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हम नहीं तो वो भी नहीं
April 30, 2018



आखिर दिल्ली बुला ही लिए गए। राजस्थान कांग्रेस के जादूगर क्षत्रप ने भांप लिया था कि गुजरात चुनाव की मेहनत रंग ला करके रहेगी। सो ले आई, दिल्ली बुलव्वे के रूप में। वहां उनका कद और पद दोनों ही राष्ट्रीय स्तर का कर दिया गया है। पर मन में तो जयपुर की गद्दी बसी है। बार-बार वो राजस्थान से जन्म-जन्मांतर का जुड़ाव बताए जा रहे हैं। फिर भी, जो ताजा समीकरण बने हैं, उसमें उनकी घर वापसी संभव नहीं लगती है। उनको राष्ट्रीय स्तर पर ही माहिर संगठक की भूमिका निभानी होगी। उनके लंबे सियासी अनुभव को देखते हुए इस चुनौती भरे काम में उन्हें ज्यादा परेशानी होनी भी नहीं चाहिये। किंतु सफलता इच्छा पर निर्भर करेगी। यदि अनमने रहे तो हो सकता है कि घर और घाट दोनों के ही न रह पाएं।
पर ये तय है कि दिल्ली रास आ भी गई तो वे गृहराज्य की सियासत से नजरें नहीं फेर पाएंगे। अगर उन्हें लगा कि इस बार वो नहीं, तब उनका सारा ध्यान रकीब को भी गद्दी से दूर रखने पर केन्द्रित हो जाएगा। प्रदेश कांग्रेस के युवा अध्यक्ष ही हैं वो रकीब, जो करीब-करीब हम उम्र राष्ट्रीय अध्यक्ष से नजदीकी के चलते अपनी राजनीति चमकाए जा रहे हैं। राज्य के चतुर दिग्गज को दिल्ली में स्थापित किए जाने में उनकी कारसेवा भी एक वजह मानी जा रही है।
राजस्थान में कांग्रेस की सत्ता वापसी होती है तो इन दिग्गज की पूरी कोशिश होगी कि रकीब भी राज प्रमुख न होने पाएं। अब वो इस स्थिति में भी हैं कि अपने किसी खासमखास को राजगद्दी पर बिठवा सकें। बशर्ते राज्य में चुनाव होने तक राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ उनकी ट्यूनिंग पक्की हो जाए और वह प्रदेशाध्यक्ष की बजाय उनकी राय से चलने लग जाएं।

 
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