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टेढी नजर, राह सुगम
April 26, 2019


devendra garg
होता है अचरज यह देख कर कि गांधी परिवार के एक मां-बेटे भाजपा में हैं। कुछ समय से नहीं, सालों से। संघ पसंद नहीं करता। खाटी भाजपाईयों को भी तनिक नहीं सुहाते। फिर भी टिके हैं।
संघ वालों का बस चले तो पल भर में दोनों हो जाएं बाहर। नहीं चल पाई है, इसीलिए कड़वे बोल निकालते हैं। कहते हैं--पड़ा रहने दो उन्हें कोने में। जितना पा लिया वह काफी है दोनों के लिए। और ज्यादा की आस न लगाएं। जो मिला वो कम लगे तो चले जाएं कहीं और।
ऐसी कड़वाहट के बावजूद मां-बेटे भोग रहे हैं सत्तासुख। बेटे जी ने तो कुछ समय को सुर बदला भी। पर चुनावी समर में दुबारा उतारे जाते ही सुर बदल गया। प्रधानसेवक का भजन-कीर्तन शुरू हो गया। मां भी ससुराल वालों पर अंगुली उठाने लगीं। जेठानी व भतीजे-भतीजी भाजपा खेमे के विरोधी नंबर-एक जो ठहरे। आखिर पार्टी आका की नजर में चढते चले जाना ही वजूद बचाने का एकमात्र जरिया है।

 
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