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स्कूली शिक्षा पर हावी कोचिंग

- अशोक मलिक -
एक पीढ़ी पहले तक स्कूल ज्ञानार्जन के केन्द्र हुआ करते थे, जहां शिक्षक मन लगा कर पढ़ाते थे और विद्यार्थी लगन से पढ़ते थे। ट्यूशन या कोचिंग क्लासेस का नामोनिशान नहीं था, बड़े शहरों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इक्का-दुक्का सेंटर होते थे। पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी पास होने के लिए प्राइवेट ट्यूशन लेते थे, जो अपमान की बात समझी जाती थी। उस समय अच्छे विद्यालयों में प्रवेश सफलता की गारंटी थी।
अब शिक्षा बाजार बन गई है, विद्यालयों से शिक्षा का माहौल गायब हो रहा है। गली-गली कोचिंग सेंटर चल रहे हैं। पढ़ाई विद्यालयों में नहीं कोचिंग क्लास में हो रही है और पढ़ाई के नाम पर परीक्षा में पूछे जाने वाले संभावित सवालों के जवाबों का रटंत अध्ययन हो रहा है। लोग गर्व से बताते हैं कि उनके बच्चे अमुक-अमुक कोचिंग क्लास में जाते हैं, अच्छे विद्यालयों में प्रवेश पढ़ाई के लिए नही बल्कि अपना स्टेटस दिखाने के लिए हो रहा है। जिनके बच्चे कोचिंग में नहीं जाते लोग उन्हें कमतर समझते हैं।
हाल ही एक प्रतिष्ठित विद्यालय के गणित के शिक्षक से मुलाकात हुई, उन्होने बातों-बातों में कहा, आज कल विद्यार्थी पढऩे के लिए स्कूल नहीं आते। स्कूल तो हाथी के दांत हो चुके हैं। जिनको पढऩा है, वे सभी कोचिंग क्लास या प्राइवेट ट्यूशन जाते हैं। मैने पूछा, तो फिर इन विद्यालयों की जरूरत ही क्या है? वे तमक कर बोले ‘कभी कोचिंग क्लास वाले भी स्कूल की जगह ले सकते हैं? मैं समझ नहीं पाया जो काम स्कूल को करना चाहिए वह कोचिंग वाले कर रहे हैं तो माता-पिता एक ही काम के लिए दो- दो बार पैसे क्यों खर्च करें?’एक सवाल है-स्कूल हैं तो कोचिंग क्यों, इसी का दूसरा पहलू है कि जब अधिकतर बच्चे प्राइवेट ट्यूशन में सिलेबस पूरा करते हैं तो क्या हमें स्कूलों की जरूरत है? शिक्षा नीति के नए प्रारूप पर चर्चा के इस दौर में यह प्रश्न एकदम समसामयिक और हर अभिभावक के दिल से निकला हुआ लगता है, चाहे अभिभावक किसी भी आर्थिक-सामाजिक हैसियत का हो।
ट्यूशन पढ़ानामानते थे अनैतिक
कुछ दशक पहले तक सभी शिक्षक अतिरिक्त समय में भी नि:शुल्क पढ़ाते थे। विद्यार्थियों के माता पिता के आग्रह करने पर भी न तो वे पैसा लेते थे न ही कुछ और। अधिकांश विद्यालयों में कमजोर या किसी कारण पिछड़ गए छात्रों के लिए नि:शुल्क अतिरिक्त कक्षाएं लगती थीं। कुछ संपन्न माता-पिता अपने बच्चों के लिए प्राइवेट ट्यूशन की भी व्यवस्था करते थे। वैसे, आमतौर पर शिक्षकों से प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाने के लिए हाथ पैर जोडऩे पड़ते थे, क्योंकि वे इसे अनैतिक मानते थे। बहुत मनाने पर ही मानते थे। कहा जा सकता है,समाज ने ही शिक्षक को ट्यूशन व्यवस्था के लिए प्रेरित किया जो आज हमें परेशान कर रही है। अब अध्यापकों और अभिभावकों को प्राइवेट ट्यूशन की लत लग गई है, देखा- देखी ही सही यह हवा बहुत तेजी से फैली है।
