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सिमटता विपक्ष

— अशोक मलिक —
लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद सिर्फ दस दिन में उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के सहयोग का अंत, राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलौत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच आरोप प्रत्यारोपों का दौर, पंजाब की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह और उनके मंत्रिमंडल के मुखर सदस्य नवजोत सिंह सिद्धू में शीतयुद्ध के गर्म होने तथा कर्नाटक में जनता दल (एस) में बिखराव को कुछ टिप्पणीकारों ने मोदी विरोधी शक्तियों के मरणासन्न होने का संकेत माना है।
एक विदेशी समीक्षक ने चुनाव पर अपनी टिप्पणी में कहा है कि चुनाव में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को पहले से अधिक सफलता मिली और सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस को भी। लोकसभा चुनावों में कभी देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस को 52 सीटों पर सफलता मिली। चुनाव से पहले कांग्रेस के कई नेता भाजपा में शामिल हो गए थे, चुनावों के बाद भी ये सिलसिला जारी है। कांग्रेस नेता और महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल ने विधायक पद से इस्तीफ़ा दे दिया है।
कांग्रेस के लोगों का अपने नेतृत्व पर भरोसा कम हुआ है। अधिकांश प्रेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस को राहुल गांधी का इस्तीफ़ा स्वीकार कर लेना चाहिए। मजबूत भाजपा का मुकाबला करने के लिए मज़बूत विपक्ष की ज़रूरत है, लेकिन कांग्रेस बिखरती जा रही है। जहां कांग्रेस अब ड्रॉइंग रूम की पार्टी बन गई है,भाजपा से जुड़े लोग एक विचारधारा से जुड़े हैं और उसके प्रति समर्पित हैं।
फिलहाल देश में कांग्रेस की सरकार राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, पंजाब और पुदुचेरी में है। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार नाज़ुक बहुमत और अपने सहयोगियों के समर्थन पर टिकी है और सरकार पर लगातार ख़तरा बना हुआ है। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी के अनुसार 2014 में यूपीए सरकार की खामियों के कारण भाजपा आई और मोदी सरकर बनी, इस बार भी कांग्रेस का तकरीबन उसी आंकड़े पर रहना, उसके वोट प्रतिशत और आत्मविश्वास में कमी देखें तो लगता है कि कांग्रेस का पतन जारी है। ... कांग्रेस को और गहराई में जा कर देखना होगा कि असली समस्या क्या है।
कांग्रेस से छिटक कर बनी पार्टियों, जैसे शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस, ममता बनर्जी का तृणमूल कांग्रेस, वाईएस जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस, तेलंगाना राष्ट्र समिति के साथ हाथ मिलाकर रिश्ते मज़बूत कर पुरानी ताक़त वापस पाने की चुनौती आज ज्यादा गंभीर है, पर लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बड़ा झटका साबित हुए हैं। कांग्रेस फिर से खुद को समेट कर मैदान में उतर पाएगी, और अपने कुनबे को बांध कर रख पाएगी इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक नहीं लगता।
हार के बाद कांग्रेस ने अपने प्रवक्ताओं को एक महीने तक टीवी चैनलों से दूर रहने को कहा है। ऐसे निर्णय पार्टी की छवि और सेहत के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं। मतदाता और पार्टी समर्थकों तो यह भी नहीं जानते कि राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष रहेंगे या नहीं। सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को पार्टी की कमान संभलाते हुए कहा था कि राहुल अब मेरे भी नेता हैं, लेकिन अब संसद में सोनिया गांधी राहुल की नेता बन गई। संदेश यही है कि कांग्रेस पार्टी में सब कुछ परिवार ही है।
