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‘आप’ की जीत का आशय क्या?

— विनोद वाष्र्णेय —
हाल ही में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीतकर राजनीतिक पर्यवेक्षकों चौंका दिया। यह जीत इसलिए बड़ी है क्योंकि उसकी टक्कर देश की सबसे विशाल, संसाधन व कार्यकर्ता प्रचुर और न केवल केंद्र में, बल्कि दिल्ली के तीनों नगर निगमों में सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से थी। फिर, चुनाव भाजपा ने दमदार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा था जिनके नेतृत्व में नौ महीने पहले पार्टी 56 प्रतिशत मत के साथ दिल्ली की सभी सातों लोकसभा सीटें जीती थीं।
दिल्ली के चुनाव में भाजपा ने प्रधानमंत्री मोदी, पार्टी के चुनाव-चाणक्य गृह मंत्री अमित शाह, दर्जन भर केंद्रीय मंत्री, हरियाणा के मनोहर लाल खट्टर, उत्तर प्रदेश के योगी आदित्य नाथ और बिहार के नीतीश कुमार सहित आधे दर्जन मुख्यमंत्री, 200 सांसद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हजारों कार्यकर्ताओं को प्रचार में झोंक दिया था। अमित शाह तो जनसम्पर्क शैली के प्रचार में गली-गली पर्चे बांटने के लिए खुद उतरे। इससे पूरी दिल्ली के भाजपा कार्यकर्ताओं में जबरदस्त सक्रियता आ गई और उन्होंने प्रचार में पूरी ताकत लगा दी। जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा ने शिरोमणि अकाली दल, जनता दल (यूनाइटेड) और लोक जन शक्ति पार्टी का गठबंधन भी बनाया। अकाली दल ने पहले तो नाराजगी दिखाई और कोई सीट नहीं ली, लेकिन मतदान से कुछ दिन पहले वह भाजपा का समर्थन करने को राजी हो गई।
शक नहीं कि भाजपा 2 करोड़ की आबादी वाले इस शहर-राज्य में सत्ता पाने को बहुत लालायित थी, जिसकी एक प्रमुख वजह थी कि देश की राजधानी होने के नाते इस पर न केवल पूरे देश की, बल्कि सभी प्रमुख देशों की नजर रहती है। दिल्ली एक तरह से पूरे देश का एक लघु प्रतिरूप है। इसके अलावा संभवत: नागरिकता संशोधन कानून बन जाने के बाद देश में जगह-जगह चल रहे विरोध के सन्दर्भ में भाजपा कम-से-कम दिल्ली के मतदाताओं से इस पर स्वीकृति की मुहर चाहती थी। झारखण्ड में पराजय के बाद यहां जीतना उसे राजनीतिक रूप से बहुत जरूरी लगता था।
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में दिल्ली में कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए जिनमें पथराव, बसें और कारें जलाने की घटनाएं भी हुईं। पुलिस ने जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में लाइब्रेरी में अंदर घुसकर छात्रों को पीटा। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में नकाबपोश लोगों ने पुलिस की मौजूदगी में छात्रों को पीटा। लेकिन सबसे अधिक चर्चित हुआ शाहीन बाग में महिलाओं का सडक़ पर धरना और वहां पुलिस की मौजूदगी में गुंडों की दो दिन हवा में फायरिंग। महिलाओं के धरने से नोएडा-दिल्ली के बीच ट्रैफिक अवरुद्ध हो गया था, जिसे सुरक्षा के नाम पर अन्य वैकल्पिक मार्गों पर ‘बैरिकेड’ लगाकर अवरोध पुलिस प्रशासन ने और बढ़ा दिया था। भाजपा ने लोगों को आवागमन में हो रही परेशानी का ठीकरा पुलिस की जगह आम आदमी पार्टी पर फोड़ा।
विद्वेष फैलाने के मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के पुत्र प्रवेश वर्मा ने, जो 2019 में पश्चिमी दिल्ली से दुबारा लोकसभा सदस्य चुने गए थे, सारी हदें तोड़ दीं और यहां तक कहा कि ये लोग (मुस्लिम प्रदर्शनकारी) आपके घरों में घुस जाएंगे और बलात्कार करेंगे। केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने जनसभा में नारे लगवाए, ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को।’ इन दोनों स्टार प्रचारकों पर नफरत फैलाने के आरोप का संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग ने उन पर दो दिनों के लिए प्रचार करने पर रोक लगा दी। गोली की बात को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने यह कह कर और आगे बढ़ाया कि जो ‘बोली’ से नहीं मानेंगे वे ‘गोली’ से तो मानेंगे।