प्राइवेट ट्यूशन और कोचिंग क्लासेज बच्चों को अतिरिक्त समय देकर उनकी सफलता की संभावना बढ़ा देते हैं। परिणामस्वरुप छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करते हैं। प्रतियोगिता में सफलता की होड़ ने अभिभावकों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि पढ़ाई में सफलता तभी मिलेगी जब प्राइवेट ट्यूशन ली जाए। गला काट प्रतियोगिता में सफलता ही उद्देश्य है,चाहे जैसे भी मिले। हर अभिभावक अपने बच्चे का भविष्य उज्ज्वल बनाना चाहता है, जिसका शिक्षक और प्राइवेट संस्थान खूब फायदा उठा रहे हैं। मजबूरी में फंसे छात्रों की मदद के लिए शुरू हुआ यह चलन अब जरूरत बन गया है जिसकी चपेट में सब आ रहे हैं।
उक्त सवाल का दूसरा पहलू है, जब अधिकतर बच्चे प्राइवेट ट्यूशन में ही अपना सिलेबस पूरा करते हैं तो क्या हमें स्कूलों की जरूरत है? विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ ट्यूशन के सहारे आगे बढ़े बच्चे को जीवन में सब कुछ बाजारू और खोखला लगेगा और सफलता के बावजूद वे हताशा के अंधे कुँए में गिर जाएंगे। स्कूल शिक्षा बच्चों के व्यक्तित्व विकास की आधारशिला है। ट्यूशन में कैसे बच्चे के व्यक्तित्व का विकास होगा यह सोचने की बात है।
बच्चों को सिर्फ किताबी कीड़ा नहीं समग्र मनुष्य बनाना है तो इस बीमार व्यवस्था को उखाडऩा होगा। शिक्षा क्षेत्र में आए इस परिवर्तन को स्वीकारने का सीधा मतलब होगा बच्चों को जानते बूझते ट्यूशन की लत लगाना। यह समस्या आज इतनी विकराल हो चुकी है कि कोचिंग का महत्व स्वस्थ शिक्षा के केंद्र विद्यालय से अधिक हो गया है। विद्यालय ने प्राइवेट ट्यूशन के आगे घुटने टेक दिए हैं और पूछा जा रहा है कि क्या अब विद्यालय जैसी संस्था का कोई औचित्य है? ट्यूशन एक लत है और अधिकतर लोग इसके आदी हो चुके हैं तो क्या सबको इसी चक्रव्यूह में रहना चाहिए? सबका एक ही जबाब होगा- नहीं! बच्चों और माता-पिता को भी इससे बाहर निकलने की जरूरत है। इस बारे में हाल ही प्रस्तावित नई शिक्षा नीति के कुछ पहलुओं पर नजर डालना उचित होगा।

नई शिक्षा नीति हो सकती सहायक
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के हाल ही जारी प्रारूप में शिक्षण व्यवस्था को मुख्य रूप से चार भागों में बंटा गया है। पहले भाग में विद्यालयी शिक्षा, दूसरे में उच्च शिक्षा और तीसरे में प्रौद्योगिकी, व्यावसायिक व वयस्क शिक्षा को रखा गया है। प्रारूप के चौथे भाग में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग के जरिये शिक्षा में बदलाव लाने की बात कही गई है।
अनेक सरकारी और गैर सरकारी सर्वेक्षणों से यह बात सामने आई है कि वर्तमान में प्राथमिक स्कूल के अधिकांश विद्यार्थी अपनी कक्षा की पुस्तकों को पढऩे, लिखने और गणित के प्रश्न हल करने में सक्षम नहीं हैं। प्रारूप के प्रस्ताव के अनुसार वर्ष 2022 तक स्कूली पाठ्यक्रम और शिक्षण के तरीके में बदलाव किया जाएगा, ताकि बच्चों के रटने की आदत में कमी आए और उनका समग्र विकास हो। उनके भीतर गहन सोच, रचनात्मकता, वैज्ञानिक मनोवृत्ति, संचार, सहयोग, बहुभाषावाद, समस्या समाधान, नैतिकता, सामाजिक दायित्व और डिजिटल साक्षरता जैसी 21वीं सदी के कौशल का भी विकास हो।
