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कहां गई नौकरी

- हेमलता चतुर्वेदी -
देश में बेरोजगारी की बढ़ती समस्या किसी से छिपी नहीं है। हर घर परिवार दिन रात एक ही कामना करता है कि उसके युवा सदस्य को समय पर नौकरी मिल जाए। नौकरी अगर सरकारी हो तो सोने पे सुहागा। परंतु पिछले कुछ वर्षों से देश में नौकरियों का परिदृश्य चौतरफा बदला हुआ सा दिख रहा है। सरकारी भर्तियां नहीं होना,पहले से सेवारत व्यक्ति को सेवा विस्तार देना,सेवानिवृत्त अधिकारियों को पुनर्नियुक्ति के जरिये प्रशासनिक पदों पर फिर से सेवा का अवसर प्रदान करना, प्रतिनियुक्ति आदि ऐसे मूक घटक हैं,जिनके चलते बेरोजगारी भी दबे पांव पसरती ही जा रही है।

सेवा विस्तार का औचित्य
आजकल सरकारी और निजी दोनों ही क्षेत्रों में सेवा विस्तार का चलन आम हो गया है। इसके चलते द्वितीय पंक्ति के अधिकारी कर्मचारियों की पदोन्नति और नई भर्तियों पर असर पडऩा लाजमी है। सेवा विस्तार किन परिस्थितियों में और किसे देना चाहिए, यह अलग अध्ययन का विषय है, परन्तु केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए सेवा निवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्ति अथवा सेवा विस्तार का अवसर देने संबंधी नियम गृह मंत्रालय (कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग) द्वारा समय-समय पर जारी किए जाते रहे हैं। सामान्यत: सरकार के अधीन विभिन्न विभागों में कार्यरत सरकारी कर्मचारियों को जिन नियमों के तहत सेवा विस्तार दिया जा सकता है, वे वित्त विभाग (व्यय विभाग) की अधिसूचना संख्या 7 (७) ईवीए/७४ दिनांक ७-२-१९७५ के तहत व्याख्यायित हैं। इन नियमों के अनुसार तय आयु सीमा पर कर्मचारी अधिकारी स्वत: सेवा निवृत्त माना जाएगा। साथ ही अगर किसी व्यक्ति की सेवा पूरी होने पर, इस संबंध में अधिकृत विभाग की ओर से अगर कोई विशिष्ट आदेश जारी नहीं किए गए हैं तो वह स्वत: उस नियत तिथि पर सेवा निवृत्त माना जाएगा। प्रत्येक सरकारी कर्मचारी की सेवानिवृत्ति की तिथि पहले ही विभाग व कर्मचारी को ज्ञात होती है। इसलिए सेवानिवृत्ति के वक्त उन्हें समय रहते पद मुक्त किया जा सकता है। यह संबंधित विभाग के प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही होती है कि उनके विभाग में कार्यरत कर्मचारी की सेवानिवृत्ति का ध्यान रखा जाए।
उल्लेखनीय है कि एक वयक्ति को सेवा विस्तार या पुनर्नियुक्ति का मतलब है न केवल एक व्यक्ति की पदोन्नति रूकी, बल्कि वरीयता क्रम में कम से कम 6-7 लोगों की पदोन्नति होने से रह गई। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब अधिक संख्या में लोगों को सेवा विस्तार या पुनर्नियुक्ति मिलती है तो उसका खामियाजा उस विभाग में काम कर रहे सैंकड़ों अधीनस्थ कर्मचारियों को तो हो ही रहा है, साथ ही नई भर्तियों की गुंजाइश भी स्वत: समाप्त होती जा रही है। इसीलिए नियमानुसार सेवा विस्तार या पुनर्नियुक्ति केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही मान्य है।

