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तीन तलाक की हकीकत

- रिफअत शाहीन -
इधर कुछ दिनों से एक शब्द यायावरी पर उतर आया है .... छोटे-बड़े, साक्षर-निरक्षर,हिन्दू-मुस्लिम,मुल्ला-पंडित खास-ओ-आम,नेता-अभिनेता और खबर-चर्चा, हर जगह ये दो शब्द सुनाई दे रहे हैं-‘तीन तलाक’। यह शब्द-युग्म जो 14 सौ साल पहले अरब की धरती पर जन्मा, वह आज हिंदुस्तान की सर-जमीन पर इस कदर आवारगी से फिर रहा है कि इस पर लगाम कसने कि जरूरत महसूस की जाने लगी है। मोदी सरकार ने इसे कैद करने की कोशिश में दायभागा और मिताक्षरा की भी अनदेखी कर दी। खूब हो हल्ला मचाया इस शब्द ने कि उसे राजनीति का मोहरा क्यूं बनाया जा रहा है ? उसका लेना देना जिस मान्यता से नहीं, वो उसकी आजादी के दुश्मन क्यों बने हुए हैं ? कुछ हद तक बात सच भी प्रतीत होती है, मगर सच तो यह भी है कि शासक पिता तुल्य माना गया है। देश कीसमस्त जनता का प्रतिनिधि। अब जनता किसी भी धर्म जाति की क्यूँ न हो। अगर कोई बात समाज हित में नही है और वो गलत भी है तो शासक का फर्ज बनता है कि वह उसे रोके। मोदी सरकार ने तीन तलाक को रोकने का उद्घोष तो सही किया मगर तीन तलाक की अवधारणा को समझने में जल्दबाजी भी कर दी। इसलिए एक सही फैसला विवादित हो गया। यही गलती हम और आप न करें इसलिए आइए जानते हैं कि तीन तलाक वास्तव में है क्या?

तलाक-तलाक-तलाक
आम धारणा है कि एक मुस्लिम मर्द अपनी पत्नी को तीन बार तलाक-तलाक कहता है और पत्नी निराश्रित हो जाती है। उसके बच्चे और परिवार बिखर जाते हैं। यह जानकारी लोगों को इसलिए भी है कि ऐसा ही हो रहा है। तलाक अरबी भाषा का शब्द है,जिसका अर्थ है आजाद कर देना, अलग करना या अलग हो जाना। तलाक के बारे में कुरान की सूरा, सूरेनिसां-सूरेमाइदा और सूरेतलाक में जो फरमान है, उसकी रोशनी में बात करते हैं क्योंकि तलाक का प्रावधान कुरान से ही है। कुरआन कहता है- ‘‘अल्लाह को जायज चीजों में सबसे ज्यादा नापसंद है तलाक। इस पर सवाल उठता है कि तलाक समाप्त क्यूँ नही कर दिया गया ? सवाल लाजमी है और इसी सवाल में छुपा है तलाक के वजूद का राज। अरबी भाषा में विवाह को अक्द कहते हैं, जिसका अर्थ होता है गिरह, गाँठ, दो सदस्य, दो परिवारों के बीच का जोड़ और तलाक इसी जोड़ को आराम से खोलने का नाम है न कि तोडऩे का। तलाक का विकल्प है, मगर उस हालात में जब पति पत्नी का संबंध इस हद तक बिगड़ जाए कि दोनों आत्महत्या पर विचार करने लगें या फिर एक दूसरे की हत्या की साजिश रचने लगें। तब उनमें से कोई एक तलाक का सहारा लेकर अलग हो जाए और बिना किसी फसाद के अपनी-अपनी जिंदगी अपनी खुशी से जी ले। इसके बाद तलाक कैसे दिया जाए? यह सवाल आता है। तलाक एक लंबी प्रक्रिया है। इसमें जब मर्द औरत में कोई बड़ी गलती, जैसे,विवाहेत्तर संबंध, पत्नी धर्म का पालन न करना आदि