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दिल्ली की शिक्षा क्रांति

— विनोद वाष्र्णेय —
समस्या माने जाने वाली भारत की विशाल जनसंख्या का सुखद पहलू यह है कि उसमें बच्चों की संख्या बहुत है। इसे अर्थशास्त्री ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ की संज्ञा देते हैं जिसका अर्थ है कि देश में आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करने की क्षमता अच्छी है। लेकिन बच्चों की अधिक सँख्या का तभी कोई लाभ है,जब वे पढ़-लिख कर सामाजिक पूँजी बन सकें और हर साल विकसित हो रही नई-से-नई टेक्नोलॉजी से संचालित अर्थव्यवस्था को चला सकें। जाहिर है, गुणवत्ता शिक्षा के बिना यह संभव नहीं। पर देश की शिक्षा व्यवस्था के जमीनी हालात इस मामले में आश्वस्त नहीं करते?
यह सुनने में अच्छा लगता है कि जब से देश में नि:शुल्क स्कूली शिक्षा के लिए ‘शिक्षा का अधिकार कानून’ बना है, 95 प्रतिशत से अधिक बच्चे स्कूल जाने लगे हैं लेकिन ये 24 करोड़ बच्चे जो स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, उनके सीख पाने का स्तर क्या है? पिछले साल के एक सर्वे से उजागर हुआ कि ग्रामीण इलाकों में पांचवीं कक्षा के आधे से अधिक बच्चे दूसरी क्लास तक की किताबें नहीं पढ़ पाते थे और छोटी मोटी संख्याओं का जोड़ घटाना भी नहीं कर पाते थे। क्या शिक्षा के इस कमजोर आधार के बलबूते भारत साल-दर-साल बढ़ रही टेक्नोलॉजी-चालित आर्थिक प्रतिस्पर्धा में कामयाब होगा?
पाया गया है कि जो बच्चे प्राथमिक शिक्षा में इतने कमजोर होते हैं, वे आगे फिर पिछड़ते ही जाते हैं, उन्हें उच्चतर पाठ्यक्रम के साथ चलने में बहुत कठिनाई होती है। अगर आज इन बच्चों पर ध्यान न दिया जाए तो अनुमान है कि देश के 10 करोड़ बच्चे कभी आठवीं से आगे नहीं बढ़ेंगे। वे स्कूल छोड़ देंगे। दिल्ली के सरकारी और नगर निगम के स्कूलों में शिक्षा का स्तर देश के औसत से कुछ अच्छा था लेकिन फिर भी उसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता था।
वास्तविकता यह है कि पूरा देश ही ‘लर्निंग क्राइसिस’ के दौर से गुजर रहा हैं। बच्चे स्कूल जाते हैं, पर सीख बहुत कम रहे हैं। सरकारें इस बात को जानती हैं कि शिक्षा में किया गया निवेश देश के भविष्य निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है, इसके बावजूद वे सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत तौर पर शिक्षा के लिए धन-आवंटन कम करती जा रही हैं। 2015 से यह सिलसिला जारी है। केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ही ताजा रिपोर्ट है कि 2010-2011 में देश की राज्य सरकारें शिक्षा पर अपने कुल बजट का 17.57 प्रतिशत खर्च कर रही थीं लेकिन 2017-18 में आकर यह घटकर 15.18 प्रतिशत रह गया है। दिल्ली सरकार भी 2008-09 में केवल 16 प्रतिशत खर्च कर रही थी।
ज्यादातर सरकारों की सोच यह रही है कि सरकार के पास धन की कमी है जबकि निजी क्षेत्र में पूँजी की बहुलता है, इसलिए इसे शिक्षा का उत्तरदायित्व निभाना चाहिए। नतीजा यह कि सारे देश की तरह दिल्ली में भी निजी स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह फैल गए। दिल्ली में भूमि का आवंटन का अधिकार केंद्र सरकार के अधीन कार्यरत दिल्ली विकास प्राधिकरण के पास है। इसने अचानक उभर आई शिक्षा उद्यमियों की नई जमात को लगभग मुफ्त में जमीन उपलब्ध कराई। इस क्लास में या तो खुद राजनीतिज्ञ थे या उनके अनुग्रहीत लोग। स्कूल चलाना एक अच्छा व्यापार बन गया क्योंकि मनमानी फीस वसूलने की छूट थी और उससे हो रही आय पर टैक्स नहीं था। एक अध्ययन के अनुसार सबसे अधिक निजी स्कूल 2011 से 2015 के बीच खुले लेकिन फरवरी, 2015 में जब से दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है, शिक्षा के लिए आवंटन कुल बजट का 25 प्रतिशत हो गया है जो नई शिक्षा नीति-2019 के ड्राफ्ट में प्रस्तावित 20 प्रतिशत से कहीं अधिक है। वर्ष 2018-19 के बजट में तो यह आवंटन 26 प्रतिशत था। आम आदमी पार्टी सरकार पहले दिन से ही यह घोषित कर रही थी कि शिक्षा-व्यवस्था में सुधार को सबसे अधिक वरीयता दी जाएगी। इसके पीछे वैचारिक तर्क बहुत मजबूत थे। शिक्षा न केवल आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करती है बल्कि अच्छी शिक्षा गरीबी निवारण में सबसे अधिक मददगार होती है।