सेवा विस्तार अथवा पुनर्नियुक्ति के मापदंड
सेवा निवृत्ति की आयु के बाद सेवा विस्तार अथवा पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव आम तौर पर स्वीकारा नहीं जाना चाहिए।
अपवाद स्थिति में ही सेवा विस्तार या पुनर्नियुक्ति दी जा सकती है। सामान्य पदों के लिए सेवा निवृत्ति की आयु 60 वर्ष है, जबकि विज्ञान एवं तकनीकी विभाग के कार्मिकों के लिए सेवा निवृत्ति की आयु 62 वर्ष मानी गई है। सेवा विस्तार या पुनर्नियुक्ति जन हित में होनी चाहिए और साथ ही निम्र शर्तें भी पूरी की जा सकें-
अन्य अधिकारी पद के लिए पूर्णत: योग्य व सक्षम नहीं हो यानी अगर रिटायर होने वाले अधिकारी के अलावा कोई अन्य अधिकारी तत्काल उक्त पद की जिम्मेदारी वहन करने के लिए तैयार न हो अथवा वे उक्त जिम्मेदारी वहन करने के लिए आवश्यक वरिष्ठता न हासिल कर सके हों और न ही उनकी पदोन्नति का समय आया हो। परन्तु अगर उक्त पदों पर पदोन्नति के जरिए निचले सतर के अधिकारी की नियुक्ति की जा सकती हो तो उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं नकारा जा सकता कि उनके पास सेवानिवृत्त हो रहे अधिकारी जितना अनुभव नहीं है।
सेवानिवृत्त हुआ अधिकारी अत्यधिक प्रतिभाशाली हो यानी कि वैज्ञानिक अथवा तकनीकी पद की पूर्ण दक्षता उसे ही हासिल हो।
केवल इस आधार पर सेवा विस्तार नहीं दिया जा सकता कि पद के लिए कोई समुचित उत्तराधिकारी नहीं मिला, क्यांकि इसके लिए यह पुष्टि करनी आवश्यक है कि विभाग ने समय रहते पद के योग्य उत्तराधिकारी चुन तो लिया था लेकिन वह पद के लिए आवश्यक अर्हता के साथ न्याय नहीं कर सका।
केवल इस आधार पर किसी पद विशेष पर सेवा विस्तार देना ठीक नहीं कि उक्त पद पर पूर्व अधिकारी को भी सेवा विस्तार दिया गया था।
जहां तक उच्च पदों की बात है। इन पदों पर एक ही व्यक्ति का काफी लंबे वक्त तक कार्यरत रहना वैसे भी ठीक नहीं है।
इस प्रकार देखा जाए तो सेवा विस्तार के मामले बहुत कम होने चाहिए यानी नियमानुसार विशिष्ट परिस्थितियों में। परन्तु आजकल तो सेवा विस्तार के ट्रेंड के चलते विभाग इन नियमों की कितनी पालना करते हैं, यह जांच का विषय है।

प्रतिनियुक्ति का पेंच
सेवा विस्तार की ही तरह प्रतिनियुक्ति भी नए रोजगारों की राह में बड़ी अड़चन है। अखबार के नौकरी संबंधी विज्ञापन पर नजर डालिए, आधे से ज्यादा विज्ञापन प्रतिनियुक्ति के आधार पर भर्ती से जुड़े होते हैं। कारण क्या है? क्या एक विभाग के पद प्रतिनियुक्ति से भर लेना स्थाई समाधान है? कई बार देखा गया है कि प्रतिनियुक्ति के चलते दूसरे विभाग में पद रिक्त हो जाता है, उस पर भी किसी को नियुक्त नहीं किया गया होता। इससे विभाग का कार्य प्रभावित होता है। प्रतिनियुक्ति संबंधी नियम केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित हैं। परन्तु जहां पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं की भीड़ नौकरी की तलाश में विभाग दर विभाग भटक रही हो, वहां प्रतिनियुक्ति जैसे प्रावधान कितने उचित हैं? यह विचारणीय प्रश्र है।

बढ़ता आरक्षण लापता नौकरियां
हाल ही केंद्र सरकार ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण बिल संसद में पारित किया। बिल पारित होने के साथ ही सवाल उठने लगे कि किन नौकरियों में आरक्षण मिलेगा? सरकार ने आरक्षण तो दे दिया। अब उसके सामने चुनौती है नौकरियां देने की। एक रिपोर्ट के अनुसार केंद्र व राज्य सरकार के विभागों में करीब 29 लाख पद खाली पड़े हैं। हालांकि रोजगार सृजन में सरकार की अहम भूमिका होती है। नए विकास हों और उनसे संबंधित रोजगार के अवसर पैदा किये जाएं तभी तो नौकरी में आरक्षण का लाभ वंचितों को मिल सकेगा, अन्यथा यह बेमानी है।