पाया जाए तो सबसे पहले उसे प्यार से समझाएं, पत्नी फिर भी न माने तो उसे अपने बिस्तर से अलग कर दे ,वो फिर भी न माने तो थोड़ी नाराजगी दिखाएं ,वो फिर भी न माने तो एक बालिग और समझदार व्यक्ति पत्नी की ओर से और एक ऐसा ही व्यक्ति पति की ओर से आए और दोनों को समझाने की भरपूर कोशिश करे। अगर वह फिर भी न माने तो इन दो गवाहों के सामने पत्नी को एक बार तलाक कहें और तलाक भी तब कहें, जब पत्नी मासिक धर्म से होकर पाकी का नहान कर चुकी हो और इस मासिक धर्म के बाद पति ने उसके साथ संभोग न किया हो। इसे अय्यामे तुहर अर्थात पवित्रता का दिन कहते हैं।
फिर इस एक तलाक के बाद पति पत्नी एक ही घर में रहें बस उनका बिस्तर अलग हो और आपसी प्रेमालाप बंद हो। इस दौरान पत्नी के खाने पीने, दवा इलाज,कपड़े-लत्ते की सारी जिम्मेदारी पति की ही होती है। ऐसी स्थिति तीन मासिक धर्म तक रहेगी। अगर किसी ने गलती से पत्नी को उस समय तलाक दे दी जब वो गर्भवती है तो ये स्थिति बच्चे के जन्म तक रहेगी। इस अवधि को अय्यामे इद्दत कहते हैं। इद्दत अदद से बना शब्द है जिसका अर्थ होता है गिनती करना, क्यूंकि इस समय के एक-एक दिन को जोड़ा जाता है और यह एक तरह से इंतजार का समय होता है। यानी सुधार के इंतजार का, रिश्तों में फिर से गर्माहट लौटने के इंतजाार का और अगर इन तीन मासिक धर्म के बीच दोनों में अनुकूल स्थिति बन जाती है तो दोनों ‘रुजूअ’ कर सकते हैं अर्थात फिर से साथ रह सकते हैं। रुजूअ का अर्थ होता है वापसी । मगर रुजूअ के समय भी दो गवाह जरूरी हैं। ऐसा इसलिए कि कहीं फिर स्थिति खराब हुई और कोई मुकर गया कि हम तो ‘रुजूअ’ ही नहीं हुए। अगर दोनों रुजूअ हो जाते हैं तो तलाक समाप्त लेकिन यदि तीन मासिक धर्म के निकल जाने के बाद पति पत्नी साथ रहना चाहें तो उन्हे फिर से नए मेहर के साथ निकाह करना होगा। इस निकाह को निकाहे जदीद अर्थात नया निकाह कहा जाएगा और न रहना चाहें तो किसी और से निकाह करके अलग भी हो सकते हैं।
अलग होने की स्थिति में, पति को पत्नी की मेहर और स्त्रीधन [दहेज] लौटना होगा। यदि पति विवाह के समय ही मेहर अदा कर चुका है तो फिर ये रकम उस पर देय नही है। ये तो हुई तलाक की प्रक्रिया। अब आते हैं तीन तलाक पर। एक मुस्लिम मर्द एक बीवी को अपनी शादीशुदा जिंदगी में सिर्फ तीन बार तलाक दे सकता है। यहाँ यह बात समझ लें कि, एक ही बार में तीन बार नहीं, बल्कि तीन बार का मतलब है-तीन चांस। दो के बाद वापसी संभव है तीन चांस के बाद नहीं। और हर बार उसे ऊपर लिखे तौर तरीके से ही गुजरना पड़ेगा। चाहे ये तीन, एक साल में हो या तीस साल में । एक बैठक यानी एक बार में तीन बार तलाक, तलाक तलाक कहने का कोई प्रविधान नही है। न कुरान में न शरीयत में। एक ही बैठक में तीन तलाक सिर्फ तलाक का दुरुपयोग है और कुछ नहीं और ऐसा करने वाला सख्त गुनहगार है। वो