इस संदर्भ में एक बात तो तय है कि सिर्फ धन का अधिक आवंटन ही एकमात्र समाधान नहीं है। अल्प-आय वर्ग के परिवार अपने बच्चों को पहले सरकारी स्कूलों या निगम के स्कूलों में ही भेजते थे। पर सरकारी स्कूलों की बेहद कमी थी। उनकी हालत बहुत खराब थी। ब्लैकबोर्ड तक इतने खराब हो चुके थे कि उन पर चौक से लिखना संभव नहीं होता था। बहुत से स्कूलों में बच्चों के बैठने के लिए बेंच तक नहीं थीं, उन्हें कॉरिडोर में फर्श पर बैठना पड़ता था, क्लास में 80 से 100, कहीं-कहीं तो 150 तक बच्चे होते थे। नए स्कूल खोलने का वादा चुनाव घोषणा पत्र में था। इस वादे को पूरा करने के लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण से जमीन मांगी गई लेकिन जमीन नहीं दी गई।
स्कूल को अच्छी बिल्डिंग मिल जाने या अन्य उन्नत सुविधाएं मिलना भर भी शिक्षा में सुधार के लिए काफी नहीं था लेकिन शिक्षा में सचमुच सुधार हुआ और वह सबसे अधिक 12वीं क्लास के उत्कृष्ट परीक्षा परिणाम के रूप में सबके सामने आया। उसके लिए क्या कुछ किया गया,वह एक विलक्षण प्रयोग है। वह देश के अन्य राज्यों के लिए एक केस स्टडी की तरह है। जो कुछ किया गया है, उसके दूरगामी परिणाम तत्काल नहीं जाने जा सकते लेकिन अकेले 12वीं क्लास के नतीजों से ही आँका जाए तो देखते है कि दिल्ली में सरकारी स्कूलों का परीक्षा परिणाम लगातार चौथे साल मोटी-मोटी फीस वसूलने वाले निजी स्कूलों से बेहतर रहा है। 2019 में 12वीं कक्षा में सरकारी स्कूलों में 94.24 बच्चे पास हुए जबकि निजी स्कूलों में 90.74 प्रतिशत। 203 सरकारी स्कूल तो ऐसे थे जहाँ शत-प्रतिशत बच्चे पास हुए। इक्कीस साल में इतने अच्छे रिजल्ट कभी नहीं आए। कौन विश्वास करेगा कि इस साल दिल्ली में सरकारी स्कूलों के 350 बच्चे आईआईटी में प्रवेश के लिए योग्य पाए गए।
नीति आयोग ने हाल ही स्कूल एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स-2019 जारी किया है। इसमें 2015-16 और 2016-17 के दौरान देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में चल रही स्कूली शिक्षा को उसकी क्वालिटी के आधार पर रैंकिंग दी गई है। इससे पता चलता है कि दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने एक साल में ही स्कूली शिक्षा की क्वालिटी रैंकिंग अंकों में 9.9 प्रतिशत का सुधार किया है और दिल्ली पूरे देश में केरल, तमिलनाडु, चंडीग? के बाद चौथे स्थान पर आ गई है। इसके बाद के तीन साल में जो अनेक बड़े परिवर्तन हुए हैं, उनका असर यहां परिलक्षित नहीं हैं। वे अगले सर्वेक्षण में ही उजागर होंगे और कोई आश्चर्य नहीं कि तब दिल्ली 2019-20 की रैंकिंग में पहले स्थान पर नजर आए।
बुनियादी सुधार ही शानदार
केजरीवाल सरकार को इस बात की दाद देनी चाहिए कि इसने जमीन न मिलने को बहाना नहीं बनाया बल्कि फैसला किया कि मौजूदा स्कूलों में ही नए क्लास रूम बनाए जाएं। इस फैसले का नतीजा यह रहा कि अब तक 20,000 से अधिक नए कमरे बन चुके हैं जिन्हें 500 नए स्कूलों के बराबर माना जा सकता है। लक्ष्य 10,000 कमरे और बनाने का है।
हर कमरे में अच्छा फर्नीचर, अच्छे आधुनिक व्हाइट बोर्ड के साथ-साथ स्कूल परिसर में स्वच्छ टॉयलेट, नई प्रयोगशालाएं, नई लाइब्रेरीज, प्लेग्राउंड आदि बन गए हैं। कुछेक स्कूलों में तो स्विमिंग पूल भी हैं। कई स्कूलों में इतनी अच्छी प्रयोगशालाएं बन गई हैं कि उनकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। ऐसी उन्नत प्रयोगशालाएं कुछेक प्राइवेट स्कूलों में ही हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर में हुए इस शानदार सुधार का सकारात्मक मनोवैज्ञानिक असर बच्चों और टीचर दोनों पर पड़ा।

अच्छी शिक्षा कौन नहीं चाहता ?
