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ऐसी बेबसी आगे न दिखे

— अनिल चतुर्वेदी —
पैर सूज गए..बिवाईयां फट गई...छाले पड़ गए, लेकिन घर जाने के जुनून के आगे ये असहनीय पीड़ा भी बैनी हो गई। जरा सोचिए, किस दिमागी उलझन और तनाव में एक इंसान अपनी कर्मस्थली से वापस घर लौटने को मजबूर हुआ है। वह भी खुद के पांवों पर। देश के करोड़ों लोग ऐसे ही पैदल निकले हैं सडक़ों पर। उनके पेट की आग की जलन ने उस बीमारी तक के खौफ को काफूर कर दिया, जिसे कुछ विशेषज्ञ प्रलय का एक रूप बता रहे हैं।
ऐसे बेबस मजदूरों और काम-धंधे वालों का महा-पलायन देखकर तथा सुनकर किसी भी इंसान का दिल पसीज जाए। संवेदनाएं कराह उठें। सवाल उठने लगें..आखिर क्यों इनकी दुर्गति बनाई गई? क्यों इन्हें इनके हाल पर छोड़ा गया? है किसी के पास इन सवालों का संतोषजनक जवाब...शायद नहीं। तभी तो राज को श्रमिक स्पेशल ट्रेनें व बसें चलानी पड़ीं। रास्ते में इनके खाने-पीने का इंतजाम करना पड़ा। अदालतों को इस मामले में टीका-टिप्पणी करनी पड़ी। नियोक्ता अपनी श्रमशक्ति के नोहरे खाने लगे।
आत्मग्लानि में ये सारी कवायदें हुई, लेकिन देश के माथे पर स्याह दाग उभरा आया है। आजादी के समय हुए पलायन के बाद इस मजदूर पलायन का काला अध्याय भी इतिहास में दर्ज हो चुका है। आगे जब भी इसपर चर्चा होगी तो किन-किन बातों पर गौर किया जाएगा, इस बारे में अब कुछ कहना व्यर्थ है। अब तो हमें और राज-तंत्र को अपने-अपने सर्फ से काले धब्बे को जितना हल्का हो सके, करना होगा। इसके लिए तंत्र चाहे तो एक काम पर फोकस कर सकता है। उसे अगले कुछ सालों तक सिर्फ देशवासियों की शिक्षा और स्वास्थ पर ध्यान केन्द्रित कर देना चाहिए। इन दोनों विषयों पर आधारित बजट बनाकर सारे संसाधन इन्हीं को अर्पित कर देने चाहिए।
मौजूदा समय में कोरोना से लडऩे में देश की चिकित्सा व्यवस्था की बेहाली दिखाई दी हो या फिर सोशल डिस्टेंसिंग समेत जरूरी सावधानियों की पालना में लोगों की अज्ञानता उजागर हुई हो, दोनों ही समस्याओं के मूल में शिक्षा व स्वास्थ का खोखला विकास ही उभरकर सामने आया है। लिहाजा, भविष्य में हमें आत्मनिर्भरता में ईमानदारी दिखानी है तो पहले लोगों को शिक्षित और स्वस्थ बनाने में अति-ईमानदारी बरतनी होगी।
यह अंक मजदूरों भाईयों को ही समर्पित किया जा रहा है। हमने दिखावे में तो मजदूरों को राहत पहुंचाने का कोई काम नहीं किया। मगर उनके दर्द को उजागर करने में जो थोड़ा-बहुत बन पड़ा, उसे करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस अंक में भी मुख्य रूप से उनपर ही बातें की गई हैं। इस उम्मीद के साथ कि काश! आगे कभी ऐसी दु:खभरी और दिलो-दिमाग को झकझोर देने वाली घटनाओं पर कलम न चलाना पड़े।

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हम लोगों की बात...
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