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क्यों ऐसा कानून ?

- अनिल चतुर्वेदी -
नए मोटर व्हीकल कानून को गडकरी कानून भी कहा जा सकता है। बड़े-बडे जुर्माने थोपे गए हैं इस कानून में। इसके खिलाफ बन रहे पब्लिक मूड को शांत करने के लिए मीडिया मार्केटिंग का सहारा लिया जा रहा है। खुद गडकरी सालभर में सडक़ हादसों में मरने वालों की संख्या बताकर लोगों में भय के जरिये इसे समयोचित बताने का प्रयास कर रहे हैं। जिस तरीके से कानून मनवाने की कोशिश की जा रही है, वो विचित्र लगता है।
कोई परिवहन मंत्री से पूछे कि क्या वाहक चलाने वाले ड्राइविंग लाइसेंस, वाहन पंजीयनपत्र, प्रदूषण प्रमाणपत्र, बीमा पत्र आदि रखने, रोड टैक्स चुकाने तथा हेलमेट व सीट बैल्ट लगाने से दुर्घटना मुक्त हो जाएंगे? क्या तब चालक न तो हादसे का शिकार होंगे, न ही हादसे का कारण बनेंगे ? क्या उक्त सारी चीजों से लैस होकर वाहन चलाने से उन्हें सडक़ों के गढ्ढों से कोई नुकसान नहीं होगा ? क्या कोई तेज रफ्तार वाहन की टक्कर उनका बाल-बांका नहीं कर पाएगी? बेतरतीब यातायात, अंधेरे में डूबे रास्ते, ट्रैफिक पुलिस रहित चौराहों पर वाहनों की रेलमपेल में भी वाहन चालकों के साथ कोई अनहोनी नहीं होगी ?
गडकरी जी, सिर्फ सख्त कानून का डंडा चलाने से हालात नहीं सुधरते। शासन की सोच में ईमानदारी औऱ संवेदनशीलता भी आवश्यक है। तंत्र के जनहितैषी कार्यों तथा नजरिये में आत्मीयता दिखे। तभी जनता नियम-कायदे से रहने को प्रेरित होगी। डंडा तात्कालिक असर दिखाता है, दीर्घावधि का नहीं। आज क्यों इस कानून का विरोध हो रहा है, क्यों ये आरोप लग रहे हैं कि केवल इंस्पैक्टर राज को और ताकत देने, ऑटो व बीमा सेक्टर को लाभ पहुंचाने तथा बेहिसाब चुनावी खर्च से खाली हुआ खजाना भरने के मकसद से यह कानून लाया गया है। आरोप, आशंकाओं के रहते किसी कानून की जनस्वीकार्यता संभव नहीं है। हां, यदि पूर्व की भांति ये कानून भी तोडऩे के लिए ही लागू किया गया है, तब कुछ कहना-सुनना ही व्यर्थ है।
प्रस्तुत अंक में हमने एक ऐसे मसले को प्रमुखता दी है, जो बच्चों वाले करोड़ों परिवार को प्रभावित कर रहा है। कुछेक साल पहले एक सर्वे सामने आया था कि भारतीय परिवारों को अपनी आमदनी का सबसे बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना पड़ रहा है। ये गंभीर हालात इस कारण बने हैं, क्योंकि अभिभावकों की जेब बच्चों की स्कूल-कालेज फीस के साथ-साथ उनके ट्यूशन-कोचिंग की मोटी फीस चुकाने से ढीली हो रही है। देश में शिक्षा की दोहरी व्यवस्था सालों से अल्लान जारी है। रोकने-टोकने वाला जिम्मेदार तंत्र देखने, सुनने और बोलने की स्थिति में नहीं है। इसलिए अब स्कूलिंग और ट्यूशन, पढाई के अभिन्न अंग बन चुके हैं।
ताज्जुब इस बात का है कि स्कूली शिक्षा को बेदम साबित करने वाली मौजूदा व्यवस्था राजतंत्र को तनिक भी नहीं लजा रही है। तंत्र को इस वास्तविकता पर भी शर्म नहीं आती कि देश का एक भी स्कूल या कालेज दुनिया के टॉप 10, 20 अथवा 100 तो क्या, शीर्ष 300 शिक्षण संस्थाओं तक में शामिल नहीं है। शर्म आए भी क्यों, मामला शिक्षा के बाजार में खरबों की बरसात का जो है। न हों विश्वस्तरीय स्कूल-कालेज, जो हैं, जैसे हैं—धनवर्षा तो कर रहे हैं। देश के नौनिहाल रटंत विद्या और किताबी कीड़ा बन होते रहें खोखले, सवा करोड़ की आबादी में अंधे-लूले, मंदबुद्धि सब खप जाते हैं। ये अफसोसजनक सोच लगती है आज के राजपुरुषों की।
फिर भी हमने ट्यूशन, कोचिंग के औचित्य पर सवाल खड़ा किया है। स्कूल-कालेजों को अस्तित्वहीन बनाने पर भी अंगुली उठाई है। इस आशा के साथ कि शायद अंदर प्रकाशित आलेखों पर नजरें फेरने से जिम्मेवारों में भूल-सुधार का भाव जागे। यह तो शत-प्रतिशत सत्य है कि स्कूल और उसकी पढाई विशिष्ट होती। इसे शासन के साथ ही अभिभावकों को भी स्वीकार करना होगा। उन्हें इस विशिष्टता पर भरोसा करने का मन बनाना होगा। तभी बच्चों को ट्यूशन के दबाव से मुक्ति दिलाई जा सकती है।

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