कौन माँ-बाप ऐसे होंगे जो अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा न चाहते हों। इसलिए सरकारी स्कूलों की दशा देख वे निजी स्कूलों की ओर भागते हैं। पर अब ऐसे बहुत मामले सामने आ रहे हैं जब महंगे निजी स्कूलों को छोडक़र अभिभावकों ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में शिफ्ट किया है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बदलाव की कहानी सिर्फ बारहवीं के अच्छे रिजल्ट भर से नहीं समझी जा सकती। रिजल्ट की बात करें तो दसवीं कक्षा में रिजल्ट निजी स्कूलों का ही बेहतर है। शिक्षक इसके लिए 8वीं तक फेल न करने की नीति को जिम्मेवार मानते हैं। इस नीति का निजी स्कूलों की तुलना में सरकारी स्कूलों में ज्यादा बुरा असर हुआ है, जहाँ बच्चे, अभिभावक और शिक्षक सभी ढिलाई बरतते हैं। एक सर्वे बताता है कि दिल्ली में वर्ष 2016 में कक्षा 6 के 75 प्रतिशत विद्यार्थी अपने स्कूल की पाठ्य पुस्तकोंं को समझ पाना तो दूर, उन्हें पढ़ तक नहीं पाते थे। निजी स्कूलों में ऐसा नहीं था। सरकारी स्कूलों में 8वीं कक्षा तक बच्चों की हालत बेहद खराब रहने के बाद अचानक 9 वीं क्लास में उन्हें उच्च पाठ्यक्रम के अनुकूल बनाना अत्यंत कठिन होता है। लेकिन अब सरकारी स्कूलों में भी प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षण-कार्य सुधारने पर काफी जोर दिया जा रहा है। कमजोर बच्चों की पहचान की जाती है और उन्हें अन्य के समकक्ष लाने के लिए ‘मिशन चुनौती’ और ‘मिशन बुनियाद’ जैसे कार्यक्रम शुरू किए गए हैं, जिनके सुफल जल्दी ही आने की उम्मीद की जानी चाहिए।
दसवीं में सरकारी स्कूलों के परिणाम कमतर आने की एक बड़ी वजह यह निकल कर आई कि बच्चे गणित में बहुत फेल हुए हैं। इसलिए उन स्कूलों की पहचान की गई,जहाँ 55 प्रतिशत बच्चे गणित में फेल हुए थे। लगभग 1,000 स्कूलों में से 350 स्कूल ऐसे निकले। शिक्षक कमजोर बच्चों को कम समय के अंदर कैसे गणित में एक वांछित स्तर पर लाएं, इसके लिए गणित के शिक्षकों को 100 घंटे की विशेष ट्रेनिंग दी गई। यह भी पाया गया कि गणित के टीचर की तो बहुत कमी है। बिना समय गंवाए गणित पढ़ाने के लिए निजी कोचिंग सेंटरों से टीचर ‘आउटसोर्स’किए गए, जिससे कम-से-कम सप्लीमेंट्री परीक्षा में बच्चे पास हो जाएं और उनका साल बर्बाद न हो। हर कार्यशील दिन डेढ़ महीने तक डेढ़ घंटे रोज गणित की स्पेशल क्लास चलाई गईं। इन रेमेडियल क्लासेज के लिए उन टॉपिक की पहचान की गई थी जिनमें बच्चे आमतौर पर कमजोर थे। कुल मिलाकर गणित के शिक्षकों की कमी एक बड़ी समस्या के रूप में चिह्नित हुई है। यहाँ तक कि शिक्षा विभाग ने जब गणित के शिक्षकों के लिए विज्ञापन के जरिए आवेदन मांगे तो पर्याप्त संख्या में आवेदन तक नहीं आए। गेस्ट टीचर के लिए भी आवेदन नहीं आए।
उक्त विवरण एक उदाहरण है जो बताता है कि शिक्षा-स्तर में सुधार के मार्ग में ऐसी बाधाएं भी होती हैं। पर सर्वमान्य आकलन यह है कि सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की कमी के अलावा शिक्षकों का रवैया सबसे बड़ी बाधा है। हांलाकि शिक्षक ऐसे उच्च आदर्श वाले भी होते हैं जो कई बार अपनी जेब से धन खर्च कर बच्चों की पढ़ाई की सुविधाएं जुटाते हैं तो ऐसे निकृष्ट भी जो हाजिरी लगाकर स्कूल से गायब हो जाते हैं, कुछ तो बच्चों को पढ़ाने से अधिक अपने प्रॉपर्टी डीलिंग या अन्य व्यवसाय में लगे रहते हैं, न जाने कितने ऐसे हैं जो सोचते हैं कि बच्चे स्कूल में पढ़ें या न पढ़ें लेकिन उनका ट्यूशन का धंधा बरकरार रहना चाहिए। पर ऐसे टीचरों के साथ सख्ती करने में बड़े जोखिम होते हैं।
प्रिंसिपल हों या शिक्षा अधिकारी या नेता, सभी शिक्षकों की सामूहिक नाराजगी मोल लेने से डरते हैं। लेकिन जब स्कूलों में शिक्षण का स्तर सुधारने का लक्ष्य सामने हो तो इस समस्या से निपटे बिना काम नहीं चल सकता था। शिक्षकों के पूरे सहयोग के बिना शिक्षा सुधार का काम असंभव था। शिक्षकों का समर्थन हासिल करने के मामले में दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया की दृढ़ इच्छा शक्ति, कमिटमेंट, सही नीतियों और मेहनत की भूमिका सर्वोपरि मानी जा सकती है।
