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मल्टीप्लैक्स में स्नैक्स का अतिरिक्त ‘टैक्स’

— आभा शर्मा —
किसी भी मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर में पिक्चर देखने के लिए घुसते ही पॉपकॉर्न की महक आपका ध्यान खींचे बिना नहीं रहती। बच्चे तो क्या, बड़ों के लिए भी मध्यांतर के दौरान खुद को पॉपकॉर्न खाने से रोकना काफी मुश्किल हो जाता है। यही हाल किसी भी मॉल में जाने पर होता है, जहाँ कॉफी और पॉपकॉर्न जैसे स्वादिष्ट उत्पादों की खुशबू जब आपको लुभाती है तो आपके लिए लोभ संवरण करना थोड़ा मुश्किल ही हो जाता है। पर यह लुभावनी खुशबू जब आपकी जेब पर भारी पड़ती है तो लगता है सारा स्वाद किरकिरा हो गया।
जी हाँ, हम में से अधिकांश लोगों को यह अनुभव जरूर हुआ होगा। क्या आपने नोट किया कि कभी आपके शीतल पेय और पॉपकॉर्न का बिल आपके सिनेमा टिकट से भी ज्यादा हुआ है? हम बात कर रहे हैं उन खाद्य उत्पादों की जो मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों और माल्स में कुछ ज्यादा ही भारी दरों पर बिकते हैं। अमूमन सिनेमाघरों में बाहर से कुछ भी खाद्य पदार्थ लाने पर पाबंदी होती है, यहाँ तक कि पानी की बोतल भी। ऐसे में बहुत बार मजबूरी में दर्शकों को नहीं चाहते हुए भी अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है।

खाद्य पदार्थों की बहार और भारी दरें
यदि पिक्चर उबाऊ निकल जाए तब तो जेब पर यह मार और भी सालती है। ऐसी ऊँची कीमतें निश्चय ही गैर वाजिब कही जाएंगी, जिसके चलते दर्शकों को परेशानी उठानी पड़ती है। मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में बाहर से खाने की चीजें ले जाने पर पाबंदी रहती है,पर इसका अर्थ क्या यह है कि आपसे कोई भी कीमत वसूल ली जाएगी।
बेहतरीन तकनीक युक्त और बड़े स्क्रीन वाले पीवीआर मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर तो खाद्य और पेय पदार्थों के मामले में अच्छे खासे रेस्टोरेंट को भी पीछे छोड़ सकते हैं। आपको सिनेमा देखने के बाद खाना खाने के लिए रेस्टोरेंट या फूड कोर्ट में जाने की जरूरत नहीं है। पाव भाजी, छोले-भठूरे, इडली, पिज्जा, कबाब, टिक्का, तरह-तरह के सैंडविच से लेकर हॉट डॉग्स, सलाद, जापानी व्यंजन सुशी आदि उनके मेनू कार्ड में आसानी से मिल जाएंगे।
देखा जाए तो थिएटर व्यवसाय खाने-पीने के व्यवसाय के बिना अधूरा है और कुछ मायनों में रेस्टोरेंट से बेहतर भी है। कम से कम तीन घंटे तो दर्शक यहाँ बिताते ही हैं और घर से खाने की चीजेंं लाने की पाबन्दी के चलते वे सिनेमाघर के अन्दर ही चीजें खरीदते हैं। रेस्टोरेंट में लोग खाना आर्डर करने के पहले और खाने के बाद भी काफी समय बतियाते हुए बैठे रह सकते हैं पर पिक्चर देखने के बाद लोग रुके नहीं रहते, यानी जो भी व्यवसाय होना है वह तीन घंटे में संपन्न हो जाता है।
किसी-किसी शो, जैसे सुबह के शो के दौरान कई बार टिकट की दरें कम होती हैं। टिकट पर बचे पैसों को दर्शक कहाँ खर्च करते हैं? खाने पर ही। यह संस्कृति उपभोक्ता व्यवहार पर चलती है जिसका अनुमान है कि सिनेमाघर में ही खाने से समय की भी बचत हो जाती है। आपने पिक्चर भी देखी और खाना भी खाया और लीजिये रेस्टोरेंट जाने या घर जाकर खाने-पकाने की मुसीबत से निजात।
मुनाफे का सौदा है या नहीं?
करीब करीब सभी मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में खाने-पीने की चीजों की बहार है और आपको आपकी सीट पर बैठे-बैठे सुस्वादु व्यंजनों को आनंद लेने का विकल्प हाजिर है। इसमें जरूर सिनेमाघरों को तगड़ा लाभ है। उन्हें फिल्म प्रोडक्शन कंपनियों से टिकटों की बिक्री का लाभ साझा करना होता है लेकिन खाने-पीने की चीजों की बिक्री से होने वाले लाभ पर उनका पूरा अधिकार है और यह मुनाफा टिकट बिक्री के मुनाफे से कहीं ज्यादा है, करीब करीब दुगुना।
दरअसल, इन सिनेमाघरों में खाने पीने के स्टॉल ऊँची कीमत पर कॉन्ट्रैक्ट पर दिए जाते हैं और फिर वे अपने सामान की बिक्री से निवेश की भरपाई के लिए खाद्य और पेय पदार्थों की दरें ऊँची रखते हैं। कीमतें ऊँची रखने के पीछे सोच यह भी है कि यदि दर्शक सिनेमा टिकट के लिए 300 रुपए खर्च कर सकते हैं तो फिर 100-150 रूपए कोल्ड ड्रिंक या पॉप कॉर्न के लिए क्यों नहीं खर्च कर सकते? संभव है ऐसा निर्णय उपभोक्ता व्यवहार पर शोध के बाद लिए जाते हों!

