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इलाहाबाद विवि-गरिमा धूमिल न पड़े
January 01, 2018


अनिल चतुर्वेदी

अनिल चतुर्वेदी
किसी जमाने में उत्तर भारत की शीर्ष शैक्षणिक संस्था मानी जाती थी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी। पर आज जिस हाल में पहुंच जाएगी, इसकी कल्पना नहीं थी। ये वही शिक्षा का केन्द्र है, जिसको पूरब की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी कहा जाता था। क्योंकि इसने एक से बढकर एक शिक्षाविद्, ब्यूरोक्रेट्स, राजनेता देश को दिए हैं। इन हस्तियों की सूची बनाने बैठें तो शायद पन्ने कम पड़ जाएंगे।
अभी जब एक अंग्रेजी अखबार में इसके बारे में पढा तो मन को ठेस पहुंची। पहले पेज पर समाचार छपा था--इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के नाकारा हाल में पहुंच जाने का। ये कड़वी सच्चाई एक ऑडिट में सामने आई है। यूनिवर्सिटी प्रशासन को लेकर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को लगातार कई शिकायतें मिल रही थीं। यूनिवर्सिटी के कुलपति आरएल हंगलू पर भी प्रशासनिक, अकादमिक और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे थे। इन आरोपों की जांच के लिए मंत्रालय के निर्देश पर यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने यूनिवर्सिटी का ऑडिट कराया। छह सदस्यीय ऑडिट टीम ने नवंबर में यूनिवर्सिटी का दौरा किया और हाल में ही अपनी रिपोर्ट यूजीसी को सौंपी।
रिपोर्ट में कुलपति पर लगे आरोपों को तो सही नहीं माना गया। अलबत्ता यह कहा गया कि कुछ ‘सामाजिक कार्यकर्ता बन बैठे सेवानिवृत्त प्रोफेसर’ कुलपति के कामकाज में बाधाएं खड़ी कर रहे हैं। यूनिवर्सिटी पर करीब 300 अदालती मामलों का बोझ है। इनसे निपटते रहने की वजह से विश्वविद्यालय का समय-संसाधन बर्बाद हो रहा है। यूनिवर्सिटी के पास पैसे की बेहद तंगी है और उसके पास भविष्य की भी कोई योजना नहीं है।
ऐसे सोचनीय हालात चंद दिनों में नहीं बनते। राजनीति का घुन किसी भी संस्थान को कैसे खोखला कर देता है, इलाहाबाद विवि इसका प्रत्यक्ष प्रमाण बन गया। राजनीति घृणित नहीं माना जा सकता, बल्कि इसको करने वाले अब अपना ईमान खो बैठे हैं। ऑडिट टीम की रिपोर्ट राजनीति करने वालों के पतन की ओर ही इशारा करती है।
हालांकि इलाहाबाद विवि किसी समय राष्ट्र व राज्य स्तरीय राजनीति का अखाड़ा हुआ करता था। विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, नारायणदत्त तिवारी, मदनलाल खुराना, ज्ञानेश्वर मिश्र जैसे और भी कई राजनेता इसी विवि से राजनीति का ककहरा सीखकर देश-दुनिया में छाए। किंतु वर्तमान में वहां सियासी दांवपेंच का जो माहौल बना है, उसी ने इस विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान को नाकारा बना दिया। कितने अफसोस की बात है ये।
मैं भी इसी विवि का छात्र रहा हूं। इस प्रतिष्ठित संस्थान की आबो-हवा से अच्छी तरह से परिचित हूं। यहां से शिक्षित होकर निकली कई हस्तियां आज भी देश के शासन तंत्र में प्रभावी हैसियत रखती हैं। उन्हें आगे आना चाहिये, अपने शिक्षा के मंदिर की दशा-दिशा सुधारने के लिए। वरना उच्चशिक्षा के एक लब्धप्रतिष्ठित विश्वविद्यालय सिर्फ अपने सुनहरे अतीत के लिए ही जाना जाएगा।

 
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