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हम संवेदना शून्य हो गए

— आभा शर्मा —
जानलेवा कोरोना वायरस कोविड-19 की महामारी ने पूरी दुनिया का परिदृश्य बदल दिया है। ऐसा नहीं है कि पहले सार्स, इबोला, एंथ्रेक्स जैसे वायरस या प्लेग आदि महामारी का आक्रमण न हुआ हो, लेकिन कोरोना ने जैसा जबरदस्त झटका समूचे विश्व को दिया है, ऐसा पहली बार हुआ है। करीब एक शताब्दी पहले स्पेनिश फ्लू ने भी पूरी दुनिया को ऐसे ही हिला दिया था तब तो स्थितियां और भी विकट थीं। पेनिसलीन जैसी असरकारी दवा का अविष्कार भी तब तक नहीं हुआ था।
कोरोना ने बड़े-बड़े समृद्धशाली देशों तक को झिंझोड़ कर रख दिया है। अमेरिका, इटली, स्पेन, ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में लाखों लोग कोनिड-19 के चलते मौत के शिकार हो चुके हैं। कई स्थानों पर तो स्थिति इतनी भयावह रही कि मृतकों को दफनाने के लिए कब्रिस्तानों में जगह भी कम पड़ गई। भारत में भी लॉकडाउन किया गया और महामारी के व्यापक प्रसार वाले क्षेत्रों में कफ्र्यू लगाना पड़ा। इस दौरान डाक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ, सफाई कर्मी, प्रशासन और पुलिस और कई संगठनों ने सेवा और एकजुटता का प्रशंसनीय परिचय दिया।
ये ‘कोरोना योद्धा’ हर भारतीय को सुरक्षित रखने के लिए प्राणपण से जुटे हुए हैं, पर दु:ख और शर्म की बात ये है कि इस दौरान इन्हें कई स्थानों पर आमजन का अशोभनीय और अमानवीय व्यवहार देखने को मिला। लोग इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं?

कोरोना योद्धाओं पर आक्रमण
विश्व के अन्य देश सिर्फ कोरोना महामारी से लड़ रहे हैं, पर शायद भारत ही एक देश है जहाँ कोरोना योद्धाओं पर आक्रमण जैसी शर्मनाक घटनाएं हुईं हैं। कर्नाटक, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश सहित देश के कई राज्यों से ऐसे अप्रिय समाचार मिले। राजस्थान में भी एक महीने के भीतर टोंक, अजमेर, बारां, बाड़मेर तथा अन्य कई स्थानों पर हमले हुए, जिनमें 100 से अधिक पुलिसकर्मी और करीब 50 चिकित्साकर्मी घायल हुए। राजधानी जयपुर सहित कई जगहों पर सर्वे करने गई स्वास्थ्य कर्मियों को टोलियों को पथराव और विरोध का सामना करना पड़ा।
देश के सर्वाधिक कोरोना प्रभावित जिलों में से एक इंदौर में कोरोना योद्धाओं से असहयोग, दुव्र्यवहार और आक्रमण की घटनाएँ सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुईं। बैंगलूरू में भी सौ से अधिक लोगों द्वारा कोरोना योद्धाओं पर हमला करने की रिपोर्ट्स आईं। मुरादाबाद में कोरोना पॉजिटिव मरीज को लेने आए एम्बुलेंस दल के डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मी दल पर हमला किया गया। पंजाब के पटियाला की वह दर्दनाक घटना भुलाई नहीं जा सकती जिसमें कफ्र्यू पास दिखाने के लिए कहने पर निहंगों के समूह ने पंजाब पुलिस के सहायक उपनिरीक्षक का हाथ काट डाला।
ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार को तुरंत एक अध्यादेश लाना पड़ा, ताकि ‘कोरोना योद्धाओं’ पर आक्रमण करने वाले लोगों पर कठोर कार्रवाई हो सके। क्योंकि जो लोग आपका जीवन बचाते हैं, खुद की जान की परवाह किए बगैर मरीजों की सेवा करते हैं, उनके जीवन से खिलवाड़ की इजाजत नहीं दी जा सकती। जो लोग अपने परिवार से दूर रहकर अपना कर्तव्य कर रहे हैं, यदि उन डॉक्टरों, नर्सों और पुलिसकर्मियों पर हमले होंगे तो मरीजों का इलाज कैसे होगा? आमजन की सुरक्षा कौन करेगा? हर गाँव-शहर ने इस दौरान खाकी के मित्रवत अवतार के दर्शन भी किए हैं। लाठी थामने वाले हाथों ने माइक पर गीत गाकर लोगों को कोरोना के प्रति जागरूक किया है। संकटग्रस्त क्षेत्रों में भोजन वितरित किया है तो बुजुर्गों को जन्मदिन की शुभकामनाओं के वाहक भी बने हैं। कोरोना से लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में खड़े इन कोरोना योद्धाओं के साथ असभ्य, असंवेदनशील व्यवहार को किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।

