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मुक्ति पाने की कवायद
April 01, 2019


devendra garg
राजस्थान की सभी लोकसभा सीटें निकालने का सत्ताधारी कांग्रेस पर दबाव है। दिल्ली जो फतह करनी है। लिहाजा पार्टी ने दमदार नेताओं को चिन्हित किया है। इनमें एक-दो राज्य सरकार में मंत्री हैं। इन्हें अपना नाम चिन्हितों में होने का पता चल चुका है। पर वे चंद महीनों में ही दूसरे चुनावी समर में उतरने को तैयार नहीं हैं।
उधर, राज्य सरकार के मुखिया सुनहरा भविष्य देखकर अपने चिन्हित सहयोगियों को मनाने में जुटे हैं। वो कह रहे हैं कि नेता के लिए संगठन पहले है। आज पार्टी को जरूरत है, इसलिए वे चुनौती स्वीकार करने से पाछे नहीं हटें। मुखिया महोदय पार्टी के दिल्ली दरबार को भी यह कहकर राजी कर रहे हैं कि उसका निर्णय बिलकुल सही है और उस पर पुनर्विचार न किया जाए।
मुखिया की सक्रियता की एक वजह है। बताते हैं कि उन्हें राज्य मंत्रिमंडल तय करते समय समझौता करना पड़ा था। कुछेक को न चाह कर भी मंत्रिपद सौंपना पड़ गया। अब संसदीय चुनाव में उन्हें ऐसे अवांछितों से मुक्ति पाने का मौका मिला है। इसे वो गंवाना नहीं चाहते। यदि उनकी चल गई तो अवांछितों को चुनाव लडऩा ही पड़ेगा। खुदा-न-खास्ता वे जीत गए तो मुखिया अपने मंत्रिमंडल के खाली स्थान भरने में देर नहीं करेंगे ताकि अपने बिछड़े साथियों को लालाबत्ती सुविधा देकर सत्ता के साथ ही संगठन में भी बढा सकें। ये साथी पहले मंत्रिमंडल गठन में दो सत्ता केन्द्रों के बीच शक्ति संतुलन बनाए रखने के चक्कर में छूट गए थे। मुखिया जी उस समय तो अन्य प्राथमिकताओं के चलते खामोश रहे। पर अब हाथ आए मौके को थाम कर बैठ जाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।

 
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