और सचमुच दो दिन हवा में गोली चलाने वाले भी वहां पहुँच गए। दुखद यह कि पहले दिन जब गोली चलाई जा रही थी तो दर्जन भर पुलिस जवान पास में ही मौजूद थे। बदजुबानी यहीं नहीं थमी। आप से पाला बदलकर आए भाजपा उम्मीदवार कपिल मिश्रा ने इस चुनाव को भारत पाकिस्तान के बीच मैच बता दिया, जिसमें उनका निहित आरोप था कि कुछ राजनीतिक दल पाकिस्तान की टीम बने हुए हैं। उन्होंने यह भी कह डाला कि आम आदमी पार्टी को अपना नाम बदल कर ‘मुस्लिम लीग’ रख लेना चाहिए। इस तरह प्रवेश वर्मा और भाजपा उम्मीदवार ओम प्रकाश शर्मा ने केजरीवाल को न केवल ‘आतंकवादी’ कहा, बल्कि पाकिस्तान सेना का प्रवक्ता और टुकड़े-टुकड़े गैंग को समर्थन देने वाला करार दे दिया।
ऐसी बयानबाजी ने दिल्ली की लोकतान्त्रिक चुनाव स्पर्धा को बेहद कटु और अप्रिय बना दिया। सोशल मीडिया पर तो ऐसा गजब का कोहराम मचा कि लगा कि तथ्य और सत्य का कोई वजूद रहेगा भी या नहीं। शहर भर में मोदी के फोटो वाले बड़े-बड़े होर्डिंग जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाने व नागरिकता संशोधन कानून लाने की कामयाबी के बखान और ‘जहाँ झुग्गी वहीं मकान’ देने के वायदे के साथ वोट मांग रहे थे। जनसभाओं और रैलियों में भाजपा नेता दिल्ली में पिछले 50 दिनों से शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून वापस लेने की मांग करते हुए महिलाओं के चल रहे धरने को बहुत बड़ा मुद्दा बनाकर देश के गद्दारों को ईवीएम के जरिए सबक सिखाने की मांग कर रहे थे।
अमित शाह ने कहा कि ईवीएम पर इतने जोर से बटन दबाना कि करंट शाहीन बाग तक जाए। राष्ट्रवाद को जिस आक्रामक ढंग से भाजपा नेताओं ने उछाला, उससे लगा कि देश में केवल वे ही राष्ट्रवादी हैं और जो भी भाजपा के खिलाफ बोले वो बहुप्रचारित ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का समर्थक यानी देशद्रोही है। फिर भी भारतीय जनता पार्टी 70 में से महज 8 सीटें जीत पाई।
दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी कहते ही रह गए कि ‘एग्जिट’ पोल की मत मानो जिस दिन इसके नतीजे आएंगे, उस रोज लोग पाएंगे कि बीजेपी 48 सीटें जीत चुकी है। किसी भी तर्क से केजरीवाल को बदनाम करने से भाजपा नेताओं को लगता था कि इससे उनके वोट बढ़ रहे हैं लेकिन चुनाव में करारी शिकस्त के बाद गृहमंत्री अमित शाह को कहना पड़ा कि संभवत: अतिवादी बयानों की वजह से हम हारे।

कैसे मिला ‘आप’ को इतना समर्थन?
लेकिन सचमुच यह सवाल बड़ा मौजूं हो गया है कि आखिर आम आदमी पार्टी इतने विशाल बहुमत से कैसे जीत गई ? पांच साल पीछे जाएं, तो पाते हैं कि 2015 के विधानसभा चुनाव में भी इस पार्टी ने अप्रत्याशित रूप से 70 में से 67 सीटें जीतकर सबको अचम्भे में डाल दिया था। लेकिन जिस तरह 2017 में दिल्ली के तीनों नगर निगमों में और फिर उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में इसकी बुरी गत हुई, अधिसंख्य चुनावी पंडि़त चुनाव प्रचार के शुरूआती दौर में इस पार्टी को 35 से अधिक सीटें देने को तैयार नहीं थे।
फिर ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस और भाजपा, दोनों की ओर से केजरीवाल सरकार को एकदम नाकामयाब बताने की होड़ के दौरान भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता की वजह से बजट का पैसा पूरा खर्च न कर पाने और देशद्रोहियों को शाहीन बाग में बिरयानी खिलाने सहित हर तरह के आरोप झेल रही इस छोटी-सी, बिना विरासतवाली पार्टी ने एक बार फिर दिल्ली विधानसभा चुनावों में लगभग 89 प्रतिशत सीटें जीत लीं।
