लिए 60 से 100 प्रतिशत तक अंक वाले सभी अभ्यर्थी आवेदन कर सकते हैं।
ये केवल कुछ सुझाव हैं। सभी पहलुओं के अनुसार संभव हो तो प्रयोग करके देखा जा सकता है। शायद सामाजिक समानता की पहल यहीं से हो। वैदिक काल में भी तो वर्ण व्यवस्था कमोबेश रोजगार से ही जुड़ी थी। अब समय बदलने के साथ-साथ वर्ण व्यवस्था बदली है तो समाजिक अवस्था का बदलना भी जरूरी है। इस ओर विचार करने की आवश्यकता है।
अन्य उपायों की जहां तक बात है तो वे सब हम वर्षों से जानते हैं। केंद्रीय व राज्य प्रशासनिक सेवाओं में भर्ती के लिए सरकारी व्यवस्था के तहत उक्त दोनों ही वर्ग के अभ्यर्थी प्रयास करते हैं। इन सेवाओं में चयन प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के आधार पर होता है। इसलिए यहां बारहवीं कक्षा के अंक प्रतिशत प्रत्यक्ष तौर पर तो कोई मायने नहीं रखते। किंतु इन परीक्षाओं के लिए प्रयास करने वाला अभ्यर्थी स्वाभाविक तौर पर वही होगा, जो मेधावी होगा। हालांकि आरक्षण के जरिये वर्ण व्यवस्था अब भी कुछ हद तक चल ही रही है, बस पैमाने बदल गए हैं।
बात चाहे सरकारी क्षेत्र की हो या सार्वजनिक उपक्रमों की, एक बार सामाजिक समानता के नजरिये से कर्मचारी-अधिकारी भर्ती के मानदंड नए सिरे से तय किए जाएं तो हो सकता है अपेक्षित स्तरीय नौकरी न मिल पाने की कुंठा से ग्रस्त नौजवानों को उम्मीद की नई किरण नजर आए।


जहां चाह, वहां राह
रबाहवीं कक्षा के बोर्ड के परिणामों में आए अंक छात्र का भविष्य गढऩे का आधार होते हैं। अंकों के आधार पर स्पष्ट हो जाता है कि छात्र को उसकी अपनी ही स्ट्रीम में श्रेष्ठ कॉलेजों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा या नहीं?
ऐसे में एक बार फिर श्रेष्ठतम प्राप्तांकों से कुछ ही अंक पीछे रह गए या फिर औसत अंक प्राप्त ‘मीडियॉकर’ छात्रों को अपने अनुसार करियर विकल्प चुनना होता है। यही वह समय होता है, जहां से आपकी आजीविका का रास्ता तय होता है। श्रेष्ठ कॉलेज और कोर्स में एडमिशन न मिलने पर निराश होने के बजाय उम्मीद का दामन थाम कर आगे बढऩा ही सफलता की ओर उठाया गया पहला कदम होता है। ऐसे बहुत से पाठ्यक्रम हैं, जिन्हें चुनकर औसत युवा अच्छा करियर बना सकते हैं।
फैशन डिजाइनिंग
जिन लोगों को आकर्षक व स्टाइलिश दिखने का हुनर स्वाभाविक तौर पर आता हो, फैशन से जुड़े नए-नए ट्रेंड्स से वाकिफ हों और नए डिजाइनर कपड़े आपको लुभाते हों तो आपके लिए फैशन डिजाइनिंग सर्वोत्तम विकल्प है। इसमें प्रवेश के लिए मात्र 45 प्रतिशत अंक चाहिए होते हैं। आज कपड़ा उद्योग केवल निर्माण और खपत तक ही नहीं रह गया है,बल्कि इसका दायरा बढ़ कर नवाचार को शामिल करते हुए फैशन उद्योग का विस्तार प्राप्त कर चुका है, जहां ढेरों अवसर और संभावनाएं हैं, जो नित नए रंग-रूप में खिल कर सामने आती हैं। फैशन डिजाइनिंग में भी तीन धाराएं शामिल हैं। ये है-वस्त्र डिजाइनिंग, लैदर डिजाइनिंग, एसेसरीज और ज्वैलरी डिजाइनिंग आदि। इसके लिए कुछ प्रमुख कॉलेज हैं-इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टैक्नोलॉजी,नई दिल्ली,एपीजे इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन,नई दिल्ली, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन पालडी, अहमदाबाद, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन डिजाइन, चंडीगढ़।

