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पेट की तरफ ही मुड़ते हैं घुटने
March 06, 2017


पीयूष जैन
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी तमाम संपत्ति अपने पुत्र अभिषेक बच्चन और पुत्री श्वेता नन्दा को देने की घोषणा की है। यह घोषणा कुछ एसी शिद्दत के साथ की गई है कि मानो पुत्री को भी संपत्ति में बराबर की भागीदारी देकर महानायक ने कोई अनूठा कार्य किया हो।
अमिताभ अपनी इस करोड़ों की संपत्ति में से थोड़ा सा हिस्सा भी यदि परोपकार के लिए छोड़ देते तो उनकी वसीयत के लाभार्थियों को कोई बड़ा नुकसान होने वाला नहीं था। यह कैसी विडंबना है कि धर्म और नैतिकता के लिए खुद अपनी ही पीठ थपथपाने वाले इस देश में अपनी अर्जित संपत्ति समाज के जरूरतमंदों के लिए छोड़ जाने वालों की संख्या नगण्य सी है। इसके विपरीत अन्य देशों से ऐसे उदाहरण मिलते रहते हैं कि किसी ने अपने जीवनभर की कमाई चैरिटी के लिए दान कर दी। खुद हमारे देश में भी करोड़ों रुपया परोपकार के कार्यों के लिए विदेशी अरबपतियों से ही आ रहा है। ऐसे लोगों में अकेले करोड़पति ही शामिल नहीं हैं, ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने अपनी सश्रम कमाई गई संपत्ति भी समाज को सौंप दी। हमारे देश में भी ऐसे लोग हैं, जो काले या सफेद धन से अरबपति बन गए हैं, लेकिन इनमें से कितने ऐसे होंगे, जिन्होंने मोह-माया से ऊपर उठकर अपनी पूरी धन संपदा परोपकार के लिए सौंप दी।
अभिषेक या श्वेता नंदा, दोनों में से किसी के पास कोई कमी नहीं है। फिर यह संपत्ति उन्होंने स्वयं कमाई भी नहीं है। अमिताभ ने जो कुछ कमाया है, उसके लिए वे स्वयं भी अपने प्रशंसकों और समाज के प्रति कृतज्ञ होने की बात कहते रहे हैं, क्या समाज को उनसे किसी रिटर्न गिफ्ट की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इस पैसे को कमाने में अमिताभ बच्चन ने कितनी मेहनत की होगी, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन इस मेहनत के सुफल पर क्या केवल उनके पुत्र और पुत्री का अधिकार है।

 
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