सवाल यह है कि क्या सचमुच केजरीवाल सरकार ने ऐसा काम किया है कि जिस भाजपा को दिल्ली के मतदाताओं ने 9 महीने पूर्व दिल्ली की सभी सातों लोकसभा सीटों पर भारी बहुमत से जिताया था, उसे विधानसभा चुनाव में पूरी तरह नकार दिया। दिलचस्प आंकड़ा यह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को दिल्ली में 56.8 प्रतिशत मत मिले थे और आम आदमी पार्टी को महज 18.2 प्रतिशत। अब 2020 विधानसभा चुनाव नतीजों के आंकड़े हैं दिल्ली के मतदाताओं ने भाजपा और इसके सहयोगी दलों को संयुक्त रूप से 39.8 और आम आदमी पार्टी को 53.6 प्रतिशत मत दिए। 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और आम आदमी पार्टी ने क्रमश: 32.2 और 54.3 प्रतिशत मत हासिल किए थे। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि जहाँ आम आदमी पार्टी ने अपने मत प्रतिशत को लगभग बरकरार रखा वहीं भाजपा ने भी सहयोगी दलों की मदद से अपने मत प्रतिशत में 7.6 प्रतिशत की वृद्धि की।
पर, अनेक राजनीतिक विश्लेषक इस जीत को मुफ्त सेवाओं से जनता को बहका कर हासिल की गई जीत बता रहे हैं, तो उससे बड़ी संख्या में ऐसे समीक्षक भी हैं जो तर्क देते हैं कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में शासन का एक नया मॉडल पेश किया, जिसे आम मतदाताओं ने पसंद किया है। इस प्रशासनिक प्रतिदर्श (मॉडल) में टार्गेटेड सब्सिडी एक मुख्य तत्व है। माना जा रहा है कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बिजली, पानी आदि को वरीयता देना सरकारों में नया ट्रेंड बन सकता है, जिसके बारे में कुछ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि यह समाज के सौहार्द को नष्ट करने वाली राजनीति के वर्तमान दौर से भी निजात दिला सकता है।
कांग्रेस को भी ठुकराया
आम आदमी पार्टी की धमाकेदार जीत का क्या रहस्य था, इस पर चर्चा करने से पहले सत्ता की एक अन्य बड़ी दावेदार पार्टी, देश में सबसे लम्बे समय तक राज करने वाली तथा दिल्ली में 1998 से लेकर 2013 तक लगातार 15 वर्ष तक राज करने वाली कांग्रेस का जिक्र करना जरूरी है। कांग्रेस के नेताओं का आकलन था कि उनका बुरा वक्त खत्म हो चुका है और इस बार उसके लिए अच्छे अवसर हैं। याद रहे, 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई थी और उसका मत प्रतिशत 9.7 रह गया था और खुद 15 साल से मुख्यमंत्री चली आ रहीं शीला दीक्षित चुनाव हार गई थीं। पर, 2017 में हुए दिल्ली के नगर निगम चुनावों में कांग्रेस का मत बढक़र 20.1 प्रतिशत हो गया और 2019 के लोकसभा चुनाव में तो वह भाजपा के बाद दूसरे स्थान रही और मत प्रतिशत 22.6 प्रतिशत हो गया। यह देखते हुए कि लगातार देश में भाजपा का ग्राफ गिर रहा है और देश में पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में उसकी सरकार बन चुकी है। हरियाणा में भी उसका प्रदर्शन बेहतरीन था। महाराष्ट्र और झारखण्ड में भाजपा सत्ता से बाहर हो चुकी है। जनता दिल्ली में आम आदमी पार्टी और भाजपा दोनों से निराश है, इसलिए अगर वह कायदे से चुनाव लड़े तो पूर्ण बहुमत न सही, इसके काफी नजदीक पहुँच सकती है। कांग्रेस ने जो चुनाव घोषणापत्र जारी किया, वह आम आदमी पार्टी और भाजपा के घोषणापत्रों से कहीं बेहतर था। मोदी के शासन काल में चूँकि बेरोजगारी दर 47 साल में सबसे अधिक हो चुकी है, इसलिए इसने वायदा किया कि कांग्रेस सरकार बनी तो हर ग्रेजुएट बेरोजगार को 5,000 रुपए और पोस्ट ग्रेजुएट को 7,500 रुपए प्रतिमाह का बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। बेशक देश के छोटे शहरों में यह धारणा है कि दिल्ली में महिलाएं नौकरी में बहुत बड़ी संख्या में हैं, पर नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े इस बात की तस्दीक नहीं करते। दिल्ली में महज 12.8 प्रतिशत महिलाएं ही नियमित रोजगार में हैं। तो कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में वायदा किया कि सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा जाएगा। इसके अलावा महिलाओं के लिए पीएचडी तक नि:शुल्क शिक्षा का वायदा किया।
आम आदमी पार्टी ने चुनाव से 6 महीने पहले घरेलू उपभोक्ताओं के लिए 200 यूनिट तक बिजली मुफ्त कर दी थी। यह ताड़ते हुए कि इससे लाभ उठाने वाले पार्टी को ही वोट देंगे, तो कांग्रेस ने और आगे बढक़र वायदा किया कि अगर उसकी सरकार बनी तो वह 300 यूनिट बिजली मुफ्त देगी और 400 से अधिक यूनिट खर्च करने पर भी सब्सिडी देगी। केजरीवाल सरकार की सब्सिडी 400 यूनिट पर खत्म हो जाती थी, इससे ऊपर एक यूनिट भी खर्च करने पर बिना सब्सिडी के पूरा बिल भरना पड़ता था जिससे मध्य वर्ग के लोग बिजली सब्सिडी के लाभ से वंचित थे। कांग्रेस ने वायदा किया कि 300-400 यूनिट तक बिजली इस्तेमाल करने पर 50 प्रतिशत; 400-500 यूनिट तक बिजली इस्तेमाल करने पर 30 प्रतिशत और 500-600 यूनिट तक बिजली इस्तेमाल करने पर 25 प्रतिशत की छूट दी जाएगी।