इसके लिए शिक्षण पद्धति को 5+3+3+4 के स्वरूप में डिजाइन करने का प्रस्ताव रखा गया है। क्लासरूम को आकर्षक और मजेदार बनाया जाएगा, ताकि बच्चे पढऩे के लिए उत्साहित हों। पाठ्यक्रम सामग्री कम की जाएगी। विद्यार्थियों, विशेष रूप से माध्यमिक स्कूल के छात्रों के लिए विषय चयन के लचीले और ज्यादा विकल्प उपलब्ध होंगे। बच्चे अच्छी तरह समझ सकें, इसके लिए ग्रेड पांच तक उन्हें मातृभाषा में पढ़ाने की सुविधा उपलब्ध कराने की बात भी कही गई है।
प्रस्तावित नीति के तहत यह भी सुनिश्चित करना होगा कि स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों में पढ़ाने वाले शिक्षक जिज्ञासु, प्रोत्साहित करने वाले, उच्च शिक्षित, प्रशिक्षित और गुणों से संपन्न हों। वर्ष 2030 तक शिक्षण के लिए न्यूनतम योग्यता चार वर्षीय लिबरल इंटेग्रेटेड बीएड डिग्री होगी। शिक्षण क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए उत्कृष्ट छात्रों को मेरिट-बेस्ड स्कॉलरशिप प्रदान की जाएगी। इसके तहत हाई स्कूल में बेहतर प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों के लिए, माध्यमिक स्कूल से ग्रेजुएशन तक और कॉलेज व विश्वविद्यालयों में चार वर्षीय इंटीग्रेटेड बीएड प्रोग्राम करने के लिए स्कॉलरशिप देने की शुरुआत की जाएगी।
शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया को कठिन और पारदर्शी बनाया जाएगा, ताकि बेहतर शिक्षकों की तलाश की जा सके। योग्यता और ज्ञान की बेहतर परख के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टेट) व्यवस्था में सुधार किया जाएगा। टेट का दायरा भी बढ़ेगा और प्रीपरेटरी, मिडिल व सेकेंडरी स्कूल एजुकेशन के शिक्षकों के पात्रता की जांच भी अब टेट के माध्यम से होगी। स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करना भी प्रस्तावित शिक्षा नीति का हिस्सा है।
छात्रों के बहुमुखी विकास के लिए कल्पनाशील और व्यापक तौर पर उदार शिक्षण व्यवस्था बनाने की पहल होगी। चुने गए विषय और क्षेत्र में विशेषज्ञता पर जोर दिया जाएगा। देश में लिबरल आर्ट्स शिक्षा प्राचीन काल से ही व्याख्यायित और प्रयोग में है। यह मस्तिष्क के दोनों पक्षों का विकास करता है- रचनात्मक पक्ष और विश्लेषणात्मक पक्ष। स्नातक स्तर पर चुने गए विषय में गहनता और विशेषज्ञता पर जोर होगा। विभिन्न विषयों को संचालित करने वाले संस्थानों में मास्टर्स, प्रोफेशनल प्रोग्राम पर विशेष फोकस किया जाएगा। चार वर्षीय बैचलर ऑफ लिबरल आर्ट्स/ एजुकेशन विषय के विविध पक्षों पर केंद्रित होगा।
नई शिक्षा नीति के तहत, बहुत अच्छे इंस्टीट्यूट भी बनाने का प्रस्ताव है, जहां उच्चतम स्तर का शोध होगा। इसमें यूजीसी, मेडिकल काउंसिल समेत तमाम नियामक संस्थाओं को कई तरह की जिम्मेदारियों को उठाने की बजाय कोई एक काम सँभालने की जिम्मेदारी दिए जाने का प्रावधान है। वर्तमान में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) पैसे भी देता है नियमन भी करता है, मान्यता भी देता है, रैंकिंग भी करता है, यह सब अब नहीं होगा। अब जिस संस्था को गुणवत्ता की जांच करनी है, वह गुणवत्ता की जांच करेगी, जिसे मानक देखना है, वह मानक देखेगी।

