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त्वचा रोग - क्या खाएं क्या ना खाएं

— डॉ. ऋषि भार्गव —
किशोरावस्था यानी 12—13 वर्ष की उम्र से त्वचा पर कील मुहांसे निकलना शुरू हो जाते हैं। ये 19—20 वर्ष की उम्र तक ज्यादा निकलते हैं। इसके दो कारण हैं। एक तो शरीर के व्यस्क होने की प्रक्रिया में नए हार्मोन बनने लगते हैं, जिनसे मुहांसे पनपते हैं। इसके अलावा इसी उम्र के बच्चे शुगर बनाने वाले खाने जैसे आलू, चीनी, चावल, तली चिकनी चीजें, मिठाई, शरबत, ठण्डे पेय और फास्ट फूड का सेवन ज्यादा करने लग जाते हैं।
इन पदार्थों के सेवन से 19 वर्ष से अधिक उम्र वालों के भी मुहांसे होने लग जाते हैं। इन पदार्थों के कम सेवन से निश्चित रूप से मुहांसों में कमी आती हैं। यदि मुहांसे के रोगी दाल, दही, छाछ, हरी सब्जी, सलाद, पनीर का इस्तेमाल करते हैं तो उनके मुहांसे कम होते हैं।

सोरायसिस
सोरायसिस एक वंशानुगत रोग है और किसी भी उम्र में हो जाता है। कुछ कारण ऐसे हैं जिनसे सोरायसिस बार—बार होती है। इन कारणों में चिंता, मौसम का बदलाव, दर्दनाशक दवाईयों एवं शराब का सेवन मुख्य है। शराब का सेवन, बीड़ी-सिगरेट पीने से, तम्बाकू खाने से सोरायसिस होने की आशंका ज्यादा रहती है। खाने में नमक का सेवन कम करने से, मिर्च मसालों का सेवन कम करने से सोरायसिस से बचा जा सकता है।
हरी सब्जियां खास तौर से गाजर, टमाटर खाने से तथा विटामिन सी युक्त पदार्थ जैसे खट्टे फल खाने से सोरायसिस रोग में आराम मिलता है।
रक्त में शर्करा बढाऩे वाले खाद्य पदार्थों से सोरायसिस की समस्या बढ सकती है। कोलेस्ट्रोल तथा ट्राईग्लूराइड कम करने वाले पदार्थों से सोरायसिस में आराम मिलता है।

पेमफीगस
पेमफीगस भी एक वंशानुगत बीमारी है। यह किसी भी उम्र में हो सकती है। जिन खाद्य पदार्थों में थायोल साइनेट तथा फिनोल की मात्रा ज्यादा होती है,उनसे पेमफीगस बढता है। एक वजह ऐसे पदार्थ हैं, जिनमें लहसुन, प्याज, सरसों, ब्रोकली, मूली, पत्तागोभी, अदरक, टमाटर, आम, रसभरी, काजू, पिस्ता, कॉफी, चाय, शराब, आइसक्रीम, बेकफूड मुख्य हैं। इनके अलावा सिन्थेटिक कलर्स तथा दर्दनाशक दवाईयां भी पेमफीगस में नुकसान करती हैं। पेमफीगस के उपचार के लिए स्टेराइड्स का प्रयोग किया जाता है। इसलिए खाने में वसा और शर्करा युक्त पदार्थ नुकसान करते हैं। नमक, मिर्च मसाला, खटाई भी रोगी को नुकसान पहुंचाते हैं।

पित्ती रोग
पित्ती रोग त्वचा में होने वाले रोगों में बहुत ही सामान्य है। किसी भी समय यह रोग शरीर को प्रभावित कर सकता है। त्वचा में जगह-जगह दाफड़ (चकत्ते) हो जाते हैं, जिनमें खुजली की शिकायत रहती है और ये जगह बदलते रहते हैं। थोड़ी देर के बाद शांत भी हो जाते हैं और कई बार उग्र रूप धारण कर लेते हैं, जिसमें होंठ में सूजन, आँखों में सूजन एवं सांस लेने में कठिनाई प्रमुख है।
एंटी स्टेमिन दवाइयां लेने से ठीक रहते हैं। परन्तु कई भोज्य पदार्थों से पित्ती बढऩे का डर रहता है। खेतों में सब्जियों को कीट से बचाने के लिए कीटनाशक पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। घर में गृहणियां जो सब्जी बनाती हैं, उन्हें अच्छी तरह से धोकर, छीलकर बनाया जाता है। उनसे कीटनाशक पदार्थ निकल जाते हैं लेकिन होटल में, विवाह शादियों में, जहां बहुत सारे लोगों का खाना एक साथ बनता है,वहां खाना खाने से पित्ती निकलने की आशंका बनी रहती है, खास तौर पर उन लोगों को, जिनको पित्ती निकलने की प्रवृत्ति रहती है।
इसी प्रकार फलों को भी केमिकल में रखकर पकाया जाता है। ऐसे फलों को भी बिना धोये और बिना छिलका उतारे बिना खाने से भी पित्ती रोग हो जाता है।
सिन्थेटिक कलर, ऐसेंस, प्रिजर्वेटिवज के खाने में प्रयोग से पित्ती हो सकती है। यीस्ट वाली चीजों जैसे ब्रेड, केक के ज्यादा इस्तेमाल से भी पित्ती होती है। सिगरेट तथा शराब के सेवन से भी पित्ती रोग होता है। खाने में नमक कम करने से, ज्यादा मिर्च-मसाला नहीं खाने तथा खटाईयुक्त पदार्थों के सेवन से भी पित्ती निकलती है। दवाईयों के साथ-साथ इन चीजों का प्रयोग कम करने से पित्ती धीरे-धीरे निष्क्रिय हो जाती है।

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