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पुत्रमोह गलत कैसे
November 05, 2019


anil chaturvedi
माता-पिता संतान की चिंता करें तो मुसीबत, न करें तो मुसीबत। न करें तो लापरवाह, करें तो परिवारवाद को बढावा देने की तोहमत। यदि संतान खुद के बलबूते कुछ बन जाए, तब मां-बाप को बड़ी राहत मिलती है। नाहक तोहमतों से बच जाते हैं वे। समस्या होती है औसत बेटा-बेटी के साथ। इनके लिए पिता मन ही मन चिंतित होता रहता है और मां की पीड़ा मुखर हो जाती है।
पिता नौकरी पेशा हो तो ऐसे बच्चों की भी नौकरी लगवाने का प्रयास करता है। व्यवसाई होगा तो उसे अपने साथ काम-धंधे में लगा लेगा। मुसीबत आती है सियासत में। पिता या माता किसी सियासी ओहदे पर हैं, तब उनके लिए औसत संतान को काम पर लगाना मुद्दा बन जाता है। विरोधी, मीडिया, असंतुष्ट सब पीछे पड़ जाते हैं। ऐसी खिंचाई करेंगे, मानो वे सभी नि:संतान हों। या फिर उच्च आदर्शों पर चलने वाले हों और इनके बच्चे पैदाईशी हुनरमंद निकले हैं, जिन्होंने अपना भविष्य खुद संवारा है। वहीं डपोर निकले इनके बच्चे धक्के खा रहे हैं। इन्हीं आदर्शियों में से सियासी माता या पिता ने बच्चों में हल्ले लगाने के लिए कभी किसी से सिफारिश नहीं की।
वैसे इस प्रकार की बातों का सिर्फ बखान किया जा सकता है। सच ये है कि कोई अपनी संतान को मंझधार में डूबने-उतराने को लिए नहीं छोड़ता। तभी तो कहा जा सकता है कि राजस्थान सरकार के मुखिया ने पुत्रमोह दिखाकर कोई अपराध नहीं किया है। आखिर वे सियासत की सांझ में भी पुत्र को स्थापित नहीं करेंगे तो कब करेंगे। सालों संवारी विरासत पुत्र ही तो संभालेगा। अगर वो पिता के गढ में चुनावी मात खा जाए तो क्या उसके लिए आगे के रास्ते बंद कर दिए जाएं। इसे किसी अन्य जगह सेट तो करना ही था। सो खेल संघ की कुर्सी दिला दी। ऐसा करके मुखिया ने पिता होने का फर्ज निभाया है, कोई गुनाह नहीं कर दिया।

 
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