शिक्षा सुधार में अभिभावकों की रही अहम भूमिका
स्कूल में एक बार आधारभूत ढ़ांचा बना देने भर से काम नहीं चलता। उसकी निरंतरता कहीं ज्यादा जरूरी होती है। सरकार ने बुद्धिमानी की कि इसके लिए हर स्कूल के लिए सालाना 15 लाख रुपए का अलग से बजट स्वीकृत किया और इस धन को खर्च करने का जिम्मा न किसी प्रिंसिपल को दिया, न शिक्षा विभाग के किसी अधिकारी को। इसे खर्च करने का अधिकार ‘स्कूल मैनेजमेंट काउन्सिल’को दिया गया। इस काउन्सिल की अनिवार्यता शिक्षा के अधिकार कानून में है लेकिन यह केवल कागज पर होती थीं। अब दिल्ली में ईमानदारी से इसके लिए चुनाव हुए और स्कूल में पढऩे वाले बच्चों के अभिभावकों ने इसके लिए वोट डाले। इन काउन्सिल के माध्यम से स्कूल की साफ सफाई, मरम्मत व अन्य सभी सुविधाओं की देखरेख सीधे अभिभावकों के अधीन आ गई। देखरेख का यह काम केवल बिल्डिंग, पानी, बिजली, लैब के उपकरणों और कम्प्यूटर जैसी अन्य सुविधाओं तक सीमित न रहा।
काउन्सिल को शिक्षण से जुड़ी समस्याओं पर भी फैसले लेने का अधिकार दिया गया। यहाँ तक कि अगर किसी विषय का टीचर उपलब्ध न हो तो वह बच्चों की पढ़ाई निर्बाध चलाने के लिए अस्थायी टीचर तक नियुक्त कर सकती थी।
अभिभावकों के वोट से निर्वाचित स्कूल मैनेजमेंट काउन्सिल जमीनी लोकतंत्र का एक ऐसा नायाब उदाहरण है जिससे स्कूलों में सरकारी और शिक्षा विभाग की दखलंदाजी कम हुई है। काउन्सिल सदस्यों ने टीचरों की कमी दूर करने के काम में भी खासी भूमिका निभाई। सरकार ने इस काउन्सिल को अधिकार दिया था कि जहाँ-जहां भी टीचर नहीं हैं, वहां साल में 200 घंटे शिक्षा देने के लिए अस्थाई टीचर की नियुक्ति करे। कई बार तो उन्होंने स्कूली बच्चों की शिक्षा के लिए यूनिवर्सिटी स्तर के टीचर उपलब्ध कराए। काउन्सिल समस्याओं के व्यावहारिक हल निकाल कर देती हैं हालांकि कई बार काउन्सिल में ऐसे भी अभिभावक चुन कर आ जाते हैं जो मुद्दों को ठीक से समझते नहीं और काउन्सिल के चेयरपर्सन यानी प्रिंसिपल की फजीहत करते हैं। पर कुशल प्रिंसिपलों के लिए यह कोई असाध्य बीमारी नहीं।

प्रोत्साहन से मिले अच्छे नतीजे
शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने प्रिंसिपलों को प्रोत्साहित करने पर काफी जोर दिया और उन्हीं से पूछा कि शिक्षा व्यवस्था में क्या सुधार किया जाना चाहिए। प्रिंसिपलों की सबसे बड़ी शिकायत थी कि वे बच्चों के लिए शिक्षा का उचित वातावरण बनाने पर ध्यान दें या फिर इस बात पर कि पंखे ठीक हैं या नहीं, नल की टोंटी में पानी आ रहा है या नहीं, जमादार ने टॉयलेट साफ किया है या नहीं। ऐसी व्यवस्था संबंधी निगरानी और मरम्मत में समय जाया करें। उनकी बात में दम था। सरकार ने स्कूल की परिसम्पत्तियों के सम्पूर्ण रखरखाव के लिए मेंटेनेंस मैनेजर की पोस्ट बनाई और प्रिंसिपलों को इन गैर-अकादमिक कार्यों से पूरी तरह मुक्त कर दिया। इसके अलावा व्यवस्था चली आ रही थी कि प्रिंसिपल केवल 5,000 रुपए खर्च कर सकता था। उससे अधिक खर्च करना हो तो शिक्षा विभाग से अनुमति लेनी होती थी, जिसमें समय जाया होता था और कभी कभी मामला लटक भी जाता था। मामला लटक जाने पर हताश प्रिंसिपल बाद में कोशिश भी करना बंद कर देते थे। प्रिंसिपल को लक्ष्य पूरे करने के लिए नई पहल करने के लिए अधिक अधिकार देते हुए सरकार ने प्रिंसिपल की खर्च करने की अधिकार-सीमा बढ़ाकर 50,000 रुपए कर दी।
प्रिंसिपल नए शैक्षिक कार्यक्रमों का विरोध करने के लिए उकसाने वाले शिक्षकों को अपनी मर्जी से स्थानांतरित भी नहीं कर सकता था। इससे माहौल खराब होता रहता था। इस रोग को खत्म करने के लिए प्रिंसिपल को अधिकार दिया गया कि यदि वातावरण में सुधार के लिए वे जरूरी समझें तो वे ज्यादा से ज्यादा दो शिक्षकों तक का ट्रांसफर कर दें। दो से अधिक ट्रांसफर करने के लिए शिक्षा विभाग की अनुमति होनी जरूरी थी।