छात्रों का दृष्टिकोण
कोचिंग क्लास की कोई जरुरत नहीं
मैं एक कॉलेज स्टूडेंट हूँ और पहली कक्षा से दसवीं कक्षा तक गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ी हूँ। मुझे लगता है बच्चों के लिए कोचिंग क्लास की कोई जरुरत नहीं है। मैं हिंदी मीडियम से पढ़ी हूँ। हमको तो अध्यापक आते थे, पढ़ाते थे और निकल जाते थे। हमको होमवर्क ना करने के लिए कभी कोई दंड नहीं मिला। हमारे अध्यापक अच्छे थे। वे हमारी पढ़ाई कैसी चल रही है उस पर ध्यान देते थे। आप इतने महंगे पब्लिक स्कूल में बच्चों को पढ़ाते है, अध्यापक बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दे सकते है, फिर कोचिंग क्लास की क्या जरुरत? वैसे बहुत सारी माँए खुद पढ़ी लिखी होती हैं जो आपने बच्चों को घर पर भी पढ़ा सकती हैं। भला इतना पैसा क्यों खर्च करना..। अगर आप पढ़े लिखें हो तो आप बच्चों को पढ़ा सकते हैं। मैंने कभी नौवीं कक्षा तक कोचिंग क्लास नहीं लगाई, सिर्फ दसवीं मे लगाई थी। तो भी आज तक मुझे पढ़ाई मे कोई दिककत नहीं आई। अगर स्कूल के अध्यापकों को बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कहा जाए और आप खुद बच्चों को पढ़ाने में सक्षम हों तो कोचिंग क्लास लगाने की जरुरत नहीं।


ट्यूशन के बिना भी सफलता
क्या सुधार करें जिससे ट्यूशन की ज़रूरत नहीं पड़े?
- शिक्षकों से केवल शैक्षिक कार्य कराया जाए।
- विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक हों।
- पालकों की जम्मेदारी निर्धारित की जाए कि वे अपने बच्चों की विद्यालयों में उपस्थिति सुनिश्चित कराएं।
- पालक समय -समय पर विद्यालय में जाकर अपने बच्चों की प्रगति की रिपोर्ट लेते रहें।
- सबसे महत्वपूर्ण है, शिक्षकों की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नही किया जाना चाहिए।
- मुकेश शर्मा, वरिष्ठ अध्यापक, ग्वालियर


व्यापक बदलाव की जरूरत
हमारी शिक्षा नीति और शिक्षा पद्धति में व्यापक बदलाव की जरूरत है, आज जो शिक्षा बच्चों को दी जा रही है, वह उन्हें शिक्षित तो कर सकती है, डिग्री भी दिला सकती है, पर किसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में काम नहीं दिला सकती। क्योंकि यह शिक्षा पद्धति व्यवहारिक नहीं। बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ बुनियादी व व्यवहारिक शिक्षा भी मिले, ताकि जब वह अपनी शिक्षा पूरी कर और डिग्री प्राप्त कर कालेज या यूनिवर्सिटी से निकलें तो उसे नौकरी के लिए दर-दर भटकना न पड़े। वह नौकरी के पास नहीं, बल्कि नौकरी खुद उसे ढूंढती हुई उसके पास आए। जिस दिन ऐसा हो गया, उस दिन हमारा देश फिर से विश्व गुरू बन जाएगा।
- शरयू एस, कॉलेज स्टूडेंट

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