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मेरे तो सत्ता –गोपाल

- डॉ. ओंकारनाथ चतुर्वेदी -
मेरे तो ‘गिरधर-गोपाल’ गाने के दिन तो बीत गए। सन् 1950 से पहले तक भी ‘गिरधर गोपाल’ जनमानस के जेहन में थे। पूर्ण पवित्रता के साथ तब समाज बंटा नहीं था, एक था। लेकिन इस देश के सत्ताधीशों का लोकतंत्र से पाणिग्रहण होने के बाद जीवन के मकसद, अर्थ, प्रयोजन ही बदल गए। समाज की सतह पर ‘वाचाल बाजीगर’ उभर आए, जो सार्वजनिक मंचों पर ‘निहायत सफेद झूठ’ को पूर्ण आत्मविश्वास के साथ ‘सत्य’ के रूप में परोसते रहे और झूठे वादे करते रहे। सत्तर साल से लोकतंत्र की यह ‘रामलीला’ हर चुनाव के नाम पर पांच साल बाद पूर्ण साजधज्जा से सजाई जाती है। आश्वासन युक्त ‘षट् व्यंजन’ सत्ता समारोह के लिए परोसे जाते हैं। देश भक्ति और राष्ट्रीय अनुराग की ‘लॉली पॉप’ चूसने के लिए बांटी जाती है, जिन्हें भूखा वोटर पाँच साल तक चूसता रहता है। ये ‘ठप्पा बरदार’ डिब्बा सरदार ई.वी.एम. के पंख पर सवार होकर सत्ता मन्दिर तक पहुँच जाते हैं। गोबरी लाल से करोड़ी लाल बन जाते हैं और फि र भजन मंडली में खड़ताल लेकर नाचते नजर आते हैं। ‘मेरे तो सत्ता गोपाल दूसरो न कोई, जासो मिले झंडी कार, मेरो पति सोई’ और राष्ट्रीयता के वो पुजारी जो कभी गरीबों के आँसू पोंछने निकले थे, जिन्होंने रावी के तट पर कसम खाई थी कि हर बेईमान को बिजली के खम्भे पर टांग दिया जावेगा। वो अब सत्तर साल बाद गुनगुना रहे हैं कि ‘राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते’।
हमारे देश में गंगा में मैल धोने की प्रक्रिया दशकों से चल रही है। ‘रिश्वत खोर अफसर’, ‘मुनाफाखोर ठेकेदार’ करोड़ों रुपए डकार गए, पर गंगा के मैल न धुले थे, न धुलेंगे। पिछली आधी शताब्दी से गंगा सफ ाई का करोड़ों रुपया डकार गये। दशकों से करोड़ों पापी, पाप धोने का अभिनय करते रहे हैं और करते रहेंगे। अरे भाई ‘मानसी गंगा’ में नहाओ, वह जो तुम्हारे भीतर बह रही है। पाप धोने का ढोंग सार्वजनिक क्यों कर रहे हो, कर्मों की पवित्रता ही उसका फल है, यही सुख और संतोष है। कुंभ स्नान तो राष्ट्रीय एकता का पवित्र अनुष्ठान है, उसे चलने दो। कुंभ के महान आशय ‘राष्ट्रीय एकता’ को राजनीति के कीचड़ में मत घसीटो भाई। लोगों का धर्म पर से विश्वास ही उठ जायेगा। जैसे जनप्रतिनिधियों के प्रति उठ गया है। जनता अब सोचती है कि वोट के मंगते भिखारी, सत्ता का स्वाद चखने के लिए हर पाँच साल बाद दरवाजे पर झुक-झुक कर सलाम करते हैं। इन ‘गोबरी लालों’ को तो सिर्फ देश की सेवा करनी है। गली और मौहल्ले की नहीं। भले ही सैकड़ों निरीह नकली शराब पीकर मर जाएं, सियासत चलनी चाहिये। ऐसे भी देश सेवक हैं, जिनके पिताजी तो वृद्धाश्रम में हैं, माताजी बरतन मांजती फि र रही हैं, औलादें चाकू की नोंक दिखाकर दुर्योधन बने घूम रही हैं। ऐसे महान संस्कारी ‘श्रवण कुमार’ अब देश की सेवा के लिए आपके द्वार पर दस्तक दे रहे हैं। सिर्फ कुर्सी के लिए, आजीवन सुख उपभोग के लिए और अतीत-व्यतीत हुए सत्ताधारियों को कोसते हुए अपनी रोटी फिट कर रहे हैं।
‘मेरे तो सत्ता गोपाल, दूसरो न कोई’-लो देखो आयाराम, गयाराम की फसलें देश सेवा के लिए लहराने लगी हैं। हर दल में टिकट पाने के लिए कौरव पांडवों के दल भिड़ रहे हैं। टिकिट पाने के लिए धक्का-मुक्की, मारपीट चल रही है। कपड़े फट रहे हैं। टी.वी. चैनल चटखारे ले-ले कर खबरें परोस रहे हैं। एंकर तो लगने लगा है कि भाड़े पर ही किसी दल का गुणगान करने के लिए बैठे हैं। समाचारों और प्रस्तुत विचारों को ऐसे दिग्भ्रमित किया जा रहा है जैसे सारा देश स्वर्ग की देहरी पर खड़ा हो चला है। नारों, वादों का कुहरा देश में पैदा किया जा रहा है। असलियत किसी की भी नजर न आए, अलावा सत्ता सेवक के। क्या भगवान अथवा धर्म भी अब तिजारती सामान है, जिसे जरूरत पडऩे पर सजा दिया जाए। क्या एक राम मंदिर ही करोड़ों बेकारों की समस्या का एक मात्र हल है? तकली और हस्तकरघे से उठा यह अभिमानी देश जो आज अंतरिक्ष की देहलीज चूम रहा है। उससे सत्तर साल का हिसाब मां- रहे हो। भारत अब संचार इलेक्ट्रोनिक क्रांति के उस युग में प्रवेश कर चुका है। जहाँ ए, बीए सी, डी का ज्ञान या दस तक गिनती के ज्ञान से वह सारी दुनिया को अंगुली पर नचा सकता है। मोबाइल में लीन इस बचपन का क्या राष्ट्रीय भविष्य है? सत्ताधीशों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बेरोजगार, डाक्टर, इन्जीनियर के साथ इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी में दीक्षित इस पीढ़ी का क्या होगा? प्रतिवर्ष दो करोड़ नौकरियाँ और कालेधन को जब्त कर 15 लाख रुपए कैसे और कहाँ से लाओगे। ‘कालाधन’ नोटबंदी में सफेद हो गया या डूब गया!
मैं देख रहा हूँ कि अद्र्ध कुंभ को पूर्ण कुंभ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। महिलायें नागा संत बन रही हैं? किन्नरों के अखाड़े भी महा मंडलेश्वर के साथ शाही स्नान करने जा रहे हैं। शायद पूर्ण कुंभ में समलैंगिकों का भी कोई अखाड़ा महा मंडलेश्वर के साथ हो? दसनामी अखाड़े किस प्रयोजन से बने थे और चले थे आज समाज में उनकी भूमिका और उपयोगिता क्या है? माया-मोह से मुक्त इन साधुओं को भी पेंशन देने का क्या औचित्य है? क्या ये सत्ता प्राप्ति के लिए घूसखोरी नहीं है?
‘मेरे तो सत्ता गोपाल’ की गहरी धुंध में सभी कुछ धुंधला गया है। ‘राम’ भी धुंधला चले हैं।

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