पानी के मामले में भी कांग्रेस ने नायाब फार्मूला दिया। केजरीवाल सरकार की मौजूदा नीति के तहत 20,000 लीटर पानी फ्री दिया जा रहा था। कांग्रेस ने कहा कि हम न केवल 20,000 लीटर पानी फ्री देंगे, बल्कि यदि कोई पानी कम खर्च करेगा तो उसे ‘कैशबैक’ देंगे। हर एक हजार लीटर पानी की बचत पर 300 रुपए का ‘कैशबैक’। इसका अर्थ यह कि अगर किसी महीने कोई परिवार घर बंद कर कहीं और रहने चला जाए, तो वह पानी बचत के नाम पर 6,000 रुपए के ‘कैशबैक’ का हकदार बन सकता था। इसके अलावा कांग्रेस ने तमिलनाडु की ‘अम्मा कैंटीन’ की तर्ज पर 100 ‘इंदिरा कैंटीन’ खोलने का वायदा किया, जिसमें 15 रुपए में थाली देने, दिव्यांगों, विधवाओं और वरिष्ठ नागरिकों को वर्तमान पेंशन 2,000 और 2,500 रुपए से बढ़ाकर 5,000 रुपए करने का वायदा किया। अवैध बस्तियों के विकास के लिए कहा 35,000 करोड़ रुपए खर्च किया जाएगा।
दिल्ली कहने को राजधानी है लेकिन इसकी कोई 35 प्रतिशत आबादी झुग्गियों या अनधिकृत बस्तियों में रहती है जहाँ पानी, सडक़, पार्क, सीवर आदि का काम टलता रहता है। फिर ऐसा क्या हुआ कि इतने अच्छे चुनाव घोषणा-पत्र जारी करने और राष्ट्रीय जनता दल से तालमेल कर चुनाव लडऩे के बावजूद कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई। कांग्रेस ने 67 सीटों पर चुनाव लड़ा था, 3 सीटें राजद को दी थी। कांग्रेस की सिर्फ 3 सीटें छोडक़र सभी पर जमानत जब्त हो गई। 2015 में कांग्रेस को 9.7 प्रतिशत मत मिले थे और 2019 के लोकसभा चुनाव में ये बढक़र 22.63 प्रतिशत हो गए थे, पर वे इस बार राजद के मतों को मिलाकर सिर्फ 4.3 प्रतिशत रह गए।
यह देखना दुखद है कि महान विरासत वाली, शासन चलाने में सबसे अनुभवी और परिपक्व तथा वैचारिक धरातल पर मजबूत देश की इस सबसे पुरानी पार्टी को दिल्ली के मतदाताओं ने इस तरह खारिज कर दिया। पर, इसकी ठोस वजह थी। निस्संदेह, शीला दीक्षित ने दिल्ली का खासा विकास किया था। खासकर 2010 में दिल्ली में हुए कामनवेल्थ गेम्स की तैयारी के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर केंद्र से मिली 20,000 करोड़ रुपए से ऊपर मिली आर्थिक ग्रांट से उन्होंने दिल्ली को फ्लाईओवरों और चमचमाती सडक़ों से ऐसा सजा दिया था कि आज भी लोग उन दिनों को याद करते हैं। कांग्रेस ने उसी याद को ताजा कराते हुए अपने प्रचार का केंद्रीय नारा बनाया ‘हम देंगे शीला दीक्षित वाली दिल्ली।’ भाजपा-समर्थक लोग भी गाहे-बगाहे कहते मिल जाते कि केजरीवाल ने दिल्ली को बर्बाद कर दिया, इससे तो अच्छी शीला दीक्षित थी।
यह राजनीतिक पंडि़तों के लिए विश्लेषण का विषय रहेगा कि दिल्ली की राजनीति में ऐसी क्या रासायनिकी चली जिसे न भाजपा समझ पाई और न कांग्रेस। क्या यह अरविन्द केजरीवाल का अपना करिश्मा था या उनकी सरकार के प्रति मतदाताओं की आस्था, जो सोशल मीडिया में चले गहन विरोधी प्रचार और 2015 में किए गए वायदे के हिसाब से आधा-अधूरा काम कर पाने के बावजूद बनी रही।

सिर्फ काम पर मांगा वोट
आम आदमी पार्टी के चुनाव-प्रचार की विशेषता रही कि यह पूरी तरह सकारात्मक था। