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सरकार के 'फिक्स' मजदूर

— रतनमणि लाल —
सरकारी नौकरियों में खाली पड़े पदों को भरना आसान प्रक्रिया नहीं है। एक छोटे से पद पर नियुक्ति करने के लिए भी सम्बंधित विभाग को एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है,तब जाकर उस एक पद के लिए विज्ञापन के माध्यम से आवेदन मंगवाए जाते हैं, फिर लिखित परीक्षा या साक्षात्कार होते है। योग्य पाए गए उम्मीदवारों की सूची बनती है और फिर विभागाध्यक्ष या विधिक प्राधिकारी द्वारा नियुक्ति पत्र जारी होता है। लेकिन सरकारी तंत्र में ऐसे कई स्थान और मौके होते हैं जब बेहतर प्रशासन, त्वरित कार्यवाई या उचित प्रत्याशी के अभाव के चलते सरकार को अस्थायी कर्मचारी या अधिकारी नियुक्त करने पड़ सकते हैं। ऐसा पिछले कई दशकों से किया जा रहा है और यह प्रथा केंद्र सरकार और राज्य सरकारों में प्रचलित है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी अपने कई निर्णयों में यह स्थापित किया गया है कि यह सरकार की शक्ति में निहित है कि वह अस्थाई, कार्यकारी, तदर्थ (एड-हॉक), दैनिक भत्ता या संविदा के आधार पर नियुक्तियां कर सकती है, बशर्ते ऐसा करना प्रशासन के हित में हो।
यह बात अलग है कि ऐसे अस्थाई कर्मियों को कुछ समय बाद स्थाई करने के निर्णय पर कोई स्पष्ट नीति अभी तक नहीं है और ऐसे मामलों को अधिकतर न्यायालय तक ले जाने पर ही कोई निर्णय मिल पाता है। पिछले कुछ सालों में तो सरकार की ऐसी ही मंशा प्रतीत होती है कि जहां तक हो सके, आवश्यक पदों पर अस्थाई या संविदा कर्मियों की ही नियुक्ति की जाए, जिससे उन्हें दी जाने वाली सुविधाओं में बचत या कटौती हो सके। ऐसी नियुक्तियां करने के पीछे अधिकतर यही तर्क दिया जाता है कि नियमित तरीके से नियुक्तियां करने में समय ज्यादा लगता है। सक्षम या योग्य प्रत्याशी नहीं मिल पाते, नियुक्तियों की शर्तें बहुत लचीली नहीं होती या रोजगार सृजित करने की प्रक्रिया को बढ़ावा नहीं मिल पाता। ऐसा भी कहा जाता है कि सीमित अवधि के लिए आवश्यक कर्मचारियों या अधिकारियों को स्थाई रूप से नियुक्त करने का कोई औचित्य नहीं है। इसलिए ऐसे पदों पर निर्धारित अवधि के लिए संविदा पर उचित प्रत्याशी को नियुक्त किया जाना ही बेहतर है।
इन सब वजहों से पिछले कुछ सालों में संविदा पर नियुक्ति करने का चलन राज्य सरकारों में बहुत प्रचलित हो चला है और ऐसे विभागों की लम्बी सूची है, जहां संविदा पर कर्मचारी रखे जाते हैं। राज्यों में संविदा पर शिक्षक, इंजिनियर, डॉक्टर या कर्मचारी लगभग हर विभाग में सबसे अधिक प्रचलित और सुना जाने वाला शब्द बन गया है। ऐसा माना जाता है कि इस प्रचलन से स्थाई रोजगार के बजाय रोजगार सृजन पर जोर दिया जा सकता है। वर्ष 2016 में लेबर कॉन्ट्रैक्ट के नियमों को और विस्तृत करके उनके अंतर्गत कई और विभागों को लाया गया है। ऐसे कर्मियों को सीमित अवधि के लिए नियुक्त किया जाता है और उनकी सेवाओं की समाप्ति के लिए कोई अलग से नोटिस देने की जरुरत नहीं है। इस अवधि की समाप्ति पर उनकी सेवाएं स्वत: समाप्त मानी जाएंगी।