हवाई अड्डे और मॉल भी महंगे
महंगे खाद्य और पेय पदार्थों की बिक्री सिर्फ मल्टीप्लेक्स तक ही सीमित नहीं है। हवाई अड्डों पर भी हम अक्सर देखते हैं कि हमें अपनी जेब काफी ढीली करनी पड़ती है। मॉल्स में भी ये उत्पाद कोई सस्ते में उपलब्ध नहीं होते। हमारी जेब पर पडऩे वाले वजन एक तरफ है और इन स्थानों पर स्थापित रिटेल आउटलेट्स चलाने वालों का तर्क अपनी जगह। अमूमन हवाई अड्डों, जैसे हाई सिक्योरिटी जोन में कोई भी स्टोर खोलना महंगा सौदा है। जाहिर है वातानुकूलित और चमचमाती रोशनी वाले स्थान पर खाने पीने का खर्च भी आपके खाने की दरों में ही शामिल होगा। यह तर्क भी दिया जाता है कि जैसे आप किसी महंगे रेस्टोरेंट या होटल की दरों की तुलना आम दुकानों से नहीं कर सकते, उसी तरह हवाई अड्डों और मॉल्स में मिलने वाली महंगी खाद्य सामग्री से भी शिकायत नहीं होनी चाहिए।

अदालतों में अपील
बहरहाल, पिछले दिनों बॉम्बे हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें अपील की गई थी कि सिने दर्शकों को अपने घर से बनी खाने की चीजें ले जाने की इजाजत होनी चाहिए। ऐसी ही कुछ जनहित याचिकाएं देश के अन्य हिस्सों में भी दायर की गईं। कोर्ट ने आदेश दिया कि पीने का पानी एमआरपी के आधार पर ही बेचा जाना चाहिए और दर्शक चाहें तो उन्हें अपने घर से खुद की पानी को बोतल और खाने की चीजें लाने की अनुमति होनी चाहिए. पर यह हकीकत है कि कभी सुरक्षा और कभी अन्य नियमों के नाम पर पानी की बोतल अन्दर ले जाने की इजाजत नहीं दी जाती। अधिकतर स्थानों पर स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं होता है और यदि होता भी है तो इस प्रकार से व्यवस्था की गई होगी कि आपको आसानी से नजर ना आए। इस चक्कर में भी अधिकतर लोग पानी की बोतल खरीदने पर मजबूर हो जाते हैं।
मध्य प्रदेश सरकार ने भी पिछले साल महंगे खाद्य पदार्थ बेचे जाने के सम्बन्ध में एक नोटिस जारी किया था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी राज्य सरकार से पूछा था कि वे मल्टीप्लेक्स सिनेमा घरों में मिलने वाले खाद्य उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित क्यों नहीं कर सकते। इस मामले में मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन की तरफ से यह तर्क दिया गया था कि अन्दर मिलने वाली खाने पीने की चीजों के दाम खुदरा विक्रेताओं द्वारा निर्धारित होते हैं और इसमें उनका कोई नियंत्रण नहीं है। यदि आप मल्टीप्लेक्स में सिनेमा देखने जाते हैं तो आपको उसी कीमत पर शीतल पेय या अन्य उत्पाद खरीदने का मानस बना कर आना चाहिए जिस दाम पर कम्पनियाँ इन्हें बेचना चाहती हैं।
यह तो जग जाहिर है कि हम आम दुकानों पर जिस दाम पर चीजें खरीदते हैं, उसकी तुलना सिनेमा घर के अन्दर मिलने वाले शीतल पेय या पॉप कॉर्न की कीमत से नहीं कर सकते, लेकिन ऊँची कीमतों के पक्ष में यह तर्क भी दिया जाता है कि इसके बावजूद मल्टीप्लेक्स सिनेमा घर कोई बहुत बड़ा मुनाफा नहीं कमा पाते, क्योंकि उनके द्वारा किए गए निवेश के मुकाबले यह राशि बहुत बड़ी नहीं है।
मुद्दा पेचीदा है और इसका कोई आसान हल नजर भी नहीं आता। राज्य सरकारें, मल्टीप्लेक्स संस्थाएं या फिल्म प्रोड्कशन हाउस साथ मिलकर इस समस्या का हल निकालने का कोई प्रयास करें तो संभव है कि हम पिक्चर का आनंद लेते वक्त वाजिब दामों पर पॉपकॉर्न का लुत्फ भी उठा सकें।