मनीष सिसोदिया का विजन यह था कि प्रिंसिपल को स्कूल चलाने में नेतृत्वकारी भूमिका मिलनी चाहिए जो,नई पहल करें, इनोवेशन करें, नई डिजिटल टेक्नोलॉजी को अमल में लाने के लिए टीचर्स को प्रेरित करें और जो शिक्षण के तरीके में वांछित बदलाव लाएं। इस हेतु प्रिंसिपलों के लिए इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, लखनऊ व अहमदाबाद की मदद से स्कूल लीडरशिप कार्यशालाएं आयोजित की गईं। इससे भी आगे बढक़र उन्हें ट्रेनिंग और उच्चतर अवसरों के लिए इंग्लैंड, सिंगापुर और फिनलैंड की यूनिवर्सिटीज में भेजा गया।
प्रिंसिपलों के साथ-साथ शिक्षकों की क्षमता में सुधार के लिए भी इनोवेटिव उपाय किए गए। इनमें सबसे कामयाब रही ‘मेंटर टीचर’ की व्यवस्था। बहुत से शिक्षक यह मानकर चलते हैं उन्हें नया कुछ नहीं पढऩा, नया कुछ नहीं सीखना, उनका काम है बस करिकुलम पूरा कराना । ऐसे शिक्षक बच्चों में सीखने की प्रवृत्ति का विकास नहीं कर पाते। शिक्षा विभाग का ‘मेंटर टीचर प्रोग्राम’ आम शिक्षकों की शिक्षण क्षमता बढ़ाने में बहुत मददगार रहा। मेंटर टीचर को भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षित किया गया। मेंटर टीचरों पर काम का अतिरिक्त बोझ था फिर भी उन्होंने दिल से इस अतिरिक्त बोझ को स्वीकार किया। दिलचस्प बात यह कि उन्हें पहले ही बता दिया गया था कि हो सकता है कि अपनी जिम्मेवारी पूरी तरह निभाने में उन्हें 12 -12 घंटे या अधिक भी काम करना प?े पर उन्होंने इसके लिए सहमति दी। शायद उत्कृष्ट टीचरों के लिए यह प्रोफेशनल संतुष्टि देने वाला काम था। यही वजह थी कि वे शिक्षकों के बीच एक नए किस्म का अकादमिक वातावरण बनाने में कामयाब हुए। हर मेंटर टीचर को पांच-पांच स्कूल अलॉट किए गए। पहले साल 200 मेंटर टीचर बने। नियम बनाया गया कि हर साल 100 नए मेंटर टीचर बनेंगे और कोई भी मेंटर टीचर दो साल से अधिक अपने पद पर नहीं रहेगा।

बच्चों में कम हुई आक्रामकता
परन्तु क्या सचमुच में ऐसा कोई तरीका है जिससे जाना जा सके कि इसके वांछित नतीजे मिल रहे हैं? इसके जवाब में सुश्री चौरसिया कहती हैं कि इसे जांचने का अभी कोई ऐसा टूल विकसित नहीं हुआ है, पर इसकी कोशिश जारी है। इसके लिए केस स्टडीज करनी होंगी। लेकिन यह देखने में आया है कि बच्चों की आक्रामकता कम हुई है, वे शांत चित्त हो रहे हैं। वे ज्यादा सहयोगी रुख अपना रहे हैं। वे बताती हैं कि मनश्चिकित्सक मानते हैं कि इस कोर्स से बच्चे भावनात्मक रूप से मजबूत होंगे, भावनाओं के सन्दर्भ में अपने आप को समझ सकेंगे,उन पर पढ़ाई, समाज और परिवार का मानसिक दबाव, चिंता, भय आदि कम होगा तथा उनका आत्म-विश्वास बढ़ेगा और वे अपने परिवार और मित्रों के बीच अच्छे भावनात्मक सम्बन्ध बनाए रखने में कामयाब होंगे। यही नहीं, उनका आचरण नैतिक होगा और वे अधिक सामाजिक होंगे।

शिक्षकों की कमी बड़ी समस्या
शिक्षकों की कमी हो तो शिक्षा सुचारु रूप से कैसे चल सकती है ? दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 2007 के बाद से टीचरों की नियुक्ति ही नहीं हुई थी। गेस्ट टीचरों या कॉन्ट्रैक्ट टीचरों से जैसे-तैसे काम चलाया जाता था। स्थाई टीचरों और गेस्ट टीचरों के वेतन में फर्क बहुत था। स्थाई टीचर जहाँ 60,000 से एक लाख रुपए मासिक तक का वेतन लेते थे, वहीं गेस्ट टीचर को महज 5,000 से 15,000 रूपए मिलते थे। दिल्ली के 50,000 टीचरों में से 18,000 या तो गेस्ट टीचर थे या कॉन्ट्रैक्ट पर। केजरीवाल सरकार ने दिल्ली विधान सभा में कॉन्ट्रैक्ट टीचरों को स्थायी करने का विधेयक पारित किया, लेकिन केंद्र सरकार ने उसे मंजूर नहीं किया। इस तरह अभी भी दिल्ली में गेस्ट टीचर बने हुए हैं लेकिन उनका वेतन कुछ भत्तों को छोड़ कर स्थाई शिक्षकों के बराबर कर दिया गया है।