ऐसे होता है रोजगार सृजन
देश में जहां बेरोजगारी एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक समस्या बन गई है, वहीं रोजगार सृजन के लिए कई तरह के उपायों पर विचार किया जाता रहा है। इनमें नौकरी के लिए सामान्य अहर्ताओं में ढील देना, आयु सीमा को लचीला बनाना, अनुभव की शर्तों में ढील देना आदि शामिल हैं, लेकिन फिर भी ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जहां सरकारी विभागों में नियमित पद बड़ी संख्या में खाली रहते हैं, और अस्थाई रूप से संविदा पर बड़ी संख्या में कर्मचारियों को रखा जाता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, ग्राम्य या शहरी विकास, वित्त, परिवहन, पंचायती राज आदि ऐसे कई विभाग हैं, जहां लगभग सभी राज्यों में संविदा कर्मी काम कर रहे हैं। ऐसे कर्मचारियों की सेवा अवधि कुछ महीनों से लेकर एक दशक से ज्यादा तक हो सकती है, लेकिन वे नियमितीकरण या स्थाई कर्मचारी का दर्जा नहीं प्राप्त कर पाते।
ऐसे संविदा कर्मियों की सेवा शर्तें स्थाई कर्मचारियों से काफी अलग होती हैं। उन्हें अपने काम करने की एवज में एक निर्धारित मानदेय या धनराशि का भुगतान होता है, किसी प्रकार का कोई भत्ता या बोनस आदि देय नहीं होता, अवकाश के सामान्य नियम उन पर लागू नहीं होते, उन्हें किसी भी प्रकार की शिकायत या अनुशासनहीनता की शिकायत पर हटाया जा सकता है, उन्हें नियुक्ति अवधि के समाप्त होने पर नौकरी समाप्त होने का नोटिस नहीं दिया जाता, उन्हें किसी प्रकार का रिटायरमेंट लाभ नहीं मिलता, काम के दौरान दिवंगत हो जाने पर उनके परिवार के सदस्य को मानवीय आधार पर नौकरी दिए जाने का कोई प्रावधान नहीं है, प्रोन्नति या नियमित इन्क्रीमेंट का प्रावधान नहीं है और जरूरत पडऩे पर उन्हें कहीं भी भेजा जा सकता है।
सवाल यह है कि जब ऐसे संविदा वाले पदों पर काम करने के बाद सरकारी नौकरी करने के तथाकथित लाभ मिलने ही नहीं है, तो लोग ऐसी नौकरी करते क्यों हैं? इसका जवाब भी बड़ा आसान है। सरकार के विभागों से किसी भी तरह जुडऩा ही अपने आप में महत्वपूर्ण और गौरव की बात मानी जाती है, सरकारी नौकरी में नियमित वेतन भले ही कम हो, लेकिन नियमित धनराशि के ऊपर और अतिरिक्त धन कमाने के मौके हमेशा निकल ही आते हैं। साथ ही उस विभाग के लोगों से मिलने, संपर्क बढाने और उससे लाभ उठाने की संभावनाएं बनती हैं, वो अलग।