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अनेक बार खुलकर कहा कि वे धर्म जाति के नाम पर समाज को बांटने की राजनीति करने की जगह केवल काम करने की राजनीति में यकीन करते हैं। उनका भाषण कई बार इस तर्ज पर होता- दिल्ली वालो, अगर आपको लगता है कि हमारी सरकार ने काम नहीं किया तो हमें वोट मत देना। काम करने के आत्मविश्वास से भरपूर नेता ही इस तरह खुलकर कह सकता है कि हमें वोट मत देना। अनेक विश्लेषकों का मानना है कि आम आदमी पार्टी अपने ऊपर लगे आरोपों का विश्वसनीय ढंग से जवाब दे पाई। इसने ‘फ्री’ बिजली, पानी, स्वास्थ्य सेवा, बस सेवा आदि के नाम पर करदाताओं के पैसे लुटाने और खजाना खाली के आरोप का जवाब पहले से चली आ रही चोरी से जोड़ा। शीला दीक्षित ने जब बिजली का निजीकरण किया था, तो बिजली चोरी का स्तर 57 प्रतिशत था जिसे वे 27 प्रतिशत तक नीचे ले आयीं थी, लेकिन पब्लिक को इसका लाभ नहीं मिला था। बहुत से गरीब लोग जहाँ मौका मिलता, बिजली कंपनी के तारों में कांटा डाल कर अवैध रूप से बिजली ले लेते थे। इस विषय का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया और निष्कर्ष निकला कि कम खर्च करने वालों को यदि बिजली बहुत सस्ती कर दी जाय, तो बहुत बड़ी आबादी को बिजली चोरी की जरूरत ही नहीं रहेगी।
आम आदमी पार्टी दावा करती है कि पांच साल से मिल रही बिजली सब्सिडी का नतीजा है कि बिजली चोरी का स्तर दिल्ली में घटकर 7 प्रतिशत रह गया है। यही बात पानी के बारे में है। शीला दीक्षित के बारे में कयास लगाया जाता था कि वे बिजली के बाद पानी-सप्लाई का निजीकरण करना चाहती हैं। उनकी चमचमाती दिल्ली में केवल 53 प्रतिशत आबादी को ही घर में नल का पानी मिलता था। 47 प्रतिशत आबादी बोरवैल के पानी पर या टैंकर के पानी पर निर्भर थी।
स्वच्छ पेय जल को नागरिक का बुनियादी अधिकार मानते हुए केजरीवाल सरकार ने न केवल 20,000 लीटर पानी मुफ्त दिया, बल्कि पानी-वंचित कालोनियों में पाइपलाइन बिछाने के काम पर बहुत जोर दिया, जिसकी वजह से आज दिल्ली के 93 प्रतिशत घरों में नल से पानी पहुँचता है। यह सच है कि इन नए इलाकों में अभी पानी की सप्लाई कम है, पर अनधिकृत कालोनियों के लोग इस पानी का आना भी बड़ी राहत मानते हैं। 20,000 लीटर पानी हर परिवार को फ्री देने की भाजपा ने काफी आलोचना की पर इस पर आमतौर पर चलने वाली चर्चा में इस तथ्य को भुला दिया जाता था कि मुफ्त पानी उन्हीं को मिलता था जो वैध और चालू मीटर लगवाते थे। इस एक उपाय से पानी की चोरी कम हुई है। घरों में 20,000 लीटर पानी मुफ्त देने के बावजूद दिल्ली जल बोर्ड का राजस्व बढ़ा है। यह नहीं कहा जा सकता कि पानी चोरी रुक गई है। कहां हो रही है, उसका पता लगाने के लिए फ्लो-मीटर और सप्लाई की ट्रंक लाइनों पर बड़े मीटर लगाए जा रहे हैं।
इस बात की आलोचना होती है कि केजरीवाल सरकार ने मुनाफे में चल रहे दिल्ली जल बोर्ड को घाटे में पहुंचा दिया। पर यह घाटा इसलिए है कि नई पाइप लाइन बिछाने से ऑपरेशनल खर्च बढ़ गया है और इन लाइनों पर 20,000 लीटर से अधिक खर्च करने वाले उपभोक्ता कम है या अभी वहां पानी की सप्लाई कम है। इसके अलावा शीला दीक्षित सरकार ने 2010 में फैसला लिया था कि हर साल पानी की दरें 10 प्रतिशत स्वत: बढ़ जाएंगी, पर केजरीवाल सरकार ने इस नीति पर अमल रोक दिया। इसके अलावा सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का बोझ भी जल बोर्ड को झेलना पड़ा। आम आदमी पार्टी का तर्क है कि मानव जीवन के लिए पानी जैसी बुनियादी सुविधा के लिए सरकार को केवल मुनाफे पर नजर नहीं रखनी चाहिए।

मोहल्ला क्लीनिक गरीबों के लिए वरदान
आम आदमी पार्टी सरकार की एक बड़ी पहल मोहल्ला क्लीनिक की रही। भारत में जहां भाजपा अमेरिकी किस्म की स्वास्थ्य बीमा आधारित स्वास्थ्य सेवा प्रणाली स्थापित करना चाहती है, वहीं आम आदमी पार्टी ब्रिटेन, फ्रांस और स्कैंडिनेवियाई देशों का मॉडल अपना रही है। 2015 में सरकार बनने के 4 महीने के अंदर ही घोषणा की गई कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए 31 मार्च 2017 तक हर दो किलोमीटर पर एक मोहल्ला क्लीनिक खोला जाएगा और कुल 1,000 क्लीनिक खोले जाएंगे, जहाँ न केवल चिकित्सा परामर्श और मुफ्त दवाएं दी जाएंगी, बल्कि टेस्ट भी मुफ्त किए जाएंगे, लेकिन इनके लिए नगर निगम की आपत्ति की वजह से मोहल्ला क्लीनिक के लिए सार्वजनिक जगह उपलब्ध न हो सकी। इस पर फैसला किया गया कि 300 सरकारी स्कूलों में इन्हें खोला जाए, तो दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट के हवाला देकर उपराज्यपाल नजीब जंग ने इसकी अनुमति नहीं दी।