पहले क्या आया पॉपकॉर्न या पिक्चर!
आज पॉपकॉर्न के बिना थियेटर में फिल्म देखने का अनुभव अधूरा है, लेकिन इसका खर्चा भी पूरा है। यानी थियेटर में टिकट जितनी ही कीमत में पॉपकॉर्न मिलता है। आखिर ये सिनेमाघरों में स्नैक्स के तौर पर पॉपकॉर्न इतने प्रचलित कैसे हुए! यह जिज्ञासा आम है।
एक खास तरह के मकई के दाने से तैयार होने वाला पॉपकॉर्न शुरूआत में 19 वीं सदी में मेलों और सार्वजनिक बाजारों में उपभोक्ताओं को परोसा गया। समय के साथ यह स्ट्रीट फूड बना और अब तो पॉपकॉर्न मॉल्स व मल्टीप्लेक्स को महका रहा है। वास्तविकता यह है कि शुरुआती दौर में सिनेमाघरों में पॉपकॉर्न मषीन लगाने के लिए आवष्यक सुविधाएं नहीं थी; तो विक्रेता सीधे ग्राहकों को पॉपकॉर्न के पैकेट बेच देते थे। मक्का दाने सस्ते होते थे। इसीलिए पॉपकॉर्न भी महंगे नहीं होते थे। सिनेमा देखने जाने वालों को शो के दौरान कम कीमत में मिलने वाले इस स्नैक का स्वाद भा गया और सिनेमा हॉल के बाहर पॉपकॉर्न बेचने वालों का बैठना आम हो गया। वे दाम बढ़ाकर भी बेचते तो यह बिक जाता और उन्हें मुनाफा होने लगा।
जल्द ही यह स्नैक इतना लोकप्रिय हो गया कि हर जगह बिकने लगा। अब पॉपकॉर्न विक्रेता थिएटर के अंदर लॉबी में दर्शकों को पॉपकॉर्न बेचने लगे। पॉपकॉर्न की मांग बढ़ते देख सिनेमाघरों ने खुद पॉपकॉर्न बेचना शुरू कर दिया।
द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमरीका में पॉपकॉर्न की बिक्री अचानक बढ़ गई, क्योंकि चीनी तो विदेशों में तैनात सैन्य टुकडिय़ों को भेज दी गई। इसलिए टॉफी और सोड़ा की बाजार में कमी हो गई लेकिन इसी दौर में न तो नमक की कमी हुई और न ही मक्का की। इससे पॉपकॉर्न की लोकप्रियता बढ़ती ही गई।
दिलचस्प जानकारी यह है कि 20 वीं सदी की शुरुआत में सिनेमाघरों में कुछ खाने-पीने की अनुमति नहीं थी। लेकिन जब सिनेमा देखना आम जीवन का हिस्सा बनने लगा और स्वतंत्र विक्रेता थिएटर परिसर के भीतर या बाहर बैठकर इसे बेचने लगे थिएटर मालिकों ने भी इसमें व्यापारिक रुचि दिखाते हुए स्वयं पॉपकॉर्न बेचना शुरू कर दिया।
सिनेमाघर मालिकों को लगा कम लागत वाले पॉपकॉर्न को किसी मार्केटिंग की भी जरूरत नहीं है, इसकी महक से खाने के शौकीन फूडीज खुद-ब-खुद सिनेमाघरों में इसे खरीद ही लेंगे। बस...ऐसे ही वक्त के साथ सिनेमाघर सिंगल स्क्रीन से मल्टीप्लेक्स बन गए और पॉपकॉर्न की कीमत भी सिंगल डिजिट से मल्टी डिजिट हो गई। अमरीका में 19 जनवरी को राष्ट्रीय पॉपकॉर्न दिवस के रूप में मनाया भी जाता है।

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