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समाजिक सोच बदलना जरूरी
January 10, 2020


gajanand sharma
— गजानंद शर्मा —
इस साल की शुरुआत में देश में न्याय के सर्वोच्च मंदिर ने निर्भया मामले के दोषियों को फांसी पर लटकाने का आदेश देकर बेटियों को निर्भय रहने का संदेष दिया है। अदालतें अपना काम करती हैं और न्यायिक प्रक्रिया में बहुत समय भी लग जाता है। लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी लाने के लिए सबसे जरूरी है हमारी सामाजिक सोच और संस्कारों में बदलाव लाने की। कानून के डंडे से महिलाओं के प्रति सोच को नहीं बदला जा सकता। राजस्थान पुलिस ने गत दिनों वर्ष 2019 में प्रदेश के थानों में दर्ज हुए विभिन्न मामलों की रिपोर्ट जारी की तो सामने आया कि सबसे ज्यादा मामले छेड़छाड़ के दर्ज हुए हैं। ये वर्ष 2018 की तुलना में 68 प्रतिशत अधिक हैं। पोक्सो एक्ट के तहत भी 44 प्रतिशत मामले ज्यादा दर्ज हुए। इन मामलों में महत्वपूर्ण आबादी और अपराधों के आंकड़ों का अनुपात नहीं महिलाओं के प्रति हमारा सामाजिक सोच है जिसमें बदलाव लाने की जरूरत है।
जरूरत समाज के तानोंबनों को खंगालने और उनको दुरुस्त करने की है। छेड़छाड़ व दुष्कर्म के अनेक मामलों में आरोपित करीब रिश्तेदार व जानपहचान वाले होते हैं। आपसी रिश्तों में आ रही इस गिरावट को थामने की जरूरत है। महिलाओं के प्रति अपराधों पर अकेले पुलिस नहीं काबू नहीं पा सकती। इसके लिए महिलाओं को कमतर मानने के पारम्परिक सामाजिक सोच में बदलाव की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि सामाजिक सोच बदल नहीं रहा। बदल रहा है लेकिन इसकी रफ्तार बहुत धीमी है। इस बदलाव की झलक कॉलेजों में लड़कियों की बढ़़ती संख्या में मिलती है, आईआईटी, मेडिकल कॉलेजों और सीए व प्रबंधन जैसे प्रतिष्ठित प्रवेश परीक्षाओं मे लड़कियों की बढ़ती संख्या में मिलती है। लेकिन शिक्षा के मार्ग पर आगे बढ़ रही बेटियों को रोज किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है,इनकी झलक राजस्थान पुलिस के इन आंकड़ों में मिलती हैं।
छेड़छाड़ और पोक्सो एक्ट के बढ़ते मामलों के सामाजिक अध्ययन की भी जरूरत है और उसके निष्कर्षों के अनुसार सुधारात्क कदम उठाने की भी। यह देखना होगा कि क्या विकास की दृष्टि से पिछड़े क्षे़त्रों में ऐसे मामले अधिक सामने आ रहे हैं या उन क्षेत्रों में जहां समाज का सबसे ज्यादा शिक्षित और संपन्न वर्ग रहता है या सभी क्षेत्रों में एक जैसे हालात हैं। सामाजिक परिवेश में सोशल मीडिया और पोर्न का घुलता जहर इसके लिए कितना जिम्मेदार है, इन सभी पहलुओं पर विचार करना होगा। सामाजिक रिश्तों की डोर कहां कमजोर पड़ रही है और कहां टूट रही है, इस बात को चिन्हित कर फिर सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। परिवार और स्कूली स्तर पर बच्चों को
संस्कारित करने का प्रयास होना चाहिए। य़़त्र नार्यस्तु पुज्यंते रमंते तत्र देवता--की उपदेषात्मक बातों से कुछ सुधार
होने वाला नहीं है। इसलिए स्कूली स्तर पर ही बालिकाओं के सशक्तीकरण, किसी भी शारीरिक हमले का प्रतिरोध
करने व खुलकर बात कहने का वातावरण बनाना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां दूरदराज स्थित स्कूलों में जाना पड़ता है, वहां गांव की पंचायत लड़कियों को सकुषल लाने-लेजाने का दायित्व संभाले। इससे सामूहिक दायित्व बोध जगेगा।
यदि ऐसा होता है तो इससे बदलाव का बड़ा मार्ग प्रशस्त हो सकता है। हमें लड़कियों के लिए सुरक्षित माहौल बनाने के लिए सार्थक कदम उठाने होंगे। राजस्थान इस दिशा में पहल कर एक और बेहतर उदाहरण पेश कर सकता है।

 
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