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नौकरी की आस, खाली हुई जेब

— आभा शर्मा —
अब देश में शिक्षा और नौकरी का संबंध टूटने लगा है। आम भारतीयों में शुरू से ही व्यवसाय की बजाय नौकरी को जीवनयापन का बेहतर और अधिक सुरक्षित जरिया माना जाता रहा है। इसमें भी सरकारी नौकरी पहली पसंद होती है। कितु मौजूदा दौर में तो सरकारी और निजी दोनों ही क्षेत्रों में नौकरियों के लिए मची मारामारी शिक्षित युवाओं और उनके माता-पिता को हलकान किए दे रही है। जायज ढंग से नौकरी पाने की कवायद में युवा पीढी (नाजायज की तो बात ही छोडि़ए) जितना खर्च कर रही है, उसके बाद भी कोई गारंटी नहीं कि वह सफल हो जाए। बीते जमाने में रोजगार के अवसरों में इतनी विविधता नहीं थी जैसी कि आज है। इसलिए शिक्षा पूरी करते ही युवा अपनी योग्यता के मुताबिक नौकरी ढूंढने में लग जाते थे। आज निजी क्षेत्र ने रोजगार के अनेक और नए किस्म के अवसर तो उपलब्ध करवाएं हैं, फिर भी सरकारी क्षेत्र का आकर्षण कम नहीं हुआ है।
नौकरियों के लिए मारामारी
भारत को एक युवा देश कहा जा रहा है, जिसका दूसरा अर्थ यह भी है कि बड़ी संख्या में युवा नौकरी की कतार में खड़े हैं। पिछले साल अखबारों में कुछ खबरें छपी थीं कि उत्तर प्रदेश में चतुर्थ श्रेणी पदों के लिए जिन 90,000 से अधिक आवेदकों ने अपनी अर्जियां भेजीं, उनमें एम.ए.,पीएच डी. जैसी उच्च योग्यताधारी लोग भी थे, जबकि इन पदों के लिए महज पांचवीं पास होना जरुरी था। इसी प्रदेश में पुलिस विभाग में संदेशवाहकों (पोस्टमैन जैसा पद) के मात्र 62 पदों पर जो हजारों आवेदन आए, उनमें भी बड़ी संख्या में बी.ए., एम.ए., और पी.एच. डी डिग्रीधारी शामिल थे। मजे की बात यह है कि इस नौकरी में चुने जाने के लिए आवश्यक योग्यता बस इतनी ही थी कि आवेदक को साइकिल चलानी आती हो!
यह हाल उत्तर प्रदेश सहित देश के लगभग सभी राज्यों का है। मुंबई पुलिस में करीब 1100 कॉन्स्टेबल पदों के लिए दो लाख लोगों ने आवेदन किया। भारतीय रेल में निकली भर्तियों के लिए दो करोड़ अर्जियां आने की खबरें भी आईं थीं। राजस्थान में भी चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए स्नातकों के अलावा इंजीनियरों, वकीलों और चारटर्ड अकाउंटेंट ने आवेदन भरे। बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़े चिंता का विषय हैं और सभी सरकारों के लिए एक बड़ी चुनौती भी। उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं द्वारा साधारण योग्यता वाले पदों के लिए आवेदन करना बेरोजगारी की ओर तो संकेत है ही, साथ ही नौकरी की अहमियत की ओर भी।

कठिन है डगर
सभी सरकारी रिक्तियों के विज्ञापन समाचार पत्रों मे, अब वेबसाइटों पर भी, निकलते हैं, ताकि अधिक से अधिक प्रत्याशी इसमें भाग ले सकें। चूंकि सरकारी नौकरी के लिए प्रदेश और देश के स्तर पर कोई भी आवेदन कर सकता है, इसलिए प्रतिस्पद्र्धा बढ जाती है। कड़ी प्रतिस्पदïर्धा की वजह सीमित पद और आरक्षण व्यवस्था भी है। बात भर्ती प्रक्रिया की करें तो यह किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है।
अमूमन सभी नौकरियों के लिए लिखित परीक्षा होती है। फिर इंटरव्यू के लिए मैरिट तय होती है। आवेदक का बहुत सा समय प्रतियोगी परीक्षाएं देने और इंटरव्यू की तैयारी में ही चला जाता है। भर्ती परीक्षाओं का अंतहीन सिलसिला कब कहां रुकेगा और कब आवेदक को उसका मनचाहा रोजगार मिलेगा, यह कोई नहीं जानता। यह रेलवे और पुलिस विभाग जैसे सरकारी पदों पर खुलने वाली भर्तियां की ही कहानी नहीं है, बल्कि डॉक्टर और इंजीनियर जैसे प्रोफेशनल डिग्री धारकों की भी यही व्यथा-कथा है। उन्हें भी आवेदन पर आवेदन और एक के बाद एक भर्ती परीक्षाएं देते जाना है।