केंद्र सरकार के तहत कार्यरत डीडीए और नगर निगम ने तकनीकी अड़चनों के हवाले से मोहल्ला क्लीनिक के लिए भवन-निर्माण करने पर रोक लगा दी। अंतत: दिल्ली सरकार को हाईकोर्ट में मामला ले जाना पड़ा। बाद में निजी भवनों में किराए पर जगह लेकर भी क्लीनिक खोले। तमाम जद्दोजहद में नष्ट हुए समय की वजह से अभी तक 1,000 में से महज 450 मोहल्ला क्लीनिक खुल पाए हैं।
आप के मोहल्ला क्लीनिक की प्रशंसा अमेरिका सहित अनेक देशों में हुई है। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बान की मून एवं कोफी अन्नान, विश्व स्वास्थ्य संगठन की पूर्व महानिदेशक ग्रो हार्लेम ब्रंटलैंड ने इनकी बेहद सराहा। दूसरी तरफ, इन्हें रोकने के लिए निजी लघु अस्पतालों और नर्सिंग होम से जुड़े व्यापारिक हितों और उनके लिए काम करने वाले राजनीतिक दलों की ओर से हरचंद बाधा पहुंचाने की कोशिश हुई। पर गरीबों के लिए ये वरदान सिद्ध हुए। इससे वे न केवल इलाज के खर्च से बचे बल्कि झोला-छाप डाक्टरों से भी मुक्ति पा सके।
पर मोहल्ला क्लीनिक खोलना मुफ्त दवा और डायग्नोस्टिक टेस्ट के लिए बजट में धन सुलभ कराने भर का ही मामला नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती थी क्लीनिक चलाने के लिए समर्पित, सेवाभावी डाक्टरों की खोज। यहां काम करना सचमुच में सेवा है, न कि कमाई का जरिया। एक मरीज देखने के लिए डाक्टर को महज 40 रुपए की फीस सरकार की ओर से निर्धारित है जबकि कोई भी एमबीबीएस डाक्टर एक बार के परामर्श का 250 से 350 रुपए तक ले लेता है। नतीजा यह कि मोटी फीस से डरकर मरीज तभी डाक्टर पर जाते हैं, जब हालत ज्यादा खराब होती है और ज्यादातर गरीब लोग सीधे केमिस्ट से सलाह लेकर दवा ले लेते हैं। इस कुप्रथा पर रोक लगाने में मोहल्ला क्लीनिक से मदद मिलेगी। हर क्लीनिक में रोज लगभग 50 से लेकर 100 मरीज आते हैं, जिनमें आमतौर पर बुखार, उलटी-दस्त, खांसी, ब्लड-प्रेशर, डायबिटीज, हड्डियों के जोड़ों के दर्द आदि के मरीज शामिल हैं। इन क्लीनिक का घर के नजदीक होना बहुत बड़ी सहूलियत है। स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन का कहना है कि अच्छी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के तहत समय से निदान हो जाने और चिकित्सा मिल जाने से अस्पतालों का बोझ कम होता है। अध्ययन हैं कि 90 प्रतिशत गरीबों को चिकित्सा के लिए अपनी जेब से ही धन खर्च करना होता है। एक शोध पत्र से उजागर हुआ है कि ज्यादातर गरीब और निम्न आय वर्ग के लोग मोहल्ला क्लिनिक में सेवाएं ले रहे हैं। वैसे गरीबों के लिए देश भर में मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं हैं लेकिन डिस्पेंसरियां इतनी कम हैं कि भीड़ से डरकर लोग निजी डाक्टरों पर ही जाते हैं।
बहुत महंगे भी नहीं हैं
ये या तो पोर्टा कैबिन में बने हैं या किराए के भवन में। दिल्ली में स्वास्थ्य बजट अन्य राज्यों से काफी अधिक है, कुल परिव्यय का करीब 14 प्रतिशत जो 8,400 करोड़ रुपए बैठता है, पर मोहल्ला क्लीनिक के लिए इसका केवल 7 प्रतिशत ही निर्धारित है। इतने कम व्यय से लोगों को जो असाधारण लाभ पहुंचता है, उसे ज्यादातर राजनीतिक दल नहीं समझते।
अगर भाजपा व कांग्रेस की बात करें, तो इन दोनों ही पार्टियों की सरकारें या तो देशी-विदेशी स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के नजरिये से, या स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं जैसे अस्पतालों, नर्सिंग होम, क्लीनिक आदि के नजरिये से या फिर सरकारी काम के नजरिये से स्वास्थ्य सेवाओं को डिजाइन करती हैं। आम आदमी पार्टी ने इस मामले में लोगों की जरूरत को चिंतन के केंद्र में रखा। यह सोच और इस पर अमल देश के लिए नई दिशा देने वाला कदम सिद्ध हो रहा है। इसकी सोशियोलॉजी और इकोनॉमिक्स को आम आदमी पार्टी ने पहचाना और पूरी निष्ठा से तमाम अवरोधों से लड़ते हुए इन्हें बनाया। इसका राजनीतिक लाभ पार्टी को क्यों न मिलता? इस मॉडल की सफलता देखते हुए तेलंगाना, कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, झारखण्ड और महाराष्ट्र की सरकारों ने भी अब इसी किस्म की स्कीमें लागू करना शुरू कर दिया है। दिलचस्प यह है कि दिल्ली में स्वास्थ्य सेवा का काम केवल मोहल्ला क्लीनिक तक सीमित नहीं रहा है, अस्पताल सहित उच्चतर स्वास्थ्य सेवाओं में भी काफी सुधार हुआ है। पर निश्चित तौर पर बहुत काम अभी बाकी है।