देश ने नरेन्द्र मोदी को दोबारा जनादेश देकर बता दिया है कि ‘बड़े’ परिवारों की राजनीति का अंत हो रहा है, दूसरी तरफ प्रियंका गांधी को फटाफट कांग्रेस महासचिव बना दिया गया, एक रोड शो में पूरे वाड्रा परिवार (पति, पत्नी तथा बच्चों) को ले जाया गया। संदेश यही माना जाएगा कि परिवार की अगली पीढ़ी भी हकूमत करेगी।
अब कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह अस्तव्यस्त है। पराजय की समीक्षा के लिए बुलाई गई बैठक में राहुल गांधी ने अशोक गहलोत, पी. चिदम्बरम तथा कमलनाथ पर परिवारवाद को बढ़ावा देने और अपने बेटों को पार्टी से उपर रखने का आरोप लगाया। जो गांधी परिवार के लिए सही है,वही दूसरे करें तो गलत। नाराज प्रियंका गांधी ने वरिष्ठ नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा, ‘नरेन्द्र मोदी से लडऩे के लिए मेरे भाई को अकेला छोड़ दिया गया।’
राहुल गांधी को जनता ने प्रधानमंत्री पद के योग्य नहीं माना। उन्होंने कृषि की बुरी हालत तथा बेरोजगारी जैसे सही मुद्दे उठाए तो भी लोगों ने यह नहीं माना कि उनके पास इनका इलाज है। इस बार पार्टी में राहुल गांधी के इस्तीफे की पेशकश के बाद उन्हें रोकने के लिए वैसा भावनात्मक सैलाब नहीं उठा, जैसा सोनिया गांधी के पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफे या प्रधानमंत्री न बनने के फैसले के बाद उठा था। योगेन्द्र यादव का तर्क है कि अगर कांग्रेस ‘भारत के विचार’ को बचाने के लिए भाजपा को रोक नहीं सकते तो भारत के इतिहास में उसकी कोई सकारात्मक भूमिका नहीं हैज् इस वक्त वह विकल्प बनने के रास्ते में सबसे ब?ी अकेली बाधा है।
गांधी जी ने भी चाहा था कि आजादी के बाद कांग्रेस को भंग कर दिया जाए, लेकिन वह अलग संदर्भ में था। आज देश को मजबूत विपक्ष की जरूरत है। यह भी स्पष्ट है कि गांधी परिवार अब कांग्रेस को आसानी से पुनर्जीवित नहीं कर सकता इसलिए राहुल-मुक्त या गांधी परिवार मुक्त कांग्रेस की बात सोचने की जरूरत गलत नहीं लगती। संसदीय दल की अध्यक्षता संभाल कर सोनिया गांधी ने संकेत दे दिया है कि परिवार कांग्रेस पर पकड़ कमजोर नहीं करना चाहता, इसे गांधी परिवार और कांग्रेस की खुद को खत्म करने के आत्मघाती कदम के रूप में देखा जा सकता है।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने राजनीतिक जीवन के सबसे मुश्किल दौर से गुजऱ रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने उनको मझधार में छोड़ दिया है और पारिवारिक कलह सुलझने में नहीं आ रही है। मायावती ने जता दिया है कि सपा प्रमुख अपने परिवार को एकजुट नही रख पाए और उन्हें अपनी यादव बिरादरी का भी विश्वास हासिल नहीं है। सपा के दिग्गज भी हार गए हैं। परम्परागत यादव बहुल सीटों से हारने वाले दिग्गजों में अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव (कन्नौज) और दो चचेरे भाई अक्षय यादव (फिरोजाबाद) तथा धर्मेन्द्र यादव (बदायूँ) के नाम चर्चा में रहे।
मायावती ने अगले विधानसभा उपचुनाव अकेले लडऩे की घोषणा करते हुए यह गुंजाइश रख छोड़ी है कि आगे चलकर फिर गठबंधन हो सके, बशर्ते कि सपा प्रमुख अपने लोगों को मिशनरी बनाने में कामयाब हों। प्रेक्षक कहते हैं कि मायावती ने पिछली बार की तरह गठबंधन नहीं तोड़ा है, आगे का रास्ता अभी खुला है। भाजपा का दबदबा इसी तरह बना रहा तो कुछ शर्तों के साथ विधानसभा चुनाव में फिर गठबंधन हो सकता है।