संविदा नियुक्ति के पीछे
संविदा में जो कर्मचारी रखे जाते है उनकी शैक्षिक योग्यता तथा कार्य तो अन्य कर्मचारियों के समान ही, या कभी कभी उनसे भी बेहतर होता है। उन्हें विभाग द्वारा मिलने वाली सुविधाओं से लगभग वंचित रखा जाता है। मानदेय भी साधारण से कुशल श्रमिकों (स्किल्ड लेबर) से कम दिया जाता है। संविदा कर्मियों के द्वारा अपने अधिकार के लिए किए जा रहे आन्दोलनों के बारे में अक्सर पढऩे, सुनने एवं देखने को मिल जाता है। ऐसा लगता है, मानो कुछ संविदा कर्मी तो फिल्मी दुनिया के उस जूनियर कलाकार की तरह हो जाते है जिनकी भर्ती भी जूनियर कलाकार के रूप में होती है और रिटायरमेंट भी।
ऐसा नहीं है कि संविदा की नौकरी आसानी से मिल जाती है। जब से संविदा पर कर्मचारी रखने की प्रथा लोकप्रिय हुई है, तब से इसके लिए भी प्रक्रिया खासी जटिल हुई है। किसी प्रकार नौकरी मिल भी जाए तो हर 11 माह बाद उसका नवीनीकरण कराना होता है। इसके लिए विभाग के सम्बंधित अधिकारी या विभागाध्यक्ष से आवेदन या विनती करनी पड़ती है, ऐसे में एक आशंका बनी ही रहती है कि इस नियुक्ति का नवीनीकरण होगा कि नहीं। आधिकारिक रूप से माना जाता है कि संविदा पर कर्मचारियों को रखने का मूल उद्देश्य है कि कोई भी नया कर्मी अपने कार्य में लापरवाही न बरते, कार्य में कुशलता बनाए रखे, काम को हलके में न ले, और कार्य को अच्छी तरह सीखे।
क्या हैं नियम
विभिन्न मंत्रालयों/विभागों तथा उनसे संबंधित एवं अधीनस्थ कार्यालयों में अस्थायी कर्मचारियों से कार्यसेवा ली जाती है। इन अस्थाई कर्मचारियों को विभिन्नं मंत्रालयों/विभागों/संबद्ध/अधीनस्थी कार्यालयों की आवश्यकता के अनुरूप नियुक्त किया जाता है।
वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अस्थाई या संविदा पर काम कर रहे कर्मचारियों को भी नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन मिलना चाहिए और यह भी कहा कि 'बराबर काम के लिए बराबरÓ पैसे के सिद्धान्त को मानना होगा। यह मामला पंजाब के अस्थाई कर्मचारियों से सम्बंधित था और सुप्रीम कोर्ट ने स्थाई एवं अस्थाई कर्मचारियों के वेतन में अंतर को कर्मचारी के प्रति प्रताडऩा माना था। कोर्ट ने कहा कि एक ही काम में लगाए गए लोगों के वेतन में फर्क नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि देश में समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत पर जरूर अमल होना चाहिए क्योंकि भारत सरकार ने 'इंटरनेशनल कंवेंशन ऑन इकोनॉमिक, सोशल एंड कल्चरल राइट्स 1966Ó पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें समान कार्य के लिए समान वेतन देने की बात कही गई है। समान काम के लिए समान वेतन की व्यवस्था हमारे संविधान के अनुच्छेद 14 में ही निहित है।
अगस्त 2018 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन बी. लोकुर व जस्टिस दीपक गुप्ता की अदालत ने झारखंड सरकार को पिछले दस साल से संविदा पर काम कर रहे कर्मियों की सेवा चार माह में नियमित करने का आदेश दिया था। साथ ही कोर्ट ने कहा था कि झारखंड सरकार सिर्फ नियमित ही नियुक्ति करे, क्योंकि दूसरे तरीके से नियुक्ति करने से व्यवधान उत्पन्न होता है और अवैध नियुक्ति को बढ़ावा मिलता है।
एक अनुमान के अनुसार, देश में फिलहाल सार्वजनिक क्षेत्र में 50 फीसदी और निजी क्षेत्र में 70 फीसदी कर्मचारी ऐसे हैं, जो संविदा पर काम करते हैं. जहां तक केंद्र के सरकारी महकमों का सवाल है तो 'इंडियन स्टफिंग फेडरेशनÓ की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय महकमों में 1 करोड़ 25 लाख से कुछ अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनमें लगभग 69 लाख कर्मचारी ठेके या संविदा पर कार्यरत हैं। इन संविदाकर्मियों को श्रम कानूनों से मिलने वाले लाभ भी नहीं मिलते हैं, जबकि 'ठेका मजदूर (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम- 1970Ó की धारा 25 (5) (अ) के मुताबिक यदि कोई मजदूर ठेकेदार द्वारा नियोजित है,लेकिन प्रधान नियोजक द्वारा नियोजित श्रमिक के समान ही काम करता है तो उसे वतेन, छुट्टी, कार्यावधि वही प्राप्त होगी जो प्रधान नियोजक के द्वारा नियोजित श्रमिक को मिलती है। इस कानून को संसद में दशकों पूर्व पारित किया गया था लेकिन आज भी यह कानून देश में सही तरह से लागू नहीं है। ज्यादातर राज्यों मे अलग-अलग नामों से बड़ी तादाद में कर्मचारी और मजदूर संविदा के आधार पर नौकरी कर रहे हंै। हर विधानसभा या आम चुनाव के पहले हर राजनीतिक पार्टी इन कर्मचारियों से वादा करती हैं कि वह सत्ता में आई, तो इन कर्मचारियों को नियमित कर देंगी और उन्हें समान वेतन भी देंगी लेकिन सत्ता में आने के बाद ऐसा वादा पूरा नहीं होता।

बिहार का निर्णय
कई राज्य सरकारें अपने स्तर पर संविदा कर्मचारियों की सेवा शर्तें बेहतर बनाने, या उन्हें स्थाई करने की दिशा में कुछ कदम उठाती रहती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2018 में बिहार सरकार ने निर्णय लिया कि राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवा स्थाई होगी। इनके स्थायीकरण के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति ने अपनी 360-पेज की रिपोर्ट में संविदा पर नियुक्त कर्मचारियों का स्थायीकरण कैसे होगा, इसका विस्तार से उल्लेख किया। संविदा कर्मियों की सेवा नियमितीकरण के लिए पूर्व मुख्य सचिव ए.के चौधरी की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति गठित की गई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में इसका विशेष ध्यान रखा है कि संविदा कर्मियों के स्थायीकरण के लिए अपनाए जाने वाले नियम सुप्रीम कोर्ट अथवा हाईकोर्ट के किसी निर्णय के खिलाफ नहीं हों।
समिति का गठन 28 अप्रेल 2015 को किया गया था और उस समय यह कहा गया था कि तीन महीने में समिति रिपोर्ट देगी, लेकिन संविदा कर्मियों की संख्या बड़ी होने के कारण रिपोर्ट तैयार करने में समय लगा, विभिन्न मामलों में न्यायालयों के आदेश का भी अध्ययन किया गया और इस कारण समिति का कार्यकाल बढ़ाया जाता रहा। ध्यान देने योग्य है कि संविदा पर नियुक्त कर्मचारियों की संख्या ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, वित्त, सूचना प्रावैधिकी, पंचायती राज आदि विभागों में अधिक है।

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