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क्रिकेट का जुनूनी 'दादा

प्रयागराज (इलाहाबाद) के मेरे बाल-सखा उत्पल दास! जिनको हम दादा कहकर पुकारते हैं। वर्षों बाद उनसे मिलाकर लगा कि क्रिकेट के प्रति उनके भीतर गजब का जुनून है। युवा अवस्था में हम साथ खेला करते थे। सागर स्पोर्टिंग क्लब था हमारा। बाकी साथी कुछ समय बाद नौकरी पेशे या व्यवसाय में व्यस्त हो गए। किंतु दादा वहीं ठहर गए। वहीं दारागंज मोहल्ले में, वहीं खेल के मैदान पर।
बस, उम्र के साथ बदलाव यह हुआ कि अब दादा खुद नहीं खेलते, बच्चों को खिलाते हैं। खुद ने तो बिना कहीं कोचिंग लिए क्रिकेट खेला, लेकिन बच्चों को क्रिकेट के गुर माहिर कोच की तरह सिखाते हैं। पूरी लगन के साथ। दीन-दुनिया से दूर रहकर, तन-मन और धन से। करीब तीस साल हो चुके हैं, दादा कहीं न आते हैं न जाते। बस, घर से मौदान और मैदान से घर। उनकी सामाजिकता, मेल-मिलाप सब कुछ मौदान तक सिमट गया है।
73 साल के हो चुके उत्पल दादा उम्र के इस पड़ाव में भी काफी सक्रिय हैं और विप्लव कोचिंग क्लब चला रहे हैं। इनके शिष्यों में दस साल के भी बच्चे हैं तो 30-35 साल के अधेड़ भी। शिष्यों की संख्या 45-50 तक है। दादा से सीखने के लिए उभरते क्रिकेटर रोजाना दोपहर बाद तीन बजे से संगम क्षेत्र के परेड ग्राउंड पर जुटते हैं। क्रिकेट खेलने के बाद स्टेमिना बनाने के लिए सभी कुछ देर फुटबाल खेलते हैं। भीषण गर्मी हो या बारिश, दादा की कोचिंग जारी रहती है। हालांकि सर्दियों में व्यवधान पड़ जाता है। मैदान उनसे छीन लिया जाता है। माघ में लगने वाले मेले के लिए। यही मेला हर छह साल में अद्र्ध कुंभ औऱ 12 साल में कुंभ में तब्दील होता रहता है।
मतलब, दादा की कोचिंग क्लास हर साल दस महीने ही चल पाती हैं। मेले की तैयारियों के लिए परेड ग्राउंड तार डालने, खंभे लगाने और टेंट स्थापित करने के लिए खोद डाला जाता है। मेले की समाप्ति पर मैदान फिर से खेलने लायक बनाने में दादा और उनके शिष्य जमकर पसीना बहाते हैं। ये उनकी सालाना कवायद है। सर्दियों में क्लब के बच्चे विभिन्न टूर्नामेंट खेलने में व्यस्त हो जाते हैं।
इलाहाबाद में पिछले 20-25 साल में जो भी क्रिकेटर उभरे हैं। उनमें से ज्यादातर किसी न किसी समय उत्पल दादा से कोचिंग ले चुके हैं। उन्होंने क्रिकेट का ककहरा विप्लव क्लब में ही सीखा है। दादा के सिखाए चेलों में अंकुर पाठक, प्रीतेश सोनकर, श्याम यादव, अमित कुशवाहा, ऐमन सिद्दीकी, रवीन्द्र सोनकर, कार्तिकेय यादव आदि बीनू मांकड व सीके नायडू टूर्नामेंट में राज्य का प्रनिधित्व कर चुके हैं। इनमें से कुछ ने विश्वविद्यालय टीम में स्थान बनाया है। अनुपम कुमार राष्ट्रीय अंडर-19 टीम के साथ श्रीलंका का दौरा कर चुके हैं। मगर समस्या यह है कि दादा के क्लब में मॉडर्न सुविधाओं का घोर अभाव है। खेल का सारा सामान यहां-वहां से जुगाड़ा गया है। कहने को क्लब के पास तीन प्लास्टिक की कुर्सियां भी हैं, जो कोचिंग के समय मैदान पर रख दी जाती हैं। किंतु इनमें से दो कुर्सियां टूटी हैं। दादा से मिलने आने वालों को इन्हीं कुर्सियों पर जैसे-तैसे बिठाने का जतन किया जाता है। दादा खुद एक कुर्सी पर बैठ-बैठे कड़क आवाज में, खेलते बच्चों को कभी शाबाशी देते तो कभी फटकार लगाते रहते हैं। कुछ साल पहले तक दादा भी बच्चों के साथ खेला करते थे, लेकिन चढती उम्र के कारण अब वो दौड़-भाग नहीं कर पाते। ज्यादा देर खड़ा रहना भी उनके लिए मुश्किल होने लगा है।
उत्पल दादा रोडवेज में नौकरी किया करते थे। शादी नहीं की। नौकरी के दौरान उन्होंने जमा-पूंजी भी नहीं बनाई। जो वेतन मिला करता था, सब खुद पर या खेल पर खर्च हो जाता। रिटायर होने पर पैसे की तंगी सताने लगी तो सिर्फ उन शिष्यों से 200 रु महीना लेने लगे, जो घर से थोड़ा सम्पन्न हैं। वर्तमान में थोड़े से चंदे औऱ खुद की पेंशन से दादा का कोचिंग चल रहा है।
दादा के क्लब में संसाधनों की कमी की वजह से ज्यादातर बच्चे क्रिकेट के बुनियादी गुर सीख वहां से निकल जाते हैं। वे कोई संसाधन-सम्पन्न क्लब या क्रिकेट अकादमी ज्वाइन कर लेते हैं। यदि कोई भामाशाह या कॉर्पोरेट घराना वित्तीय सहयोग के लिए आगे आए तो उत्पल दादा की कोचिंग भी अच्छे क्रिकेटर तैयार कर सकती है। जुनूनी दादा औऱ सहयोगी भामाशाह मिलकर क्रिकेट की बेहतरीन नर्सरी तैयार कर सकते हैं। - संपादक

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