फोटोग्राफी
फोटोग्राफी उन लोगों के लिए बेहतर करियर विकल्प है, जिन्हें अपने चारों ओर खूबसूरती दिखाई देती है और जो प्रकृति के साथ-साथ तकनीकी से भी खास लगाव रखते हैं। कुछ संस्थान पत्राचार के जरिये भी फोटोग्राफी स्नातक कोर्स में प्रवेश देते हैं। एफटीआईआई,पुणे में सिनेमैटोग्राफी का कोर्स करवाया जाता है। सिनेमैटोग्राफी पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए सामान्यतया कोई विशिष्ट अकादमिक स्कोर की न्यूनतम अनिवार्यता नहीं होती। इन दिनों कई स्कूल बारहवीं कक्षा में फोटोग्राफी को व्यावसायिक पाठ्यक्रम के तौर पर शामिल कर रहे हैं। फोटोग्रफी में डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स करने के लिए न्यूनतम अनिवार्य योग्यता है-बारहवीं पास होना। तेजी से लोकप्रिय हो रहे फोटोग्राफी को करियर बनाने के लिए उपलब्ध संस्थान हैं-एफटीआईआई, पुणे, एमसीआरसी जामिया यूनिवर्सिटी,नई दिल्ली,यूनिवर्सिटी ऑफ डेल्ही, नई दिल्ली, वाईएमसीए सेंटर फॉर मास मीडिया,नई दिल्ली आदि।

एक्टिंग,डांस,म्यूजिक
आजकल मनोरंजन उद्योग खूब फलफूल रहा है। इसलिए इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक युवाओं के लिए ढेरों अवसर मौजूद हैं। वे बाकायदा कोर्स करके अभिनय, संगीत और नृत्य का प्रशिक्षण प्राप्त कर यह कौशल हासिल कर सकते हैं। स्वभाव से धैर्यवान लोग जिन्हें कला क्षेत्र में खास रूचि है, वह भी परफॉर्मिंग आर्ट्स में! उन लोगों के लिए यह बेहतरीन विकल्प है।

एयर हॉस्टेस या फ्लाइट स्टुअर्ड्स
आकर्षक व्यक्तित्व के धनी और परस्पर संवाद कायम करने में पारंगत लोगों के लिए यह अच्छा करियर माना जाता है। फ्लाइट क्रू का यह कोर्स बारहवीं पास करने के बाद होता है। विमान परिचारिका या फ्लाइट स्टुअर्ड बनने के लिए आवश्यक अनिवार्य मापदंड हैं-जिम्मेदारी का अहसास, अच्छा व्यक्तित्व, टीम भावना और हंसमुख स्वभाव। देश के कई संस्थान यह पाठ्यक्रम करवाते हैं।

खेल जगत
जिन विद्यार्थियों की खेल विशेष में रूचि है और उसी में करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए ऐसी कई अकादमियों के विकल्प मौजूद हैं, जहां वे संबंधित खेल का व्यावसायिक प्रशिक्षण ले सकें। साथ में वे पत्राचार के माध्यम से अपना नियमित स्नातक कोर्स भी जारी रख सकते हैं। इसके अलावा विभिन्न विश्वविद्यालयों में खेल कोटे से भी प्रवेश ले सकते हैं। एक जमाना था जब खेल जगत को नौकरी देने वाला या करियर विकल्प का क्षेत्र नहीं माना जाता था लेकिन अब खेल जगत में सीधे खिलाड़ी बनने के अलावा भी बहुत से विकल्प उपलब्ध हैं, जैसे खेल प्रबंधन, खेल संबंधी दवा विभाग, खेल पत्रकारिता और एडवेंचर स्पोर्ट्स आदि। ये सभी आजकल नौकरियों के नए विकल्प हैं। खेलों से सन्यास लेने के बाद खिलाड़ी खेल पत्रकारिता, खेल सामग्री निर्माण या मार्केटिंग के व्यवसाय से जुड़ सकते हैं या फिर कमेंटेटर भी बन जाते हैं।