एक और पहल पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग की रही। निजी स्कूलों में यह आम बात है। पर सरकारी स्कूलों में इसका कोई चलन नहीं था। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में इसकी जोर-शोर से शुरूआत की गई। हर तीन महीने में एक बार मीटिंग होने लगी। यह टीचरों के लिए नया अनुभव था। इससे उन्हें बच्चों के परिवारों की आर्थिक, शैक्षणिक व सामाजिक अवस्था की जानकारी मिलने लगी। सरकारी स्कूलों में अधिकतर निम्न-आय वर्ग के बच्चे होते हैं जबकि टीचर्स आम तौर पर खाते-पीते घरों से आते हैं, जो बच्चों की वास्तविक घरेलू परिस्थितियों को नहीं समझ पाते और इसलिए कई बार चाहते हुए भी वे बच्चों की सही मदद नहीं कर पाते। पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग के जरिए टीचरों को बच्चों के परिवारों के कष्ट भरे जीवन की हकीकत जानने का भी मौका मिला,जिससे उनके अंदर एक नई मानवीय दृष्टि विकसित हुई कि इन गरीब लोगों की एक ही तमन्ना है कि उनके बच्चे कुछ पढ़-लिख जाएं, जो पूरी होनी चाहिए। इन मुलाकातों में टीचरों को अभिभावकों को बच्चों की जरूरतों के बारे में भी बताने का मौका मिला, जिससे उन गरीब घरों के बच्चों की उपस्थिति, जो पहले बहुत कम होती थी, सुधरने लगी। उनके सीखने का स्तर भी सुधरने लगा।
उक्त कदमों के अलावा ‘हैपीनैस करिकुलम’ और ‘एंटरप्रीनियोरशिप माइंडसैट करिकुलम’ को पाठ्यक्रम में शामिल कर दिल्ली के सरकारी स्कूलों को नया ग्लैमर दिया गया है। इससे दिल्ली के सरकारी स्कूलों की छवि एकदम बदल गई है। सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले गरीब बच्चों की हमेशा से एक और समस्या रही है कि वे अंग्रेजी नहीं बोल पाते और इस वजह से वे नौकरियों के लिए आयोजित इंटरव्यू में प्राइवेट स्कूलों के बच्चों से पिछड़ जाते हैं। इस कमी को भुनाने के लिए दिल्ली में इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स की हजारों दुकानें खुल गई हैं। इनमें से कुछेक को छोडक़र उनका कोई स्तर नहीं। दिल्ली सरकार ने बच्चों की इस जरूरत को पूरा करने के लिए 11 वीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए स्पोकन इंग्लिश कोर्स शुरू किया। करीब 24,000 बच्चों ने 160 घंटे क्लास में पढ़ाई की। उच्च स्तर की स्पोकन इंग्लिश ट्रेनिंग के लिए शिक्षा विभाग ने ब्रिटिश काउन्सिल ऑफ इंडिया की मदद से कोर्स शुरू किया है। एक और उपलब्धि यह है कि दिल्ली सरकार दिल्ली के लिए अलग शिक्षा बोर्ड गठित करने जा रही है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि सीबीएसई का मौजूदा पाठ्यक्रम आईआईटी, नीट की तैयारी करने वाले बच्चों के लिए केवल 10 प्रतिशत मददगार सिद्ध होता है। मनीष सिसौदिया का दावा है कि नए शिक्षा बोर्ड का लक्ष्य ऐसे पाठ्यक्रम बनाना होगा, जिससे शिक्षा अधिक प्रासंगिक बन सके।
दिल्ली की स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में सचमुच बड़े बदलाव हुए हैं। उनका पूरा असर सामने आने में कुछ समय लगेगा। लेकिन इतना अभी भी कहा जा सकता है कि दिल्ली ने देश के अन्य राज्यों को अनुकरण के लिए शिक्षा का सचमुच एक नया मॉडल दिया है।
पीनैस करिकुलम दिल्ली के सरकारी स्कूलों में ऐसी अभिनव पहल है जो देश भर के शिक्षा विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित कर रही है। इसका अनुसरण करते हुए दिल्ली के कुछ प्राइवेट स्कूलों ने भी इसे लागू कर दिया है। हैपीनैस करिकुलम को मिल रहे समर्थन का एक बड़ा कारण भारत का ‘ग्लोबल हैपीनैस इंडेक्स’ में बहुत नीचे होना है। संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में तैयार की गई वल्र्ड हैपीनैस रिपोर्ट-2019 में 156 देशों के नागरिकों का आकलन प्रस्तुत किया गया है। इसमें भारत का स्थान पिछले कुछ सालों में तेजी से गिरा है और 2019 में इसका स्थान 140 वां हो गया है।
