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फिनिशर नहीं आए काम

- देवेन्द्र गर्ग -
विश्व की नंबर एक क्रिकेट टीम सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड से हार कर विश्व कप से बाहर हो गई। गई। लीग राउंड में भारत और न्यूजीलैंड का जैसा प्रदर्शन था, उसे देख कर किसी को उम्मीद नहीं थी कि न्यूजीलैंड की टीम भारत को हरा पाएगी। लीग के पूरे नौ मुकाबले में भारत की टीम सिर्फ एक मैच हारी थी। वह भी इंगलैंड से। इस मैच के पीछे की कहानी भी कुछ और ही बताई जा रही थी। भारत ने या कम से कम आखिर तक बल्लेबाजी करने वाले महेंद्र सिंह धोनी और केदार जाधव ने वह मैच जीतने का प्रयास ही नहीं किया। आखिरकार भारत की हार ने पाकिस्तान को विश्वकप से बाहर कर दिया और भारतीय फैन्स को भारत की हार में भी जीत नजर आई।
इंग्लैण्ड से हारने के बाद भी भारतीय टीम के आत्मविश्वास और भारतीय फैन्स के जोश में कोई कमी नजर नहीं आई। लेकिन सेमीफाइनल में परिस्थतियां कुछ ऐसी बदलीं कि भारत को इस नाकआउट मुकाबले में न्यूजीलैंड से हार स्वीकारनी पडी। इस मैच में भारत की कई कमजोरियां जाहिर हो गईं। लीग मैचों में भारत के शुरुआती तीन बल्लेबाजों ने खूब रन बनाए। मध्यक्रम पर जोर ही नहीं आने दिया। बाकी काम गेंदबाजों ने किया। सेमीफाइनल पहला मौका था, जब शुरुआत के तीन या चार बल्लेबाज सस्ते में आउट हो गए और पहली बार मध्यक्रम पर जिम्मेदारी आई। भारत के मध्य क्रम को अपनी क्षमता साबित करनी थी। मध्यक्रम में महेन्द्र सिंह धोनी, ऋषभ पंत, हार्दिक पाण्डया और रविन्द्र जडेजा जैसे खिलाडी मौजूद थे। इनको दुनिया का बेहतरीन फिनिशर माना जा रहा था। इनकी टीम में उपस्थिति को देखकर लग रहा था कि भारतीय टीम इस टूर्नामेंट में अजेय है। लेकिन दबाव पड़ते ही सारे धुरंधर फेल हो गए। रविंद्र जडेजा को छोड़ कर बाकी सबने निराश किया। इस तरह भारत ने कमजोर मध्यक्रम के कारण विश्वकप जीतने का सुनहरा मौका गंवा दिया। सबसे ज्यादा निराश दुनिया के बेहतरीन फिनिशर माने जाने वाले महेंद्र सिंह धोनी ने किया। इंग्लैंड के खिलाफ मैच में जिस तरह की धीमी बल्लेबाजी उन्होंने की थी और जिसकी आलोचना भी खूब हुई थी, लगभग वहीं काम उन्होंने सेमीफाइनल में किया। धोनी मैच के सबसे अहम 47वें और 48वें ओवर में कुछ नहीं कर सके। न्यूजीलैंड के गेंदबाजों के सामने बेबस से नजर आए। अंतिम ओवरों में उनके हैलिकॉप्टर शाट से लगने वाले छक्कों को देखकर क्रिकेट फैन्स वाह—वाह कर उठते थे। उन्हीं की आलोचना अब स्लो बैटिंग को लेकर हो रही है।
दरअसल धोनी आखिरी ओवरों में बल्लेबाजी के लिए आते हैं उस वक्त टीम को तेज गति से रनों की जरुरत होती है। धोनी टीम की इस जरूरत को पूरा भी करते थे। विश्वकप में भी टीम में उनकी यही भूमिका मानी जा रही थी कि वो जरूरत पडने पर अंत में डटकर टीम को विजयद्वार तक ले जाएंगे। लेकिन धोनी इस विश्वकप में तेजी से रन बनाने में नाकाम रहे। इस टूर्नामेंट में उनका स्ट्राइक रेट भी उनकी कहानी कह रहा है। लोग अब कहने लगे हैं कि वह सुपर फिनिशर से स्लो फिनिशर बन गए है।