रेलवे में भी नहीं हो रही नई भर्तियां
देश में रेलवे को सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता माना जाता है। परंतु हाल ही सूचना के अधिकार(आरटीआई) के तहत मांगी गई जानकारी के अनुसार भारतीय रेलवे नौकरी देने के मामले में पिछड़ गया है। बीते दशक के दौरान रेलवे में रोजगार बहुत ही कम दिए गए। इसी वजह से आज रेलवे में तीन लाख पद खाली पड़े हैं। विश्व भर में रोजगार देने के मामले में आठवें स्थान पर आने वाले भारतीय रेलवे की स्थिति फिलहाल यह है कि इस विभाग में सेवानिवृत्त होने वाले लोगों की संख्या के मुकाबले नई भर्तियों की संख्या अपेक्षाकृत काफी कम है। नतीजतन काम स्टाफ में भारतीय रेल सेवा की उत्कृष्टता बे पटरी हो चली है।

कौन लेगा बेरोजगारी की जवाबदेही
गत वर्ष जुलाई माह में जारी एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार बताया गया कि 2017 में भारत में 1.28 करोड़ रोजगार सृजित किए गए जबकि सच्चाई यह है कि एक भी रोजगार वृद्धि नहीं थी, आखिर इन आंकड़ों का आधार क्या है, जो रिपोर्ट में दिखाए गए? दरअसल ये आंकड़े भारत में परिवारों पर किए गए सबसे बड़े सर्वे सी पी एच एस के भ्रामक निरूपण के फलस्वरूप सामने आए। इस सर्वे का प्रारूप काफी जटिल होता है और महज तयशुदा राय शुमारी के आधार पर आंकड़े तैयार कर प्रस्तुत किए जाते हैं, जो कि वास्तविकता से परे हंै। कुल मिला कर सरकार आंकड़ों के खेल में उलझा कर बेरोजगारी की जवाबदेही से बचने के उपाय ढूंढती है।

खोखले साबित होते दावे
तमाम दावों और उपायों के बावजूद बेरोजगारी दर बढ़ती ही जा रही है। सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की एक रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर में यह दर 6.9 फीसदी रही। बीते साल अक्टूबर में 40.07 करोड़ लोग काम कर रहे थे लेकिन इस साल अक्टूबर के दौरान यह आंकड़ा 2.4 फीसदी घट कर 39.70 करोड़ रह गया। इससे पहले अंतररष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी अपनी एक रिपोर्ट में भारत में रोजगार के मामले में हालात बदतर होने की चेतावनी दी थी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बीते चार वर्षोंं के दौरान रोजाना साढ़े पांच सौ नौकरियां खत्म हुई हैं। दरअसल दो साल पहले हुई नोटबन्दी के बाद के छोटे-मोटे उद्योग धन्धे बंद हो गए। जाहिर है कि लोग बेरोजगार हुए और यही नौकरियां कम होने का प्रमुख कारण रहा।
इस दौरान श्रम सहभागिता दर 48 फीसदी से घट कर तीन साल के अपने निचले स्तर 42.4 फीसदी पर आ गई है। यह दर काम करने के इच्छुक वयस्कों के अनुपात का पैमाना है। रिपोर्ट में बेरोजगारी दर में इस भारी उछाल को अर्थव्यवस्था व बाजार के लिए खराब संकेत करार दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार सक्रिय रूप से नौकरी तलाशने वाले बेरोजगारों की तादाद बीते साल जुलाई के 1.40 करोड़ के मुकाबले दोगुनी बढ़ कर इस साल अक्टूबर में 2.95 करोड़ पहुंच गइर्। बीते साल अक्टूबर में यह आंकड़ा 2.16 करोड़ था।
बेरोजगारी पर अब तक जितने भी सर्वेक्षण आए हैं, उनमें आंकड़े अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन एक बात जो सबमें समान है वह यह कि नौकरियों में तेजी से होने वाली कटौती की वजह से हालात लगातार बदतर हो रहे हैं। बीते दिनों अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की ओर से प्रकाशित एक सर्वेक्षण में कहा गया था कि देश में विभिन्न क्षेत्रों में ज्यादातर लोगों का वेतन अब भी 10 हजार रुपए महीने से कम है। स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 शीर्षक वाले इस सर्वेक्षण रिपोर्ट में दावा किया गया था कि रोजगार के क्षेत्र में विभिन्न कर्मचारियों के वेतन में भारी अंतर है। इस खाई को भी पाटना जरूरी है। एक अन्य सर्वे में कहा गया है कि भारत में 12 करोड़ युवाओं के पास फिलहाल कोई रोजगार नहीं है।