परीक्षा शुल्क व अन्य खर्च
बेरोजगारी की इस अंतहीन सी प्रतीत होने वाली यात्रा का सबसे दुखदायी पहलू है इन परीक्षाओं पर होने वाला खर्च। एक आवेदक को हर भर्ती परीक्षा के लिए परीक्षा आवेदन शुल्क देना पड़ता है और बहुत सी बार यात्रा व्यय भी वहन करना पड़ता है। कर्मचारी चयन आयोग और संघ लोक सेवा आयोग की कुछ परीक्षाओं को छोड़ कर जिनमें महज 100 या 200 रुपये का परीक्षा आवेदन शुल्क लगता है, बैंक, मेडिकल या इंजीनियरिंग की कई परीक्षाओं (गेट आदि) के शुल्क 450, 500, 600 रुपये से लेकर 5,000 तक हो सकते हैं। इन परीक्षाओं की तैयारी/कोचिंग पर होने वाला खर्च भी विद्याथियों की जेब पर अतिरिक्त भार डालता है। देखा जाए तो दसवीं परीक्षा पास करने के साथ ही आगे अच्छे कॉलेज या स्ट्रीम में दाखिला सुनिश्चित करने के लिए कोचिंग शुरू हो जाती है। यानि खर्च का मीटर चालू। यह सभी जानते हैं कि दसवीं-बारहवीं के स्तर पर उपलब्ध कोचिंग पाठ्यक्रमों पर सालाना शुल्क कम से कम डेढ-दो लाख रूपए तक होता है। यदि विद्यार्थी अपने गाँव या शहर से दूसरी जगह जाकर किसी कोचिंग संस्थान में दाखिला लेता है, तो घर से दूर रहकर खाने-रहने का जो अतिरिक्त भार पड़ता है सो अलग। निजी शिक्षण संस्थाओं में दाखिले की महंगी फीस के बारे में कौन नहीं जानता, जो किसी भी मध्यम वर्गीय परिवार के बजट को हिला कर रख सकती है।
फिर भी विद्यार्थी अपनी तरफ से कड़ी मेहनत करते हैं और अभिभावक अपनी तरफ से उन्हें शिक्षण-प्रशिक्षण की सुविधाएं उपलब्ध करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, केवल इस आशा में कि उन्हें आगे जाकर एक बेहतरीन नौकरी मिल सके। अपने बच्चों के लिए एक सुखद भविष्य की उम्मीद में अभिभावक स्वयं यह आर्थिक भार वहन करते हैं, क्योंकि सभी विद्यार्थियों को स्कॉलरशिप तो मिल नहीं सकती। डिग्री हासिल कर लेने पर भी नौकरी पाने की प्रक्रिया में खर्च का ये सिलसिला जारी ही रहता है। एक नया दौर शुरू हो जाता है- भर्ती परीक्षाओं के लिए तैयारी और उनकी कोचिंग का। फिर भी नौकरी तो मिलती नहीं पर अभिभावकों की जेब खाली होती रहती है।
भर्तियां तो होती हैं सीमित पदों पर, लेकिन अर्जियां आती हैं कई गुना ज्यादा। आयोजक विभाग को इससे कितनी कमाई होती है और परीक्षा आयोजित करने में कितना खर्च होता है या बचत होती है, यह अलग शोध का विषय है, लेकिन बेरोजगार आवेदकों और उनके अभिभावकों के लिए यह बड़ा आर्थिक बोझ है।