औरत जिसका निकाह तो हुआ मगर गौना नहीं हुआ,उसके लिए इद्दत का प्रावधान नही है। इद्दत तभी है जब पति पत्नी में संबंध बने हों। इसके पीछे का कारण यह है कि, यह देख लिया जाए कि, औरत गर्भवती तो नही है। यदि है तो उसकी इद्द्त बच्चे के जन्म तक बढ़ जाएगी और हो सकता है कि बच्चे के आने के कारण उनके रिश्ते सुधर जाएँँ। दूसरा बड़ा कारण यह भी है कि अगर तीन महीने औरत को न रोका गया और इस बीच उसका निकाह या संबंध किसी और से हो गया तो बच्चे के असली पिता की पहचान छुप जाएगी और यह बच्चे और उसके जैविक पिता के साथ धोखा होगा।
वो औरत जिसे मासिक धर्म नहीं होता उसकी इद्द्त की मुद्दत तीन महीने होगी। अब अगर ऊपर लिखे तरीके के हिसाब से यह प्रक्रिया वैवाहिक जीवन में तीन बार हो गई तो फिर तलाक- ए- बाएना हो जाएगी अर्थात वो तलाक जिसके बाद पहले पति की ओर लौटने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। ऐसी सूरत में पहला पति उस पर तब तक हराम होता है जब तक मुताल्ल्का औरत (तलाकशुदा) किसी दूसरे मर्द से निकाह न कर ले लेकिन ये निकाह इस नीयत से नहीं होना चाहिए कि औरत को इस दूसरे मर्द से तलाक लेकर पहले पति के पास लौटना है। यह सब स्वाभाविक तौर पर होना चाहिए। मतलब कि तयशुदा नहीं। औरत को तलाक-ए बाएना हुई, उसने अपने अकेलेपन को दूर करने और आश्रय के लिए दूसरा निकाह किया। यदि किसी कारणवश दूसरा पति उसे तलाक दे देता है और पहला पति उसे फिर अपने निकाह में लेना चाहता है तो वो दोनों फिर से निकाह कर सकते हैं अन्यथा नही कर सकते। कस्दन अर्थात भूमिका बना कर दो-चार दिन के लिए किसी से निकाह करना और फिर उससे तलाक लेकर पहले के पास लौट जाना ,सरासर हराम है। इस संबंध में मुहम्मद साहब का कथन है-‘उस शख्स पर खुदा की लानत जो हलाला करे या कराए। हलाला अरबी रूट तहलील से बना है, जिसका अर्थ है घुल जाना ,मिल जाना ,मिक्स हो जाना अर्थात पहले पति के छोड़ देने के बाद किसी और से हमेशा की नीयत से जुड़ जाना। हलाला को हलाल करने के अर्थ में भी लिया जाता है। यानी पहले पति पर तीन इद्दत के बाद जो औरत हराम हो गई वो दूसरे पति से तलाक के बाद हलाल हो जाएगी, बशर्ते कि दूसरा निकाह पहले से योजना बनाकर न हो।
इस नजरिये से देखा जाए तो मोदी सरकार ने एक गलत रस्म को खत्म करने की कोशिश की और लोगों ने इसका विरोध इसलिए किया कि या तो उनको तलाक के पूरे तौर -तरीके बारे में पता नहीं था या उन लोगों ने किया, जिन्हें पूरी जानकारी थी। आधी जानकारी वालों ने इसलिए विरोध किया कि उन्हें लगा ये इस्लाम विरोधी सरकार है और पूरी जानकारी वालों ने इसलिए कि उन्हे शरीयत में हस्तक्षेप करना पसंद नही आया। बहरहाल, एक ही बैठक में तीन तलाक गलत है और ये बात तमाम उलेमा ,फुकहा और अहले दीन भी जानते हैं।

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