निश्चित हों प्रति व्यक्ति काम की अवधि
हरेक व्यक्ति को यदि प्रतिदिन एक निश्चित अवधि के लिए काम दिया जाए तो स्वत: ही अन्य लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। वर्क लाइफ बैलेंस संस्कृति को अपनाया जाए तो रोजगार के अवसर बढऩे की संभावनाएं बनती हैं। इससे आय वर्ग के अंतर को भी कम किया जा सकेगा।

महिला रोजगार की स्थिति भी चिंताजनक
श्रम ब्यूरो की ओर से रोजगार पर सालाना सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट से यह तथ्य सामने आया है कि वर्ष 2015-16 के दौरान देश में बेरोजगारी की दर बीते पांच वर्षों के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई। इसमें कहा गया है कि इसी दौरान महिलाओं की बेरोजगारी दर 8.7 फीसदी तक पहुंच गई। इसके अलावा बताया गया कि देश के 68 फीसदी घरों की मासिक आय महज 10 हजार रुपए है। ब्यूरो ने अपनी इस रिपोर्ट के लिए गत वर्ष अप्रैल से दिसंबर के बीच 1.6 लाख घरों का सर्वेक्षण किया था। हालांकि शहरी क्षेत्रों में हालात कुछ बेहतर हैं। ग्रामीण इलाकों में लगभग 42 फीसदी कामगरों को साल में 12 महीने काम नहीं मिलता। नतीजतन खेती के मौसमी रोजगार पर उनकी निर्भरता बढ़ी है। यह केंद्र में मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद अपनी तरह का पहला सर्वेक्षण है।

वैकल्पिक व्यवस्था है स्टार्ट अप्स, डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया
यहां गौर करने लायक बात यह है कि एक ओर सरकार अगर रोजगार सृजन में विफल होती दिखाई दे रही है तो दूसरी ओर कई ऐसे वैकल्पिक नवाचार सरकार ने शुरू किए हैं कि बेरोजगार युवा केवल और केवल सरकारी नौकरी के पीछे दौडऩे के बजाय अपने भीतर छिपी उद्यमशीलता को पहचान दे। स्वयं भी आत्म निर्भर बने और संभव हो तो कुछ अन्य लोगों को रोजगार दे सकें। उबर टैक्सी, ओयो रूम्स, स्विगी फूड डिलीवरी, जोमैटो, फूड पांडा ये सब इसी के उदाहरण है। परन्तु मेक इन इंडिया परियोजना जिस जोश और उत्साह के साथ घोषित की गई थी, उसका उतना व्यापक प्रभाव युवाओं को रोजगार में दिखाई नहीं दिया। सरकारी योजनाओं के तहत स्वरोजगार के लिए ऋण सहायता आदि प्रयास किए जाते रहे हैं, परन्तु सच्चाई यह है कि जैसे ही कोई सरकारी भर्ती का विज्ञापन जारी होता है, आवेदनों की भरमार लग जाती है।
चतुर्थ श्र्रेणी की सरकारी नौकरी के लिए पीएचडी डिग्रीधारकों, इंजीनियरों द्वारा आवेदन करना महज उपहास का विषय नहीं है। इस तथ्य की गंभीरता पर विचार करना होगा। क्यों सरकारी नौकरी और निजी क्षेत्र की नौकरियों में मिलने वाले वेतन भत्तोंं और अन्य लाभ में इतना बड़ा अंतर है कि डिजीटलाइजेशन के दौर में भी युवा लालफीताशाही का शिकार बन बैठा है?

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