सरकारी स्कूलों की बेहतरी ने वोट दिलाए
आप सरकार की एक अन्य योजना, जिसने भारतीय जनता पार्टी की हिटलरवादी किस्म के आक्रामक राष्ट्रवादी प्रचार की हवा निकाल दी, वह थी सरकारी स्कूलों का काया पलट।
देश में आम आदमी पार्टी की पहली सरकार थी, जिसने शिक्षा के लिए बजट का 25 प्रतिशत धन आवंटित किया। नए स्कूलों के लिए केंद्र सरकार के अधीन कार्यरत डीडीए से जमीन न मिली तो पुराने स्कूलों में ही कमरों की संख्या दो-गुनी कर दी। शिक्षकों को मोटीवेट किया, उनकी क्षमता बढ़ाई, शिक्षकों के लिए इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट की मदद से प्रशिक्षण की व्यवस्था की, हर विषय में परामर्शदाता शिक्षक (मेंटर टीचर) तैयार किए, प्रशिक्षण के लिए उन्हें विदेशों में भी भेजा, हैपीनेस, उद्यमशीलता जैसे नए पाठ्यक्रम शुरू किए, शिक्षा में पीछे रह गए बच्चों के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए और स्कूलों के प्रबंधन में पेरेंट्स को शामिल कर स्कूल मैनेजमेंट कौंसिलें बनाई जिससे उन टीचरों की धांधली पर रोक लगी, जो स्कूल में हाजिरी लगाकर अपने निजी धंधे पर निकल जाते थे। स्पोकन इंग्लिश की ट्रेनिंग की व्यवस्था की। बिना किसी जाति-धर्म-वर्ग के भेदभाव के सबको दी जा रही इस नि:शुल्क शिक्षा ने उन परिवारों का दिल जीत लिया जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे।
दिल्ली में दो दशक से भी अधिक समय से निजी स्कूलों को ही प्रोत्साहन दिया जा रहा था। सरकारी स्कूलों की उपेक्षा होती थी, जिससे उनमें शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा था और जिनके पास क्षमता थी, वे सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को नहीं भेजना चाहते थे। पर आप सरकार के अधीन स्थिति नाटकीय ढंग से बदली। सरकारी स्कूलों में बारहवीं का रिजल्ट निजी स्कूलों से बेहतर हो गया। नतीजतन, सरकारी स्कूलों के बच्चे आईआईटी की परीक्षा में पास होने लगे। लेकिन, भाजपा, कांग्रेस दोनों ने ही इस बड़े बदलाव को स्वीकार नहीं किया। कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा का कहना रहा- केजरीवाल सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में कुछ नहीं किया। जो भी काम हुआ, वह शीला दीक्षित के कार्यकाल में हुआ। उन्हीं के शुरू किए गए स्कूलों की सिर्फ लिपाई-पुताई हुई है। यह एक ऐसा झूठ था जिसे सोशल मीडिया पर विरोधियों द्वारा ‘लाइक’ तो किया जाता था लेकिन जो शिक्षा में आए बदलाव के लाभार्थी थे जिनकी संख्या लाखों में थी, वे सच्चे दिल से केजरीवाल और शिक्षामंत्री मनीष सिसौदिया के भक्त बन गए। यह दिल्ली का वह सामाजिक-आर्थिक वर्ग था, जो जैसे-तैसे रोटी-कपड़ा-मकान की जुगत करता था लेकिन जिनके मन में यह अरमान रहता था कि उनके बच्चे किसी तरह पढ़-लिख जाएं।
लगाई मुफ्तिया स्कीमों की झड़ी
यह सोचते हुए कि मुफ्त बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा और महिलाओं के लिए बस-यात्रा ही संभवत: केजरीवाल की वोट पाने की रणनीति है, तो भाजपा ने भी अपने संकल्प पत्र में कई मुफ्त स्कीमों की घोषणा कर दी। लड़कियों के बैंक खाते में एक लाख रुपए डालने का वायदा किया जो उन्हें 21 वर्ष की होने पर मिलता, 9वीं क्लास में पढ़ रही लड़कियों को साइकिल और कॉलेज जाने वाली लड़कियों को मुफ्त स्कूटी, गरीब विधवाओं की बेटी की शादी पर 51,000 रुपए की आर्थिक सहायता, गरीबों को गेंहू की जगह 2 रुपए किलो आटा और किसानों को 6,000 रुपए सालाना की किसान सम्मान राशि और पांच साल में दस लाख नौकरियों का वायदा भी किया। लेकिन केजरीवाल सरकार की मुफ्त बिजली, पानी, चिकित्सा और बस-यात्रा जैसी स्कीमें