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मौत के लड्डू, जश्न
December 28, 2017


अनिल चतुर्वेदी

अनिल चतुर्वेदी
राजस्थान में 50 मरीजों की मौत पर बांटे गए लड्डू ! जी हां, यही हकीकत है डाक्टरों की 12 दिन चली हड़ताल के समाप्त होने की। राज्य सरकार शुरू में आक्रामक बनी। हड़ताली डाक्टरों की गिरफ्तारी की। उसे हाईकोर्ट की तरफ से भी खुली छूट मिल गई थी। पर आगे और सख्त होने की बजाय बातचीत से समस्या का समाधान निकालने में लग गई। तभी तो बुधवार को समझौता कर हड़ताल खत्म की घोषणा का तालियां बजाकर और लड्डू बांटकर स्वागत किया गया। जश्न इसलिए मना क्योंकि डाक्टरों की मांगें सरकार ने मान लीं।
जश्न ने मानवीय संवेदनाएं कुचल दीं। हड़ताल के दौरान इलाज के अभाव में 50 से ज्यादा मरीजों ने दम तोड़ दिया, इसपर दोनों ही पक्षों ने जरा भी अफसोस नहीं जताया। डाक्टर अपनी मांगे माने जाने पर खुश हुए तो सरकार ने हड़ताल समाप्त होने से चैन की सांस ली। जिनको मरना था वो मर गए। अब चार आंसू बहाने से क्या होगा। मृतक जिंदा तो नहीं हो सकते।
इसे कहते हैं भगवान का पत्थर दिल बन जाना और राजपुरुषों का सिर्फ सियासत से मतलब रखना। इसीलिए वो 12 दिन राज की ठसक में रहे। बात बिगड़ने लगी तो घुटने टेक दिए। उधर, डाक्टर कमर कसे रहे कि इस बार चाहे कुछ भी हो जाए। मरीज बचें या मर जाएँ, वे अपनी मांगें मनवा कर ही रहेंगे।
इन हरकतों को सभ्य और संवेदनशील समाज की मानसिकता कैसे मानी जा सकती है ? सवाल ये भी है कि डाक्टर सरकारी उपेक्षा से क्या इतने परेशान हो गए कि बेखौफ, कर्तव्यहीन बन गए ? उनकी नजर में सरकार यदि निष्ठुर बन चुकी है, तब हमें और आपको भगवान के सिवा कोई बचाने वाला नहीं रहा गया है। क्योंकि डाक्टरों और राजपुरूषों की नूरा कुश्ती का अंत होने वाला नहीं है। इसकी थोड़ी सी झलक तो इस समझौते में ही दिख गई है। सरकार ने डाक्टरों की हालिया मांगें ही मानी हैं, उनकी प्रमुख मांगें, जो लंबे समय से अटकी पड़ी हैं, का हल तो अभी निकला ही नहीं है।

 
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