हैपीनेस इंडैक्स की बात करें तो विश्व में सबसे सुखी लोग फिनलैंड में हैं। कुछ महत्वपूर्ण देशों की रैंकिंग इस प्रकार है-स्विट्जरलैंड-6, कनाडा-9, इंग्लैंड-15, जर्मनी-16, अमेरिका-19, जापान-58, पाकिस्तान-67, रूस-68, चीन-93, नेपाल-100, बांग्लादेश-125, श्रीलंका-130, म्यांमार-131, भारत-140। जब देश में किसानों को आत्महत्या करनी पड़ती हो, बेरोजगारी 45 साल में सबसे अधिक हो गई हो, विकास दर घट रही हो, कानून के शासन की जगह अनेक राज्यों में जंगल राज और गुंडागर्दी का आलम हो, बलात्कार और भीड़ द्वारा हत्याएं हो रही हों, तो भारत का हैपीनैस सूची में अत्यधिक नीचे होना समझ में आता है। आम जन के मन में सवाल उठता है कि शिक्षा से इन सब चीजों पर क्या असर पड़ेगा? मनोविज्ञानी मानते हैं कि अगर बेहतर मानसिकता वाले लोग हों तो समाज में हिंसा, ईष्र्या, बलात्कार, आत्महत्या, तलाक, शोषण और आतंकवाद आदि अभिशाप खुद-ब-खुद कम हो जाएंगे।
दिल्लीके शिक्षामंत्री मनीष सिसौदिया कहते हैं कि शिक्षा का मूल उद्देश्य महज डाक्टर, इंजीनियर, प्रशासक, चार्टर्ड अकाउंटेंट, मैनेजर, वैज्ञानिक, शिक्षक आदि तैयार करना भर नहीं होता, बल्कि उसका व्यापक सामाजिक उद्देश्य भी होता है, जो ईमानदार, नैतिक, मानवीय गरिमा संपन्न और कानून का अनुपालन करने वाले अच्छे नागरिक तैयार करने का है। हैपीनैस करिकुलम इस उद्देश्य को पूरा करेगा।
इतिहास में जाएं तो पॉजिटिव साइकोलॉजी के अनुसंधानकर्ताओं ने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में एक हैपीनैस करिकुलम तैयार किया था जो इंग्लैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान में कुछ सालों से स्कूलों में लागू है। लेकिन सिसौदिया मानते हैं कि हर देश का हैपीनैस करिकुलम स्थानीय जरूरतों और परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए। अपना हैपीनैस करिकुलम विकसित करने के काम में सबसे बड़ी समस्या यही थी कि यह एकदम नई चीज थी, न पूर्व-निर्मित पाठ्यक्रम था, न शिक्षकों को कोई समझ कि इसकी क्लास कैसे संचालित की जाएंगी। पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए कुछ गैर सरकारी संगठनों, बाल मनोचिकित्सकों, माइंडफुलनैस विशेषज्ञों, क्लीनिकल मनोचिकित्सकों, शिक्षकों की मदद ली गई। दिल्ली के स्टेट काउन्सिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग की वरिष्ठ अधिकारी सुश्री स्वाति चौरसिया बताती हैं कि हमने काफी समय इसके लिए पाठ्य पुस्तक लिखने और ऐसे टीचरों की पहचान करने में लगाया जो इस विषय में वास्तविक दिलचस्पी रखते हों। अगली चुनौती थी कि हजारों टीचरों को इसके लिए कैसे प्रशिक्षित किया जाए। 1027 सरकारी स्कूलों में हैपीनैस करिकुलम लागू करना था इसलिए हर स्कूल में एक टीचर कोर्डिनेटर बनाया गया। उन्हें दो -दो दिन का प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए 16 मेंटर टीचर तय किए गए। तीन विशेषज्ञ काउन्सिलर थे जो पाठ्य पुस्तकों के लिए मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पक्ष सामने रखते थे और उन्हें इन पहलुओं के आलोक में जांचते थे। इस सब काम में पांच गैर-सरकारी संगठनों ने विशेष मदद की। तीन-तीन हजार के बैच में 21,000 शिक्षकों को ट्रेन किया गया। जो भी टीचर सामने आए, वे स्वेच्छा से आए। 600 टीचर ऐसे तय किए गए जो क्लास में निरीक्षण करते, मदद करते, करिकुलम की कमियां पकड़ते जिससे वांछित सुधार किया जा सके। असल में यह सारी प्रक्रिया विकासपरक रही। हैपीनैस करिकुलम नर्सरी कक्षा से शुरू होकर 8 वीं कक्षा तक लागू है। नर्सरी कक्षाओं में केवल दो दिन और शेष कक्षाओं में एक पीरियड हर रोज इसके लिए निर्धारित किया गया है।
डावली पूर्वी दिल्ली का एक ऐसा इलाका है जो राष्ट्रीय राजधानी का हिस्सा होते हुए भी राजधानी जैसा नहीं लगता। सघन आबादी वाला यह इलाका जो पहले कभी गाँव था, बाद में अनधिकृत कॉलोनी में तब्दील हो गया। देश भर से हर साल आने वाले लाखों आप्रवासियों के लिए रहने की सस्ती जगह ऐसी कालोनियों में ही मिलती है। मंडावली को 2012 में अधिकृत कॉलोनी का दर्जा मिला तो उसके बाद से पतली-पतली गलियों के दोनों और बहुमंजिले दड़बे जैसे घर बन गए जिनमें न हवा आती और न धूप। इत्तिफाक से यह इलाका सामूहिक सहकारी आवास समितियों के नजदीक है, जहां विकास का दूसरा रूप