अपने टॉप तीन बल्लेबाजों को मात्र 5 रनों के स्कोर पर खोने के बाद भारतीय टीम को युवा बल्लेबाज ऋषभ पंत से बहुत उम्मीदें थीं। उनको भी धोनी की तरह बेहतरीन फिनिशिर माना जा रहा था। उनको आने वाले कल का धोनी कहा जाने लगा था। लेकिन पंत ने सभी को निराश कर दिया। हालांकि सेमीफाइनल में पंत ने पारी को संभाला और अच्छे अंदाज में बल्लेबाजी भी कर रहे थे लेकिन अनुभव की कमी के चलते एक बचकाना शॉट खेलकर पवेलियन लौट गये। कप्तान कोहली भी उनके इस शॉट पर बेहद नाराज दिखे। इससे पहले भी पंत दबाव में ऐसे शॉट खेलते रहे हैं जिससे उन पर आरोप भी लगे कि अभी उनमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैचों के लिए जो टेम्परामेंट होना चाहिए उसकी कमी है। उनका विश्व कप की शुरुआती टीम से बाहर होने का प्रमुख कारण भी यही रहा था।
भारतीय टीम की एक और उम्मीद हार्दिक पांड्या ने भी पंत की गलती दोहराई। वह भी खुद पर संयम नहीं रख पाये। हार्दिक की तुलना तो कपिलदेव से की जाने लगी है। उनको भी बेहतरीन फिनिशिर माना जा रहा था। क्रिकेट प्रेमियों को उनसे उम्मीद थी कि वो न्यूजीलैड के खिलाफ वैसी ही पारी खेलेंगे जैसी पारी कपिलदेव वे 1983 में जिम्बाबब्वे के खिलाफ टाप आर्डर ध्वस्त हो जाने के बाद अकेले अपने दम पर भारत को मैच जिताया था। मगर पाण्ड्या दुनिया के बेहतरीन आलराउंडर होने का तमगा प्राप्त करने का ऐसा सुनहरा मौका चूक गए।
जैसे जीत तमाम कमजोरियों को ढकने का काम करती है, वैसे ही हार तमाम सवालों को जन्म देने का काम करती है। भारत की हार के कई कारणों पर चर्चा हो रही है। जैसे शिखर धवन और विजय शंकर के बाहर होने पर उनका सही रिप्लेसमेंट न करना, कमजोर साबित हुए मध्य क्रम की समय रहते सही ढंग से चिंता न किया जाना और सेमीफाइनल में धोनी को बल्लेबाजी क्रम में ऊपर न भेजना। लेकिन केवल हार के कारण जानने या फिर हार की समीक्षा करने की कवायद से कोई लाभ नहीं होने वाला। अब बात तब बनेगी जब हार के कारणों का निवारण किया जाएगा।
टी—20 विश्वकप के लिए तैयारी
भारत ने वेस्टइंडीज के दौरे पर जाने के लिए 21 जुलाई को जो टी-20 की टीम घोषित की वह उससे पता चलता है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने अब 2020 में होने वाले टी-20 विश्व कप पर नजरें जमा दी हैं। यह इस बात से भी पता चलता है कि वेस्टइंडीज दौरे के लिए जितने बदलाव टी-20 टीम में किए गए हैं उतने बदलाव एकदिवसीय टीम और टैस्ट टीम में नहीं किए गए।
टी-20 मैचों के लिए जो टीम घोषित की गई है उसमें सिर्फ 6 खिलाड़ी ऐसे हैं जो पहले भी टीम में थे। उनके अलावा पूरी टीम बदल दी गई है। श्रेयस अय्यर, वाशिंगटन सुंदर, राहुल चाहर, दीपक चाहर, खलील अहमद और नवदीप सैनी जैसे युवा खिलाडय़िों को टीम में जगह दी गई है। इनके चयन को देखकर ऐसा लगता है कि इन्हें टी-20 विश्व कप तक लगातार आजमाया जाएगा। इससे इनका आत्मविश्वास बढेगा और चयनकर्ताओं को भी टी-20 विश्व कप की टीम की अंतिम तस्वीर तैयार करने में मदद मिलेगी। 2020 में होने वाले टी-20 विश्व कप में अभी करीब सवा साल का वक्त है। 2020 के अक्टूबर में ऑस्ट्रेलिया की मेजबानी में टी-20 विश्व कप खेला जाना है। टी-20 विश्व कप के लिए टीम इंडिया को ग्रुप बी में जगह मिली है। जहां उसके साथ इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका और अफगानिस्तान जैसी टीमें हैं।

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