खर्च ही खर्च: मंंजिल ओझल
बतौर उदाहरण मुकुल जैन (परिवर्तित नाम) ने 2016 में इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग की डिग्री हासिल की। वे अब तक कोई 25 भर्ती परीक्षाएं दे चुके हैं और जयपुर से बाहर भी 3-4 बार परीक्षाएं देने गए। उनका कहना है कि हर यात्रा पर औसतन 10,000 रुपए खर्च हुए, जिसमें यात्रा खर्च, खाना-ठहरना, ऑटो-टैक्सी का भाड़ा शामिल है। प्रति परीक्षा शुल्क 250 रुपए से 500 रुपए लगा, वो अलग। कई परीक्षाओं की सूचना इतने अल्प समय पर मिली कि ट्रेन का रिजर्वेशन करवाने जितना समय तक नहीं था, लिहाजा हवाई जहाज का टिकट खरीदना पड़ा।
मेडिकल की भर्ती परीक्षाओं में शामिल होने वाले उम्मीदवारों की जद्दो-जहद भी इससे कुछ कम नहीं। तीन साल पहले बी.डी.एस. कर डेंटिस्ट बनीं डॉ. सुवासिनी (परिवर्तित नाम) का भी सरकारी नौकरी का सपना है। इसे पूरा करने के लिए वे अब तक 11 भर्ती परीक्षाएं दे चुकी हैं, जिनमें से आठ बार उन्हें जयपुर से बाहर जाना पड़ा। वे बताती हैं, कि हर यात्रा में कम से कम 6,000 रूपए खर्च हुए। परीक्षा शुल्क 175 रुपए से लेकर 5,000 रूपए तक लगा। सेना डेंटल कॉर्प में भर्ती के लिए जरुरी 'नीटÓ परीक्षा भी दो बार दी, जिसका शुल्क 3,500 रूपए प्रति परीक्षा था।
तनिष्क श्रोत्रिय (परिवर्तित नाम) ने भी दो साल पहले इंजीनियर की डिग्री प्राप्त की और सिलसिला शुरू हो गया भर्ती परीक्षाओं का। वह भी सरकारी नौकरी में जाने की ख्वाहिश रखता है पर इस प्रक्रिया में कितने साल खप जायेंगे इसका कुछ अंदाजा नहीं है। उसने दो साल कोशिश की और फिर एक निजी संस्थान में नौकरी लेना बेहतर समझा। हालांकि निजी क्षेत्र में शुरूआती स्तर पर सरकारी नौकरी के मुकाबले वेतन और परिलाभ नहीं होते पर फिर भी संतोष किया जा सकता है, यदि काम व्यक्ति की योग्यता के अनुरूप मिल जाए। उनकी माँ कहती हैं- 'सरकारी और निजी नौकरी के अपने फायदे-नुक्सान हैं पर सवाल यह है कि आरक्षण व्यवस्था के चलते सामान्य वर्ग के युवाओं के लिए सरकारी नौकरियाँ हैं कितनी? सामान्य वर्ग के पुरुष प्रत्याशियों के लिए तो अवसर और भी सीमित हैं।Ó
शिक्षित बेरोजगारी दरअसल एक बड़ी समस्या है, क्योंकि इसका सीधा-सीधा अर्थ है शिक्षा प्राप्त करने में लगे समय और धन की बर्बादी, जो सरकारों और विद्यार्थी परिवारों दोनों के लिए ही चिंताजनक है। एक बार शिक्षित हो जाने पर अच्छे रोजगार की आकांक्षा और अभिलाषा बढ़ ही जाती है, किंतु अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी ना मिले तो निराशा और अवसाद स्वाभाविक है। अपनी योग्यता से कम योग्यता वाली नौकरी को चुनना भी खीझ और कुंठा का सबब बन जाता है।