दूसरी तरफ अखिलेश यादव ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि समाजवादी पार्टी भी विधानसभा उपचुनाव अकेले लड़ेगी और उसे अगला विधानसभा चुनाव भी अकेले दम पर लडऩे की तैयारी करनी होगी। प्रेक्षक मानते हैं कि वास्तव में सपा के साथ रहने से बसपा को न केवल पिछड़ा बल्कि मुस्लिम वोट भी मिला और तभी उन्हें शून्य से बढक़र दस सीटें मिलीं, जो अकेले सम्भव नहीं थीं।
इससे पहले लोकसभा उपचुनाव में दोनों दलों में तालमेल के चलते सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी फूलपुर, गोरखपुर और कैराना सीटें हार गई थी, जिससे गठबंधन की बुनियाद पड़ी। मगर आम चुनाव में मोदी लहर ने तमाम जातीय दीवारें तोड़ दीं, जिससे कऱीब एक दर्जन सीटें हारने के बावजूद भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ा और सपा-बसपा का घट गया। खुद मायावती भी दलित वोट का एक हिस्सा भाजपा में जाने से नहीं रोक पाईं।
जानकार मानते हैं कि वास्तव में मायावती ने गठबंधन इसलिए तोड़ा क्योंकि न तो उन्हें उम्मीद के मुताबिक़ कऱीब साठ सीटें मिलीं और न ही संसद त्रिशंकु हुई, जिससे उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी की दावेदारी का मौका मिलने की आशा थी। गठबंधन की दूसरी छिपी शर्त यह थी कि अखिलेश यादव अगले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे। गठबंधन समाप्त कर मायावती ने अपने को इस बंधन से मुक्त कर लिया है और अब वह स्वयं मुख्यमंत्री पद वापस पाने की कोशिश करेंगी, यह गठबंधन समाप्त होने का असली कारण भी हो सकता है। कुछ प्रेक्षक मानते हैं कि अगर अखिलेश अपनी और पार्टी की कमज़ोरियों को पहचान कर उन्हें दूर कर लें तो वह फिर एक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर सकते हैं, फिलहाल उनकी राह आसान नहीं लगती।
कहा जा सकता है कि इस बार के लोकसभा के चुनाव परिणाम ‘एक बार फिर मोदी’ का जनादेश मात्र नहीं हैं, इनमें भारतीय राजनीति की दशा-दिशा में परिवर्तन का संकेत भी हैं। भाजपा विरोधी दलों-नेताओं में भी शायद ही किसी को इन चुनावों में भाजपा-राजग की जीत में संदेह रहा हो। ऐसी शानदार जीत की उम्मीद शायद भाजपा नेतृत्व को भी नहीं रही होगी। सनी देओल, गौतम गंभीर, रविकिशन, हंसराज हंस सरीखे लोकप्रिय चेहरों को चुनाव मैदान में उतारना भाजपा के आत्मविश्वास का परिचायक कैसे माना जा सकता है? पिछले लोकसभा चुनावों के वायदों पर मोदी सरकार का रिकॉर्ड ठीक-ठाक ही था। हर साल दो करोड़ रोजगार देने के वादे, नोटबंदी और जीएसटी से आम आदमी और कारोबारियों की मुश्किलें भी जमकर उछाली गई।
सरकार को चुनावी चुनौती देने के विपक्ष प्रयास कामयाब नहीं रहे तो मुख्य कारण यही था कि केंद्र और राज्यों में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले विपक्षी दल विश्वसनीयता गंवा बैठे थे। लंबे समय तक एक-दूसरे के राजनीतिक विरोधी और दुश्मन रहे नेता मोदी हटाओ के नारे के पीछे अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश करें तो उन पर मतदाता क्यों और कैसे भरोसा करेगा? जहां विपक्षी नेता अपने वायदों को विश्वसनीय नहीं बना सके, वहीं नरेंद्र मोदी अपनी नीति, नीयत और नेतृत्व को संदेह से परे रखने में सफल रहे। मोदी की मजबूत और निर्णायक नेता की छवि बनाने में बालाकोट एयर स्ट्राइक ने मुहर भी लगा दी।
