press-vani
  • press-vani
  • press-vani
  • press-vani
भाजपा में रासायनिक बदलाव
March 30, 2017


पीयूष जैन
उत्तर प्रदेश चुनावों के बाद भाजपा में कई रासायनिक बदलाव आ रहे हैं। देश के सबसे बड़े और जातिवाद से बुरी तरह ग्रसित इस राज्य के नतीजों से पूरी पार्टी चकित है। इसका फलित जानने के लिए बेताब है। कई नेता हैं जो अपने पांव चादर से बाहर फैलाने में जुट गए हैं तो अभी तक कुछ ऐसे नेता भी हैं जो अचानक आए इस ज्वार के शांत होने का इंतजार कर रहे हैं।
बदल गए हाव-भाव
सबसे बड़ा बदलाव पार्टी की शारीरिक मुद्राओं में आया है। यूपी से पहले तक जो नेता अपने अति उत्साह के कारण मोदी की डांट खाते रहे हैं वे अब अपनी बात को नए सिरे से, नए उत्साह के साथ कहने के मूड में आ रहे हैं। भाजपा कार्यकर्ता को यह अच्छा लग रहा है कि एकमुखी रुद्राक्ष धारण करने की अनिवार्यता समाप्त हो रही है। अब उनके पास विकल्प है और यह विकल्प अचेतन में दबे बैठे हिन्दू राष्ट्रवाद के उत्साह को नए पंख दे रहा है।
मोदी सतर्क
मोदी इस खतरे की ओर से उदासीन कतई नहीं हैं। यूपी में भाजपा सरकार बनते ही प्रधानमंत्री कार्यालय में यूपी सरकार के निर्देशन के लिए डेस्क बना दी गई। ऐसा करके प्रधानमंत्री ने दो काम बड़ी तेजी से पूरे किए। योगी आदित्यनाथ की सरकार के शपथ ग्रहण करते ही पीएमओ से यह संदेश दे दिया गया कि योगी को स्वतंत्र रूप से काम करने की छूट नहीं दी जा रही है। इसके पीछे इरादा यह सुनिश्चित करना ही था कि योगी कहीं खुली हवा में अपने पंख न तौलने लगें। अब ऐसी डेस्क सभी राज्यों के लिए बनाने की कवायद चल रही है ताकि उग्र हिन्दूवादी नेताओं को नियंत्रण और संतुलन की त्रुटिरहित व्यवस्था के रास्ते पार्टी के लिए उपयोगी बनाया जा सके। फिर भी भाजपा कार्यकर्ता मोदी-मोदी के साथ योगी-योगी के मंत्र का भी जाप करने लगा है और सर्वाधिकारवादी मोदी इससे खुश नहीं हो सकते।
फिर उभरी पुरानी बीमारी
यूपी चुनावों के बाद संघ और भाजपा के मन्सूबों की एक और अंतर्धारा बार-बार सतह पर आने लगी है। वह है राष्ट्रपति शासन प्रणाली की। ज्ञात रहे कि अटलबिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता से बौराई भाजपा ने एक समय संसदीय प्रणाली के स्थान पर राष्ट्रपति शासनप्रणाली का विचार पूरी शिद्दत के साथ उठाया था। पार्टी अपने इस विचार के लिए ग्राहक ढूंढ रही थी कि राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता करे और उसे अमेरिकी राष्ट्पति जैसी शक्तियां दे दी जाएं ताकि वह संसद से ऊपर रहे और जिसके कामकाज में संसद कोई बाधा न डाल सके। उस समय भाजपा को लगता था कि यदि ऐसा होता है तो देश का कोई भी नेता वाजपेयी का मुकाबला नहीं कर पाएगा । संसद के दोनों सदनों में बहुमत पा लेने की ओर बढ़ रही भाजपा, अधिकांश राज्यों में सत्ता में आ जाने की गुंजाइश देखते हुए एक बार फिर, बजरिए मोदी राष्ट्रपति शासन प्रणाली जैसी के लिए गंभीर उधेड़बुन में लग गई है। वह मान रही है कि अपने गुप्त एजेन्डे को पूरा करने के लिए इससे अच्छे हालात फिर पता नहीं कब मिलें। कुल मिलाकर मोदी के सामने योगी का उभरना, नैपथ्य से काम करने वाले भाजपा के रणनीतिकारों के लिए दोनों हाथों में लड्डू जैसा है। यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि भाजपा को दोनों ही लोकप्रिय चेहरे हिन्दूवाद और कट्टर हिन्दूवाद का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और संघ के सामने वाजपेयी या आडवाणी जैसी ऊहापोह भी नहीं है।

 
Leave a Reply

Recent Posts