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दिग्गी बने नाथ
April 01, 2019


devendra garg
नाथ मध्य प्रदेश सरकार के मुखिया तो बन गए। मगर सत्ता की चाबी दिग्गी राजा के हाथ लग गई। ऐसा प्रतीत हुआ है सरकार के ढाई महीनों के कामकाज से। नई सरकार में अब तक जो भी तबादले हुए, अधिकारियों की तैनाती हुई और फैसले लिए गए, सब पर राजा की छाया दिखाई दी है। कुछेक मौकों पर तो असल सात्तधीश को ही लेकर भ्रम पैदा हो गया। सवाल उठने लगा कि मुखिया आखिर है कौन?
ये हाल देखकर ही राजा को प्रदेश से दूर रखने की एक और कोशिश हुई है। उन्हें लोकसभा चुनाव में उतारा जा रहा है। हालांकि उन्हें चुनावी जंग के लिए राजी करना आसान नहीं था। कांग्रेस आलाकमान को काफी मशक्कत करनी पड़ी। तब जाकर राजा तैयार हुए।
राजा राज्य में मजबूत न हों, इसके लिए आलाकमान करीब सालभर से गुंताड़े बिठा रहा था। विधानसभा चुनाव की तैयारियों से राजा को दूर रखा गया। प्रदेश में पार्टी का नया नेतृत्व उभारने के लिए सिंधिया परिवार के युवराज को उतारा गया। उन्होंने नाथ के साथ कंधे से कंधे मिलाकर मेहनत की। दोनों की मेहनत का ही नतीजा रहा कि 15 साल के वनवास बाद कांग्रेस की सत्ता वापसी हुई। आलाकमान गद्-गद् हुआ कि एक साथ दो उपलब्धियां हासिल हुईं। राज मिला और राजा दूर हुए।
पर ये मुगालता चंद दिनों में ही दूर होता दिखा, जब नाथ राजा की शागिर्दी करते दिखे। राजा तो फिराक में बैठे ही थे। फौरन लगे ज्ञान बांटने। नाथ का इस तरह शरणागत हो जाना, लोगों को हैरान कर गया। मगर प्रदेश के राजनीतिक पंडित बिलकुल भी नहीं चौंके। बल्कि वो तो सरकार का मुखिया तय होते ही भांप गए थे कि राजा के खुद के दो शासनकाल में आकंठ उपकृत हुए नाथ अपनी बारी आने पर अहसान-फरामोशी नहीं करेंगे। पंडितों का पूर्वानुमान सही साबित होता देखकर ही पार्टी आलाकमान ने एक और प्रयास के तहत राजा को दिल्ली बुलाने का फैसला लिया है। अब देखना यह है कि खुद राजा के मन में क्या चल रहा है। वो राज्य सरकार के मेंटोर बने रहना चाहेंगे या दिल्ली पहुंचकर फिर से बयानवीर बनना चाहेंगे। चुनावी नतीजे राजा के मानस अनुरूप ही दिखाई दे सकते हैं।

 
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