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‘मीडियॉकरी’ खिलवाड़

- अनिल चतुर्वेदी-
देश की नौजवान पीढी का बड़ा हिस्सा ‘मीडियॉकर’ (अल्प ज्ञानी) साबित किया जा रहा है। परीक्षा में 80 फीसदी तक अंक लाने वाले छात्र भी इस दायरे में फिट किए जा रहे हैं। क्या ये शिक्षा माफिया की साजिश के तहत हो रहा है, जिसके हाथों में हमारे नीति निर्माता खेल रहे हैं? साजिश ऐसी रची गई है, जिसके बारे में जानकर कोई भी संजीदा व्यक्ति विचलित हो जाए।
राजस्थान में एक केन्द्रीय विद्यालय के प्राचार्य साजिश का खुलासा करते हैं कि साल 2014 से ही ‘ऊपर’ से निर्देशित किया जा रहा है कि परीक्षा में छात्रों के साथ नरमी बरती जाए। उदारता से उन्हें अंक दिए जाएं। मात्राओं, वर्तनी, वाक्यों की त्रुटि पर ध्यान न दिया जाए। प्रश्न के उत्तर का भाव सही है तो पूरे अंक दे दिए जाएं। प्राचार्य ने दावा किया कि छात्रों के ज्ञान के साथ खिलवाड़ राजनीतिक मकसद से किया जा रहा है। युवा वोटबैंक को अपना समर्थक बनाने का मकसद, जिसे पूरा करने के लिए ही परीक्षा में अंक लुटाए जा रहे है। ताकि अधिक से अधिक युवा पास होकर सत्ताधारी पार्टी का गुणगान करें। चुनाव में वो अपने परिजन, परिचितों के साथ पक्ष में वोट दें। प्राचार्य अपने दावे की पुष्टि में गौर कराते हैं, इस साल लोकसभा चुनाव से ठीक पहले देशभर के शिक्षाबोर्डों द्वारा परीक्षा परिणाम जारी करने की ओर। वो कहते हैं, परीक्षा परिणाम चुनावी रणनीति के तहत जल्दी जारी करवाए गए, जिससे लगभग सभी पास हुए छात्रों की खुशी वोट में बदल सके।
ये एक ऐसी साजिश है, जिसने एक तरफ मेधावी छात्रों को इतिहास व साहित्य तक में 100 में 100 अंक दिलवाकर श्रेष्ठ बना दिया। दूसरी तरफ 40 से लेकर 80 फीसदी अंक प्राप्त छात्रों के बड़े तबके पर अल्प-ज्ञानी होने का ठप्पा लगा दिया। इन पास छात्रों से राजनीतिक मकसद तो पूरा हो गया, लेकिन इनकी भावी सम्भावनाएं पेंदे में चली गईं। न तो ये छात्र देश की शीर्ष शिक्षण संस्थाओं में सस्ती औऱ स्तरीय शिक्षा पाने के योग्य रह गए, न ही इनके लिए बेहतर व सुरक्षित नौकरी के द्वार खुल पाए।
जबरन बनाए गए अल्प-ज्ञानी छात्रों के बड़े तबके का शोषण करने को निजी क्षेत्र का शिक्षा माफिया पलक-पावड़े बिछाए मौजूद है। इसके चंगुल में छात्रों की जेब ढीली होना तय है। सम्पन्न घरों के युवा तो फिर भी शिक्षा माफियाओं द्वारा संचालित कॉलेजों की मोटी फीस का भार झेल ले रहे हैं, किंतु साधारण परिवार के युवाओं की वैतरणी पार नहीं हो रही। वे परिवार समेत कुंठा और अवसाद के बंधक हो रहे हैं। ये मानसिकता उन्हें ऐसे मोड़ पर ला पटक रही है, जहां से आगे की राह धुंधली नजर आ रही है।
सवाल ये है कि क्या राज बड़े युवा वर्ग को ‘मीडियॉकर’ बनाकर देश में डिजायनर खुशहाली लाने की सोच रखता है? पत्रिका के इस अंक का मुख्य मुद्दा यही है। अल्प-ज्ञानी युवा वर्ग की देश के विकास में सीमित भागीदारी, राज करने के लिहाज से तो माफिक है मगर हैप्पी इंडेक्स के लिए रोड़ा है। हालांकि लोक दशा सुधार कर राज की लंबी पारी वैसे ही खेली जा सकती है। इसके लिए नौनिहालों के नैसर्गिक हुनर को दांव पर क्यों लगाया जा रहा है?

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