है। उस इलाके में बड़े-बड़े निजी स्कूल भी हैं जिन्हें जमीन तो दिल्ली विकास प्राधिकरण से बेहद रियायती दर पर मिली, पर फीस फिर भी यहाँ तगड़ी वसूली जाती है। पर मंडावली इलाके में गरीब लड़कियों के लिए भी दिल्ली सरकार का एक स्कूल था सर्वोदय कन्या विद्यालय नंबर-3 जो बुरे हाल में था। दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार आने के बाद इस स्कूल में भी सुधार शुरू हुए। स्कूल में इस समय नर्सरी से लेकर 12 वीं तक के 1,962 विद्यार्थी हैं। शिक्षकों की संख्या 74 है और क्लास रूम 56। होम साइंस लैब, कंप्यूटर साइंस लैब, इनफार्मेशन एन्ड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी लैब, मैथ्स लैब और कंप्यूटर एडिड लर्निंग लैब जैसी आधुनिक सुविधाएं हैं। नतीजा यह कि मोटी फीस देकर निजी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की तुलना में इन गरीबों और वंचितों के स्कूल का रिजल्ट बेहतर है। अन्य अनेक स्कूलों की तरह इस स्कूल का बारहवीं का रिजल्ट पिछले साल शत-प्रतिशत रहा। यह क्या हुआ, कैसे हुआ, यह जानने के लिए स्कूल की हैड श्रीमती रचना पाराशर से प्रस्तुत है एक संक्षिप्त बातचीत।
प्रश्न : शिक्षा के नए विजन को अपनाने और उसे लागू करने में आपको किन अप्रत्याशित बाधाओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
उत्तर: शिक्षा के नए विजन की चुनौती को स्वीकार करने के मामले में सबसे बड़ी बाधा यह रही कि अध्यापिकाओं की पहले से कोई कोई तैयारी नहीं थी। उनकी ओर से विरोध भी हुआ लेकिन वह इसलिए नहीं कि काम ज्यादा करना पड़ेगा,बल्कि इसलिए था कि अन्य गतिविधियों के चलते वे मौजूदा सिलेबस को समय पर पूरा कैसे कराएँगी, जिससे कि लड़कियां मौजूदा ढांचे की परीक्षा के लिए तैयार की जा सकें। अध्यापिकाएं सिलेबस पूरा कराने को अपनी पहली जिम्मेवारी मानती थीं। असल में नई चीजें कुछ पुरानी चीजों को खत्म किए बिना शुरू हो गई थीं। शिक्षा के नए ढाँचे में हैपीनैस और उद्यमिता (एंटरप्रेन्यरशिप माइंडसैट) बेहतरीन पहल थी,लेकिन इसके लिए अध्यापिकाओं को तैयार करना भी जरूरी था। बहरहाल शिक्षा विभाग ने इन दो नए पाठ्यक्रम के लिए ट्रेनिंग की अच्छी व्यवस्था की जिससे वे इन दो पाठ्यक्रमों को ठीक से संचालित कर सकीं।

प्रश्न: आपने लड़कियों को पढ़ाई को गंभीरता से लेने के लिए कैसे प्रेरित किया ? और उनकी शैक्षिक आवश्यकताओं और उनके माता-पिता की अपेक्षाओं के बीच आमतौर पर रहने वाली खाई को कैसे पाटा?
उत्तर: विद्यार्थियों से उनकी पढ़ाई के बारे में ठीक से बात करो तो उनकी दिलचस्पी बढऩे लगती है। स्कूल की हैड होने के नाते मैंने यह सुनिश्चित किया कि मैं क्लास 9,10,11 और 12 की हर लडक़ी से बात करूँ और उन्हें उनके नजरिए से समझूं, उनकी कठिनाई के पीछे के मूल कारण का पता लगाऊं और समाधान ढूँढूं। असेंबली में, क्लास रूम में सामूहिक रूप के अलावा, मैंने व्यक्तिगत स्तर पर लड़कियों के साथ-साथ उनके पेरेंट्स की भी काउंसलिंग करने की पहल की। इससे पढ़ाई के बारे में बच्चों और माँ-बाप के बीच नई समान समझ बनी। इसके अलावा जब भी जरूरत महसूस हुई मैंने खुद क्लासरूम में जाकर अंग्रेजी की क्लास ली।

प्रश्न: विद्यार्थियों की उपलब्धियों के संदर्भ में बात करें तो आपके विद्यालय का प्रदर्शन कैसा रहा? आपने अपने स्कूल में क्या बदलाव किए, ताकि लड़कियों का प्रदर्शन बेहतर हो ?
उत्तर: रिजल्ट तो नाटकीय ढंग से सुधर गए। 12वीं कक्षा में 100 परसेंट रिजल्ट रहा। 10 वीं क्लास का रिजल्ट 80.1 प्रतिशत रहा जो पिछले साल से 13.1 प्रतिशत अंक अधिक था। इसमें यह भी देखने की बात है कि 8वीं तक किसी विद्यार्थी को फेल नहीं कर सकते हैं, इससे विद्यार्थियों में 8 वीं तक लापरवाही का आलम रहता है और कमजोरी रह जाती है। फिर दो साल के अंदर ही बच्चों को अपना स्तर उठाने में कठिनाई रहती है। टीचरों की सारी कोशिश यह पहचानने में रहती है कि लर्निंग गैप कहाँ है।

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