क्या नियमन संभव है?
शिक्षित बेरोजगारों का अधिकतर समय इंतजार और अधरझूल में ही निकलता है। अभिभावकों के लिए अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा, परीक्षा शुल्क और यात्रा खर्चों को उठाना एक मजबूरी है। सवाल यह उठता है कि क्या परीक्षा आवेदन शुल्क का नियमन संभव है? हालिया लोकसभा चुनाव के लिए जारी कांग्रेस के घोषणा पत्र में युवाओं को यह भरोसा दिलाया गया है कि यदि उनकी पार्टी सत्ता मंि आती है तो सरकारी पदों के लिए आयोजित होने वाली भर्ती परीक्षाओं पर लगने वाले आवेदन शुल्क को समाप्त कर दिया जाएगा। यह युवा बेरोजगारों के लिए दिलासे वाली खबर तो है ही, इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भर्ती परीक्षाओं के लिए वसूले जाने वाले शुल्क की आग राजनेताओं को भी महसूस होने लगी है। निजी स्कूलों में अतिशय फीस वृद्धि को लेकर अक्सर विरोध होता है और आवाज उठाई जाती है। सरकार से दखल करने की मांग की जाती है। क्या ऐसा विरोध कोचिंग संस्थानों के महंगे शुल्क के सम्बन्ध में संभव नहीं है? क्या इनका नियमन संभव है? सरकार को चाहिए कि जिस तरह स्कूल फीस पर अंकुश लगाने की कोशिश की जाती है, उसी प्रकार कोचिंग संस्थाओं की फीस नियंत्रण में रखने के उपाय वह करे। वह कोचिंग संस्थान मालिकों, छात्रों, उनके अभिभावकों तथा सरकारी प्रतिनिधि की समिति बनाकर आम राय से फीस का मसला हल करे। इसी प्रकार भर्ती परीक्षाओं के आवेदन शुल्क को कम या समाप्त करे। यह निर्णय सरकारी तंत्र के साथ-साथ निजी क्षेत्र के लिए भी बाध्यकारी बनाया जाए। इसी प्रकार रेलवे को पहल करते हुए भर्ती परीक्षाओं हेतु यात्रा करने वाले युवाओं से ट्रेन किराया कम से कम लेने का फैसला लागू करे। ये चंद उपाय नौकरी चाहने वालों के लिए बहुत राहतभरे साबित होंगे।
वास्तव में परीक्षा शुल्क आज बोझ इसलिए लगने लगा है, क्योंकि प्रयासों में इजाफा हो गया है। मेधावी युवाओं को छोडि़ए। उनकी संख्या कम होती है और वे एक-दो प्रयासों में नौकरी पा भी जाते हैं। परेशानी 60-70 फीसदी उन युवाओं की है, जो औसत बुद्धि वाले हैं। सफेदपोश नौकरी पाने की चाहत में इसी बड़े वर्ग की जेब तेजी से खाली हो रही है। ये वर्ग उसी धारणा में पला-बढा है, जो व्यवसाय से ज्यादा नौकरी को अहमियत देता है। रोजगार के इच्छुक इन युवाओं के लिए नौकरी का इंतजार मानो आग का दरिया है और डूबकर जाना है।

इतर सरकारी सोच
जहां तक नौकरी की चाहत का सवाल है तो यह देश की गंभीर विडंबना है कि जहां युवापीढी नौकरी चाह रही है, वहीं मौजूदा सरकार स्व रोजगार पर जोर दे रही है। इसीलिए वर्तमान में बोरोजगारी की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। सरकार को चाहिए कि वह फिलहाल अपनी नीति पर कायम रहने के साथ-साथ नौकरी के अवसर भी उपलब्ध कराती रहे, क्योंकि देशवासियों की नौकरी की धारणा आज की नहीं, सदियों पुरानी है। इसे जाते-जाते समय लगेगा। अल्प समय में सदियों की धारणा को बदला नहीं जा सकता।

क्या हों उपाय
अभी कुछ ही साल पहले प्रशासनिक सुधार आयोग की अनुशंसा पर अमल करते हुए सरकार ने सरकारी कामकाज और अर्जियों के साथ पेश की जाने वाली अंक तालिकाओं और हलफनामों को स्वयं द्वारा सत्यापित किये जाने की स्वीकृति प्रदान की है। वर्ना अपने दस्तावेज राजपत्रित अधिकारी अथवा नोटरी से सत्यापित किये जाने में लगने वाले समय और खर्च का बोझ भी आमजन पर ही पड़ता था। यह सराहनीय कदम था। यदि सरकार इसी तरह भर्ती की तैयारियों तथा परीक्षाओं से जुड़े कुछ अन्य प्रमुख खर्चों को ऊपर दिए गए उपायों से सीमित करने की सोचे तो युवाओं को बड़ी रहत मिलेगी। भर्ती प्रक्रिया के सरलीकरण और शुल्क नियमन के जरिये लाखों, करोड़ों युवाओं और उनके परिवारों का एक प्रकार से भला ही किया जाएगा। हो सकता है,तब नौकरी पाने में आने वाली दुश्वारियों का दंश भी कम पीड़ा पहुंचाए।

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