तकनीशियन
तकनीकी अधिकारी या कर्मचारी बनने के लिए आईटीआई कोर्स करवाने वाले आईटीआई संस्थानों में प्रवेश लिया जा सकता है। आईटीआई संस्थानों का उद्देश्य उद्योग जगत को तकनीकी रूप से सक्षम मानव संसाधन उपलब्ध करवाना है। आईटीआई डिग्री हासिल करने के बाद एआईटीटी(ऑल इंडिया ट्रेड टैस्ट) और एनसीवीटी (नेशनल काउन्सिल फॉर वोकेशनल ट्रेनिंग) कर सकते हैं। एआईटीटी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एनसीवीटी द्वारा नेशनल ट्रेड सर्टिफिकेट(एनटीसी) प्रमाण पत्र दिया जाता है।
आईटीआई पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद छात्र करियर बनाने के उद्देश्य से अपनी पसंद के किसी भी उद्योग में व्यावहारिक प्रशिक्षण ले सकते हैं। ज्यादातर आईटीआई द्वारा जो कोर्स करवाए जाते हैं, वे हैं-इलैक्ट्रिशियन, फिटर, प्लम्बर,डीजल मैकेनिक्स, कम्प्यूटर ऑपरेटर, प्रोग्रामिंग सहायक, इलैक्ट्रिकल मैकेनिक्स, सूचना प्रोद्यौगिकी और कम्प्यूटर हार्डवेयर, रैफ्रिजरेशन और एयर कंडीशन तकनीकी कोर्स इत्यादि।

एनिमेशन और वैबडिजाइनिंग
अगर आप कम्प्यूटर संचालन में पूरी तरह दक्ष हैं और उस पर काम करना आपकी पहली पसंद है तो एनिमेशन या वैब डिजाइनिंग का करियर आपको रास आएगा। इसके लिए आप पत्राचार द्वारा स्नातक का कोर्स करते हुए नियमित विद्यार्थी के तौर पर एनिमेशन अथवा वैब डिजइन का कोर्स कर सकते हैं।

सेल्स-मार्केटिंग
सेल्स और मार्केटिंग ऐसे करियर विकल्प हैं, जो हर किसी को मौका देते हैं। अब अगर किसी को मार्केटिंग में रूचि हो तो उसके लिए यहां पैर जमाना आसान हो जाता है। कॉमर्स के छात्रों को इस क्षेत्र में प्राथमिकता दी जाती है।

विदेशी भाषा विशेषज्ञ
विभिन्न भाषाओं को सीखने की क्षमता और रूचि रखने वाले अभ्यर्थियों को विदेशों में स्थित दूतावासों में टूर गाइड, दुभषिया या जन सम्पर्क अधिकारी बनने का अवसर मिल सकता है।
भाषा संबंधी कोर्स करवाने वाले कुछ संस्थान हैं-
ईवैंट मैनेजमेंट
इन दिनों इवैंट मैनेजमेंट का क्षेत्र काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। कुछ विश्वविद्यालय इसके लिए पृथक पाठ्यक्रम भी संचालित कर रहे हैं। इस पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए अनिवार्य योग्यता है- जनसम्पर्क में दक्ष एमबीए डिग्रीधारी जो काम के अनुसार समय में कार्य करने के लिए तत्पर रहें।

