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सिर्फ देसी मीडिया
May 20, 2019


devendra garg
गोदी मीडिया की खूब बातें हो रहीं हैं। खासकर हिंदी और बाकी क्षेत्रीय भाषाओं के प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की। अंग्रेजी मीडिया वाले खीज रहे हैं। अपील कर रहे हैं हिंदी व क्षेत्रीय मीडिया के बहिष्कार की। इनके खीजने की वजह वो खास सरकारी नीति है, जिसने इनकी कमाई को जबरदस्त चोट पहुंचाई है, विज्ञापनों में बड़ी कटौती करके।
प्रधानसेवक शासन के इस नीतिगत फैसले पर सूचना एवं प्रसारण विभाग द्वारा बहुत गंभीरता से अमल किया गया। विभाग में लगातार मंत्री बने रहे राजनेता ने इस काम के लिए विशेष टीम बनाई। टीम में ज्यादातर संघनिष्ठ लोगों को रखा। इनमें मीडियाकर्मी भी शामिल थे। टीम ने बाकायदा रूपरेखा बनाकर सरकारी फैसले को प्रभावी बनवाया है। इस दिशा में वर्ष 2014 में प्रधानसेवक के राजपाट संभालते ही काम शुरू हो गया था।
टीम के एक वरिष्ठ सदस्य ने दो साल पहले ही निजी बातचीत में बता दिया था कि अंग्रेजी मीडिया को किनारे लगाया जा रहा है। उनके विज्ञापनों में कैंची चलाई गई है। इसकी भी वजह उन्होंने बताई थी। कहा था, हमारी सरकार की प्राथमिकता हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं को संबल प्रदान करना है। क्योंकि अधिकांश देशवासी अपनी भाषा को महत्व देते हैं। उनके बीच पैठ बनाने के लिए हमें स्थानीय भाषा के मीडिया को खुश और तृप्त करना है। जहां तक अंग्रेजी मीडिया का प्रश्न है तो उसके पाठक व दर्शक थोड़े से लोग हैं। वे एलीट तबके वाले हैं, जो दक्षिणपंथी विचारधारा से सरोकार नहीं रखते। लिहाजा उन्हें मजबूत करने का कोई मतलब नहीं है। हमारे जो काम के हैं, उन्हें ही बढावा देना है।
सरकार की इस एकपक्षीय नीति से चोट खाई अंग्रेजी दां बिरादरी ही उपकृत भाषाई मीडिया के बहिष्कार की बातें कर रही है। इसके प्रलाप का थमना प्रधानसेवक के मौजूदा राज में तो संभव नहीं लगता है। हां, यदि यही राज रिपीट होता है औऱ ये एलीट मीडिया भी उसकी गोद में बैठने की ये सोचे तब इसके भी दिन फिरने की स्थिति बन सकती है।

 
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