मतदाता नेता और सरकार से ईमानदारी और विश्वसनीयता की उम्मीद रखता है। इसी कारण मिस्टर क्लीन राजीव गांधी को बोफोर्स तोप सौदे में दलाली के आरोपों के चलते 1989 के लोकसभा चुनावों में पराजय झेलनी पड़ी थी। संचार और सूचना क्रांति ने पूरे विश्व को एक वैश्विक गांव में तबदील कर दिया है। नयी पीढ़ी को जाति-संप्रदाय के नाम पर सरकार चुनना पिछड़ेपन की पराकाष्ठा लगती है। मोदी इन करोड़ों युवा मतदाताओं का विश्वास जीतने में सफल रहे। एक पीढ़ी पहले तक जाति, संप्रदाय, गांव के असरदार लोग दल या प्रत्याशी विशेष को वोट दिलाने का ठेका ले लिया करते थे, लेकिन आज परिवार के सदस्य भी अपने-अपने विवेक से मतदान करते हैं। सुनने-पढऩे में भले ही यह सामान्य लगे, लेकिन यह निश्चय ही बहुत बड़ा बदलाव है।
विशेषज्ञ दशकों तक कम मतदान प्रतिशत और बहुकोणीय विभाजन के चलते अल्पमतों के सहारे ही प्रत्याशी जीतने और सरकार बनने को लोकतंत्र के लिए खतरे का चिंताजनक संकेत बताते रहे। आजाद भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें 411 राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने जीती थीं। उसे भी कुल मतदान का 48.1 प्रतिशत ही मत मिले थे, लेकिन सत्रहवीं लोकसभा चुनावों में राजग, और दर्जन भर से भी ज्यादा राज्यों में खुद भाजपा का मत प्रतिशत 50 के पार पहुंच गया, ये सारे बदलाव भारतीय राजनीति की दशा-दिशा में परिवर्तन के स्पष्ट संकेत हैं।
इस बार के मतदान से पहले एक आंकड़ा विश्लेषक ने 2019 के चुनाव को भाजपा के लिए कांग्रेस के 1984 जैसा होने का आकलन जाहिर किया था। 1984 के लोकसभा चुनावों में सत्तासीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने समय पूर्व चुनाव कराये थे और कांग्रेस को 411 लोकसभा सीटें मिलीं, जितनी कभी पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी को भी नहीं मिली थीं। जनता पार्टी 10, चरण सिंह का लोकदल तीन और भाजपा दो सीटों पर सिमट गयी। कांग्रेस अपनी बुलंदी पर थी और भाजपा तलहटी में। लगभग 35 साल बाद स्थिति एकदम उलट है। इस बदलाव की शुरुआत 2014 में ही हो गयी थी, जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर भाजपा ने 10 साल से केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस को सिंहासन से ही बेदखल किया और उसे लोकसभा में महज 44 सीटों पर समेट दिया था।
इस बार के चुनाव को 1984 का चुनावी बदला भर कह देना देश के बदले राजनीतिक परिदृश्य सही आकलन नहीं होगा। देश के सबसे पुराने और स्वाधीनता संग्राम से निकले राजनीतिक दल की 2014 में हुई दुर्दशा जारी है। भाजपा को 2014 में 282 सीटें मिली थी और तब कांग्रेस को लोकसभा में विपक्ष के नेता का दर्जा पाने के लिए जरूरी सीटें भी न मिल पाना एक बड़ी राजनीतिक घटना थी। 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की लोकसभा सीटें भले ही बढ़ गयी हैं पर आज भी यह आशंका भी निर्मूल नहीं कही जा सकती कि कांग्रेस के लिए एक और वापसी कतई आसान नहीं होगी। इतिहास जल्दी में नहीं लिखा जाता, पर यह तो कहा ही जा सकता है कि जहां कांग्रेस यथास्थितिवादी राजनीति की लकीर पर चलती रही, वहीं भाजपा ने अपने लिए विशेष पहचान और नया-विशाल जनाधार तैयार किया। कभी उत्तर भारतीय, शहरी, व्यापारी वर्ग की पार्टी कही जाने वाली भाजपा ने अपने जनाधार और छवि का असरदार विस्तार किया है। कांग्रेस का ज्यादा बड़ा संकट एक सजग-सक्रिय राजनीतिक दल से दरबारियों द्वारा संचालित कठपुतली तंत्र में बदल जाना है। सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों में कुछ ऐसे राज्यों में भी, जिनमें उसकी सरकारें हैं, कांग्रेस का खाता नहीं खुल पाने के लिए दिग्गजों के पुत्र-मोह को दोषी मानने वाले भी जानते होंगे कि वह खुद भारतीय राजनीति को इसी पुत्र मोह की देन हैं। नेतृत्व के चेहरे के साथ-साथ कांग्रेस अपने राजनीतिक चरित्र पर गहन चिंतन कर सके इसी में पार्टी और लोकतंत्र का हित निहित है।

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