जारी रहेंगी या नहीं इसका कोई जिक्र भाजपा के घोषणापत्र में नहीं था, जिसे आम आदमी पार्टी ने अच्छी तरह भुनाया। इससे यह धारणा फैली कि यदि भाजपा सत्ता में आई तो ये सब सुविधाएं बंद हो जाएंगी। विगत में भाजपा सांसद विजय गोयल एलान कर भी चुके थे कि अगर पार्टी सत्ता में आती है, तो वह 200 यूनिट मुफ्त बिजली देना बंद कर देगी क्योंकि हम मुफ्तखोरी बढ़ाने में नहीं बल्कि विकास में यकीन करते हैं। इसका आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने करारा जवाब दिया था कि बीजेपी सरकार सांसदों को तो हर महीने 5,000 यूनिट बिजली फ्री देती है, लेकिन गरीबों को 200 यूनिट का विरोध करती है।

भाजपा के पास दिखाने को कुछ न था
कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह भी मानना है कि न तो केंद्र सरकार और न ही दिल्ली नगर निगम के अपने कामकाज को लेकर भाजपा के पास ठोस दावा करने के लिए कुछ खास नहीं था, इसलिए इसने हिन्दू-मुसलमान के नाम पर विद्वेष भडक़ाने की रणनीति अपनाई। मोदी सरकार के तमाम विकास के दावों के बीच आर्थिक विकास की दर तीसरी तिमाही में घटकर 4.5 रह गई थी, बेरोजगारी 47 साल में सबसे अधिक चल रही थी। जनता के धन से जो सार्वजनिक उपक्रम खड़े किए गए थे, उन्हें बेचने पर सरकार उतारू नजर आ रही थी, सरकार के वित्तीय घाटे को कम रखने के लिए रिजर्व बैंक के रिजर्व फण्ड से धन लिया जा रहा था। भाजपा-शासित नगर निगमों का हाल यह कि न वे दिल्ली में पार्किंग व्यवस्था में कोई सुधार कर पाए और न गन्दगी के ढेरों से निजात दिला पाए। ऐसी स्थिति में शायद भाजपा के पास भावनात्मक उन्माद भडक़ाने के आलावा कोई चारा न था। कुछ हद तक इसका लाभ भी इसे मिला जैसा कि ठीक मतदान से पहले किए गए ‘लोकनीति’ के सर्वे ने उजागर भी किया है, पर वे केजरीवाल सरकार के कामकाज के असर और लोक कल्याणकारी योजनाओं पर सभी किस्म के विरोध के बावजूद अडिग रहकर पूरा करने के जज्बे से पैदा हुई लोकप्रियता की काट नहीं बन सके। यही दिल्ली चुनाव नतीजों का प्रमुख आशय है।
केजरीवाल सरकार की शासन-पद्धति की विशेषता है कि वह आइडियोलॉजी-न्यूट्रल है। जन-केंद्रित मुद्दों के ऐसे समाधान ढूढऩे पर बल देती है, जो व्यय किए गए धन का अधिकतम लाभ दे और समाज में पीछे रह गए लोगों की आर्थिक उत्पादकता बढ़ाने में मददगार हो। यह गवर्नेंस का नया मॉडल है। शायद आने वाले सालों में इसे अन्य राज्य भी अपनाएं।
केजरीवाल ने किए एक तीर से दो शिकार
आप सरकार की कई स्कीमों से कहीं अधिक शायद महिलाओं के लिए फ्री बस-यात्रा ने चुनावी पांसा पलटने में मदद की। प्रतिद्वंद्वी दलों ने इस स्कीम का भी घनघोर विरोध किया। दिल्ली भर में पोस्टर लग गए- झांसे में न आना, यह सब मुफ्त बिजली, पानी, बस सिर्फ 31 मार्च तक के लिए है, इसके बाद सब वापस ले ली जाएंगी क्योंकि इस मुफ्तवाद का आर्थिक बोझ लम्बे समय तक टिक नहीं सकता। कुछ वाक्पटु महिलाओं ने तेवर दिखते हुए टीवी पर आकर बोला - हम मुफ्तखोर नहीं हैं, हम इतनी कमजोर और मजबूर नहीं कि दस बीस रुपये भी न खर्च कर सकें। लेकिन दिल्ली की परिवहन व्यवस्था को समझे बिना इस मुफ्त यात्रा के दिल्ली का मर्म नहीं समझा जा सकता। दिल्ली में प्राइवेट वाहनों की भरमार है, अधिसंख्य लोग अपने वाहनों से ही आना-जाना पसंद करते हैं। नतीजा यह कि ‘पीक आवर्स’ (कार्यालय के समय को छोडक़र बसें सडक़ों पर पूरी भरी नहीं चलती। बस, सीएनजी, ड्राइवर, कंडक्टर पर धन खर्च होता है, पर उसका पूरा इस्तेमाल नहीं होता। एक तरह से महिलाओं के लिए बस-यात्रा मुफ्त कर केजरीवाल ने एक तीर से दो शिकार किए। महिलाओं का खर्च कम किया, उनको घर से अधिक बाहर निकलने का मौका दिया, उधर बसों की उपयोगिता (ऑक्यूपेंसी) बढ़ाई। और यह सब बहुत कम खर्च में।
अगर शीर्ष कोर्ट का न आता फैसला
केजरीवाल की छवि भिडऩे वाले आंदोलनकारी की थी, जिसकी वजह से भाजपा उन्हें ‘अर्बन नक्सली’ के वर्ग में ठेलती आ रही थी। अपनी योजनाओं को लागू करने में उप-राजयपा

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