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लांघी सारी मर्यादाएं

— जाहिद खान —
गुजरात में विधानसभा चुनाव संपन्न हो गए, परिणाम भी आ गए। भाजपा की सरकार बन गई। चुनाव जीतने के लिए दोनों ही पार्टियों ने धुआंधार प्रचार किया। चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सारी मर्यादाएं लांघ दीं। अपने वक्तव्यों में उन्होंने जिस भाषा और शब्दावली का इस्तेमाल किया, वह प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर बैठे शख्स को शोभा नहीं देता। चुनावी जन सभाओं में एक बार भी नहीं लगा कि वे प्रधानमंत्री के तौर पर लोगों को संबोधित कर रहे हैं। हर वक्त वे भाजपा के प्रचारक बने रहे। बनासकांठा के पालनपुर में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस पर जो इल्जाम लगाए, वे तो अनर्गल बयानबाजी की इंतिहा है। इस रैली में उन्होंने दावा किया कि विधानसभा चुनाव में पाकिस्तान ‘हस्तक्षेप’ कर रहा है। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी का नाम ले-लेकर उन्होंने यहां तक कहा कि मणिशंकर अय्यर के घर पर इन लोगों ने पाकिस्तान के नेताओं से मुलाकात की और यहां गुजरात चुनाव पर भी बात हुई थी। इस मुलाकात पर उन्होंने बड़े ही रहस्यमय ढंग से सवाल उठाते हुए कहा कि कांग्रेस को देश की जनता को बताना चाहिए कि बैठक में क्या योजना बन रही थी ? चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह पहला गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य नहीं था, बल्कि इससे पहले उन्होंने कभी यह कहकर सनसनी फैलाने को कोशिश की थी कि पाकिस्तानी सेना के पूर्व महानिदेशक अरशद रफीक यह चाहते हैं कि गुजरात में सोनिया गाधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल मुख्यमंत्री बनें, तो कभी यह कहकर गुजराती जनता की सहानुभूति बटोरने की नाकाम कोशिश की, कि कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर, उन्हें हटाने पाकिस्तान उनकी ‘सुपारी’ देने गए थे। इन शर्मनाक वक्तव्यों के अलावा ऐसा अनेक बार हुआ, जब उन्होंने अपने भाषण में खुलकर साम्प्रदायिक शब्दावली का इस्तेमाल किया।
उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी पर भी वार किए। इसके बावजूद भी राहुल गांधी ने धैर्य नहीं खोया। मणिशंकर अय्यर ने जब मोदी के लिए नीच शब्द का प्रयोग किया तो उन्होंने तुरंत अय्यर के खिलाफ कार्यवाही की। राहुल ने कांग्रेसियों को चेताया भी कि ऐसा कोई बयान नहीं दें, जो प्रधानमंत्री की गरिमा के खिलाफ हो। इसके उलट मोदी हमेशा कांगेरेस और उनके नेताओं पर तंज कसते रहे।
भाजपा हमेशा कांग्रेस और दीगर विपक्षी पार्टियों पर यह इल्जाम लगाती रही है कि ये पार्टियां, अल्पसंख्यकों का ‘तुष्टिकरण’ करती हैं। भाजपा से भी यह सवाल पूछा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने इन वक्तव्यों के जरिए क्या कर रहे थे ? इन सब बातों से निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री के पद की गरिमा कम हुई है। ऊल-जलूल बयान देकर वे राजनीतिक विमर्श को निचले स्तर तक ले गए, जिसकी एक प्रधानमंत्री से बिल्कुल भी उम्मीद नहीं की जाती। प्रधानमंत्री, अपने पद से बंधा होता है। एक बार इस पद पर पहुंचने के बाद वह अपनी पार्टी का नही, पूरे देश का प्रधानमंत्री होता है। लेकिन इन सब बातों की किसे परवाह है ? यदि परवाह होती, तो सरकार के वरिष्ठ मंत्री प्रधानमंत्री के बयान का बचाव नहीं करते। जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नरेंद्र मोदी के इन घटिया आरोपों पर पलटवार किया और उनसे माफी मांगने की बात की, तो वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि जिन लोगों ने ‘आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकती’ की राष्ट्रीय नीति का उल्लंघन किया है, उन्हें माफी मांगनी चाहिये।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनावी रैलियों में जो झूठ बोले और जो सवाल उठाए , वे इतने बचकाने थे कि उनका जवाब देना भी सरकार के लिए मुश्किल हो गया। पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी यदि भारत आए, थे तो उन्हें वीजा सरकार ने ही दिया होगा या फिर वे बिना वीजा के ही यहां आ गए। भारत-पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक संबंध इस वक्त चाहे जैसे भी हों, लेकिन ऐसे नहीं हैं कि दोंनो देशों के नेता और राजनयिक एक-दूसरे से मिल न सकें। जिस बैठक में देश के पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व उप राष्ट्रपति और पूर्व सेनाध्यक्ष शामिल हों, वह बैठक कम से कम गोपनीय तो बिल्कुल नहीं थी। इस बैठक का सरकार को भी इल्म था। यदि यह बैठक गैरकानूनी थी या फिर इसमें कोई गलत बात हुई है, तो सरकार इसकी जांच क्यों नहीं कराती ? एक बात और प्रधानमंत्री सार्वजनिक तौर पर मणिशंकर अय्यर पर यह इल्जाम लगाते हैं कि अय्यर, उन्हें हटाने के लिए पाकिस्तान उनकी ‘सुपारी’ देने गए थे। गर यह बात सही है, तो उनकी सरकार ने अय्यर के ऊपर अभी तक कार्यवाही क्यों नहीं की ?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान अपने भाषणों में जो बातें कही हैं, वे पूरी तरह से बेबुनियाद और तर्कहीन हैं, इन बातों से निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री के पद की गरिमा कम हुई है। चुनावी राजनीति करते हुए वे यह भूल गए, कि प्रधानमंत्री को किस तरह का बर्ताव करना चाहिए ? उन्हें अपने पद की गरिमा का तो ख्याल है नहीं, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल दीपक कपूर जैसे सम्मानित लोगों की गरिमा को भी उन्होंने अपने कथनों से ठेस पहुंचाई। उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाये। महज एक राज्य का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए, उन्होंने प्रधानमंत्री के पद की प्रतिष्ठा को भी दांव पर लगा दिया। भारतीय लोकतंत्र के लिए इससे ज्यादा और चिंता की क्या बात होगी ?

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एक्सक्लूसिव इंटरव्यू
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