साउंड इंजीनियरिंग
यह एक ऐसा फील्ड है, जिसके बारे में लोग ज्यादा बातचीत तो नहीं करते लेकिन जिन लोगों को फिल्म और टीवी सीरीयल में पाश्र्व संगीत पहले ही सुनाई दे जाता हो, यानी जो लोग इसमें रूचि रखते हैं, उनके लिए साउंड इंजीनियरिंग का कोर्स उपलब्ध है। यह तीन से छह माह का सर्टिफिकेट कोर्स होता है। जो छात्र यह कोर्स करना चाहते हैं, वे अपने स्नातक पाठ्यक्रम की पढ़ाई के साथ ही एफटीआईआई,पुणे में प्रवेश लेकर साउंड इंजीनियरिंग में अधि स्नातक की डिग्री ले सकते हैं।

यात्रा को बनाएं करियर
आपको यात्रा करना पसंद है और आप एक खुशमिजाज इंसान हैं तो आप यात्रा एवं पर्यटन क्षेत्र को करियर के रूप में चुन सकते हैं। अगर आप बातचीत करने की कला में माहिर हैं तो ट्रैवल और टूरिज्म में करियर बना सकते हैं। परिवहन, संप्रेषण और यात्रा। ये तीन क्षेत्र देश के लिए विदेशी मुद्रा विनिमय का प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। अत: इस क्षेत्र में दर्जनों करियर विकल्प मौजूद हैं। जिन युवाओं को घूमने का शौक है, उनके लिए यह बेहतरीन करियर साबित हो सकता है। (प्रेसवाणी डेस्क)
आर जे या डी जे
जिन लोगों को संगीत से खास लगाव है। साथ ही प्रस्तुतिकरण काफी अच्छा है, उनके लिए आर जे या डी जे श्रेष्ठ करियर विकल्प है। जो लोग कुछ हटकर करना चाहते हैं, उन्हें आर जे या डी जे बनना रास आ सकता है। हालांकि डीजे को पहले भारत में बहुत अच्छा करियर नहीं माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे समाज में अवधारणएं बदली हैं। अब युवा इस क्षेत्र में करियर बना कर अच्छी कमाई कर रहे हैं।
पुराने जमाने में ग्रामोफोन रिकॉर्डस को डिस्क कहा जाता था, वहीं से यह नाम आया है-डीजे यानी डिस्क जॉकी। डीजे का काम किसी कार्यक्रम या रेडियो के लिए म्युजिक बनाना होता है। इसके लिए वे बहुत से उपकरण, जैसे टर्न टेबल, मिक्सर, ग्राफिक इक्वैलाइजर आदि का इस्तेमाल करते हैं। डीजे बनने के लिए अनिवार्य योग्यता आपके भीतर संगीत को लेकर पैशन होना चाहिए और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता स्नातक है ही।

कार्टूनिस्ट
कार्टून बनाना रचनात्मकता का कार्य है। जिन छात्रों को ड्रॉइंग और स्कैचिंग का शौक है और समसामयिक विषयों की समझ है, वे अच्छे कार्टूनिस्ट बन सकते हैं। इसके लिए न्यूनतम अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता औपचारिक तौर पर आवश्यक नहीं है, बस आपको गंभीर विषयों को हास्य पुट देते हुए समाज तक अपने कार्टून से संदेश पहुंचाना होता है।

डाटा एंट्री ऑपरेटर
कम्प्यूटर कोर्स करके टैली सीखी जा सकती है। साथ ही स्नातक पाठ्यक्रम की पढ़ाई भी जारी रखी जा सकती है। इस प्रकार डाटा एंट्री ऑपरेटर भी आसान करियर विकल्प है, जो इन दिनों काफी डिमांड में है।

उक्त विकल्पों में से कुछ नैसर्गिक गुण आधारित हैं। यदि आपमें खेल, कला, संगीत, अभिनय का जन्मजात हुनर है तो सफलता आपके कदम चूमेगी। कम दक्षता, किंतु पूरा रुझान व समर्पण भी ‘जहां चाह, वहां राह’ की उक्ति को सार्थक करते हुए औसत दर्जे के युवाओं के लिए प्रगति के द्वार खोल देंगे।

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