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फिर गई भैंस पानी में
July 25, 2017


पीयूष जैन

शासन-प्रशासन कई बार तो यह भी भूल जाता है कि किसी इलाके में लगी हुई धारा 144 की अवधि खत्म होने से पहले उसे आगे बढ़ाने का आदेश जारी करना है नहीं तो उसकी अनवरतता समाप्त हो जाएगी। इसी दौरान कोई हुल्लड़ हो गया तो वह इलाके में धारा 144 लगी होने का प्रमाण अदालत में नहीं दे पाएगा। जयपुर में खाचरियावास हाउस के आसपास लगी धारा 144 की अवधि बढ़ाने के आदेश कई बार पिछली तारीखों से जारी हुए लेकिन संतोष इस बात का रहा कि धारा विलुप्त रहने के दौरान कोई हुल्लड़ नहीं हुआ और मामला अदालत के प्रसंज्ञान में लाया ही नहीं गया।
सरकारी कार्यशैली का यह मात्र एक नमूना है और देश में हजारों जगह ऐसी लापरवाहियां होती होंगी। सरकारी नौकरियों में आरक्षण की अवधि बढ़ाने संबंधी अधिसूचना में कभी ऐसी गफलत हुई हो, यह तो पता नहीं लेकिन सरकारी और निजी स्कूलों के करीब आठ लाख शिक्षकों के लिए मार्च 2019 तक बीएड करना जरूरी बनाने का आदेश कुछ ऐसा ही है।
गौरतलब है कि 2010 में शिक्षा का अधिकार विधेयक पारित करते समय शिक्षकों की कमी को देखते हुए स्कूलों (सरकारी व निजी दोनों) में अप्रशिक्षित अध्यापकों की भर्ती की छूट दी गई थी। इन शिक्षकों को मार्च 2015 तक बीएड कर लेने की शर्त पर रखा गया था। लेकिन मार्च 2015 निकल गई और फिर भी देश में 8 लाख से ज्यादा अध्यापक ऐसे रह गए हैं जिन्होंने बीएड नहीं किया है। अब इन शिक्षकों को मार्च 2019 तक यह अर्हता प्राप्त कर लेने का निर्देश दिया गया है नहीं तो उनकी नौकरी खत्म हो जाएगी। इस तरह की घटनाओं से एक बार फिर यह साफ पता चलता है कि सरकारें शिक्षा का स्तर सुधारने को लेकर कितनी फिक्रमंद रही हैं। फिर इस बात को लेकर सरकार से कौन बहस करे कि जो आदमी दस साल से बच्चों को पढ़ा रहा है उसके सामने बीएड की डिग्री क्या मायने रखती है। यदि आप कम्पाउंडर को उसके अनुभव के आधार पर डाक्टरों के समान दवाइयां लिखने की अनुमति दे सकते हैं और अदालतों में आज भी दसियों बुजुर्ग वकील ऐसे होंगे जिन्हें एलएलबी किए बिना ही किसी वरिष्ठ वकील के अधीन काम कर लेने के आधार पर वकालत करने की सनद मिल गई तो इन शिक्षकों ने ही क्या आपकी भैंस मारी है।
सरकार चाहती तो इन बिना डिग्री वाले अध्यापकों के लिए लघु अवधि के पाठ्यक्रम चलाकर और आमुखीकरण व पुनश्चर्या जैसे शिविर लगाकर उनकी कमजोरी को दूर कर सकती थी लेकिन फिर उसे राजनीतिक दादागिरी का अवसर नहीं मिलता। और 2019 चुनावी वर्ष है और यह देख लेना भी जरूरी होगा कि यह विधेयक उस समय क्या-क्या गुल खिला सकता है।
अब तो सरकार को बड़ा दिल रखते हुए यही सोचना चहिए कि,
करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान,
रसरी आवत जात ते, सिल पर पड़त निसान।

 
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