मौत पर भी संवेदनाशून्य बर्ताव
चेन्नई में एक सुप्रसिद्ध डॉक्टर के परिजनों को उनका शव दफनाने के लिए एक से दूसरे कब्रिस्तान तक भटकना पड़ा। यही नहीं, उनके परिवार के सदस्यों और साथियों पर भी लोगों द्वारा पथराव किया गया। इन जाने-माने न्यूरोसर्जन की सेवाएं शहर में न जाने कितने लोगों ने लीं होंगी, लेकिन उनकी मौत के बाद सबने सम्वेंदनशून्यता की ऐसी नकाब ओढ़ ली कि उन्हें सम्मानजनक अंतिम विदाई देने की शिष्टता दिखाना भी जरूरी नहीं समझा। कोई मदद नहीं मिलने पर उनके डॉक्टर मित्रों ने ही कब्र खोदी और परिजनों को अंतिम संस्कार में सहायता की। ये ह्रदयहीनता का अत्यंत शर्मनाक उदाहरण कहा जा सकता है।
जब एक नामचीन डॉक्टर से लाभान्वित हुए लोग यूँ एक झटके में उनकी सेवा को भुला सकते हैं तो फिर साधारण लोगों के प्रति संवेदनशून्यता पर क्या अचरज किया जाए? राजस्थान के कोटा जिले के सांगोद में एक वृद्धा की मौत के बाद एम्बुलेंस चालक द्वारा शव ले जाने से इनकार करने की घटना सामने आई। गाँव में भी कांधा देने वाले नहीं मिले। ऐसे में उनके बेटे को अपने परिजनों की मदद से मोटरसाइकिल पर शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाना पड़ा। क्या कोरोना ने हमारा आपसी भाईचारा समाप्त कर दिया है?
ऐसी और भी अनेक घटनाएं हुई हैं,जहाँ बिलखते परिजनों को अस्पताल से शव ले जाने के लिए एम्बुलेंस सेवाएं नहीं मिल पाईं। बहुत बार तो डॉक्टरों और पुलिस की समझाइश के बावजूद कुछ महानगरों में कोविड-19 के इलाज के लिए चयनित अस्पतालों से ये खबरें भी आईं कि कुछ परिजन अपने मरीजों की मृत्यु के बाद उनका शव लेने भी नहीं आए। इसे महामारी का खौफ कहें या और कुछ...

संवेदनहीनता के अन्य उदाहरण
मध्यप्रदेश के भिंड शहर में अप्रैल माह में दुबई से लौटे कोरोना पॉजिटिव इंजीनियर को उस वक्त बड़ा धक्का लगा जब वो बीमारी से उबरने के बाद अपने घर पहुंचे। उनके घर के पास लोगों ने एक बोर्ड टांग दिया- ‘यह मकान बिकाऊ है।’ लोग उन्हें घर के दरवाजे पर देखकर अपने घर के दरवाजे बंद करने लगे। दूध वाले और सब्जीवाले को उनके घर के पास जाने से मना करते हैं। ऐसा माहौल बना दिया गया, जैसे उनकी छाया छूने मात्र से पूरे मोहल्ले को कोरोना हो जाएगा। कई जगह कोरोना पॉजिटिव व कोरोना योद्धा किरायेदारों से घर खाली करवाने की बातें भी सामने आईं।
हाल ही में कोरोना को हराकर घर पहुंची एक रेजिडेंट डॉक्टर के साथ भी ऐसा हुआ। मोहल्लेवालों ने उनके फोटो वायरल किये, सब्जी वालों को उनके घर आने से रोका। उन्हें अंतत: पुलिस और प्रशासन की मदद लेनी पड़ी। मीडिया में काम करने वाले लोगों को भी कई प्रकार की मुश्किलें पेश आईं, जब उनके पास-पड़ोस वाले लोगों ने घुमा-फिराकर उन्हें रिपोर्टिंग के लिए बाहर नहीं निकलने की सलाह दी।
इतना ही नहीं, कई जगहों पर अपार्टमेंट्स में रहने वाले लोगों ने अपने ही अहाते में अकेले रहने वाले बुजुर्गों की कुशल-क्षेम पूछना भी अपना कर्तव्य नहीं समझा, मदद करना तो दूर की बात है। सब अपने-अपने घरों के दरवाजे बंद कर खुद में ही सिमट गए हैं। सरकार ने ‘सोशल डिटेंसिंग’ की सलाह दी थी, भावनात्मक दूरियां बढ़ाने की नहीं। एक दूसरे से दुआ-सलाम करना भी छोड़ दिया, आस-पास रहते हुए भी एक दूसरे के लिए अजनबी हो गए।

सुखद और सराहनीय
इस बीच कुछ राहत भरी खबरें भी आईं। कुछ स्थानों पर हिन्दुओं द्वारा मुस्लिम मृतक का अंतिम संस्कार किया गया। किसी और जगह मुस्लिमों द्वारा ‘राम नाम सत्य’ बोलते हुए हिंदू पड़ोसी की शवयात्रा निकालने की खबरें आईं। कई संस्थाएं और स्वयंसेवी संगठन, प्रशासन तथा पुलिस की मदद के लिए आगे आए और जरुरतमंदों को राशन-भोजन उपलब्ध करवाने का काम किया। यह बड़ी राहत की बात है कि मानव संवेदनाएं पूरी तरह से खत्म नहीं हुई हैं। कहा भी जाता है कि बांटने से दु:ख आधा हो जाता है। कितना ही अच्छा हो यदि कोरोना के टीके की खोज के साथ ही कोई ऐसी दवा भी निकल आए, जिससे लोगों की स्वार्थपरता और संवेदनहीनता का वायरस भी खत्म हो जाए।

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