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...तो ऐसे लगी थी धारा 370

- डॉ. पी.एल.चतुर्वेदी -
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अनुसार देशी रियासतों को यह अधिकार दिया गया था कि वे देश के स्वतंत्र होने पर चाहे तो भारतीय संघ में सम्मिलित हों अथवा पाकिस्तान में या वे स्वतंत्र रह सकते हैं। ऐसी 562 देशी रिसायतें थीं। इसके अंतर्गत एक ही प्रकार का विलय पत्र भी प्रसारित किया गया। प्रारंभ में 561 देशी रियासतों के राजाओं ने भारतीय संघ में अपने सम्मिलित किये जाने की सहमति प्रदान की किंतु कश्मीर के राजा हरिसिंह प्रारंभ में निर्णय न कर सके। इसके लिए उस समय के कुछ वर्षों की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। कश्मीर में उस समय रामचन्द्र काक प्रधानमंत्री थे। काक की पत्नी ब्रिटिश नागरिक थी और तत्कालीन वायसराय माउंटबेटन की पत्नी की सहेली थी। उन्होंने महाराजा को यह परामर्श दिया कि कश्मीर को स्विट्जरलैण्ड के समान भारत और पाकिस्तान से समान दूरी रखते हुए स्वतंत्र देश बनाना चाहिए। कश्मीर राज्य 3 भागों में विभाजित था। पहला मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी, दूसरा हिन्दू बहुल जम्मू और तीसरा बौद्ध बहुल लद्दाख। वहां के निवासी शेख अब्दुल्ला 1928 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.एस.सी. की उपाधि लेकर लौटे और यहां आकर मुस्लिम कांफ्रेंस केे रूप में एक दल बनाया। 1930-31 में कश्मीर में बड़े साम्प्रदायिक दंगे हुए और बड़े पैमाने पर पंडितों का नरसंहार हुआ। महाराजा ने उस आंदोलन को सख्ती से दबा दिया। यद्यपि शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में मुस्लिम कांफे्रंस का महाराजा के प्रति विरोध चलता रहा। 1946 में शेख अब्दुल्ला के द्वारा महाराजा हरि सिंह को निकाले जाने और वहां की प्रजा को अधिकार देने हेतु ‘कश्मीर छोड़ो’ आंदोलन प्रारंभ किया। अपने इस आंदोलन के समर्थन के लिए उन्होंने मुस्लिम कांफ्रेंस का नाम बदलकर नेशनल कान्फ्रेंस कर दिया और उसके सम्मेलन में अपने करीबी मित्र जवाहर लाल नेहरू को आमंत्रित किया। महाराज हरिसिंह ने नेहरू को इस आंदोलन के संबंध में कश्मीर न आने का आग्रह किया। किंतु नेहरू आए, इस पर उन्हें तत्काल बंदी बना लिया गया। इस घटना के परिणामस्वरूप महाराजा हरिसिंह और जवाहरलाल नेहरू के बीच संबंध काफी कटु हो गए। उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार पटेल को कश्मीर के संबंध में सारी जानकारी प्राप्त हो रही थी। उन्होंने महाराजा हरिसिंह को परामर्श दिया कि रामचन्द्र काक को हटाकर मेहरचंद महाजन को कश्मीर का दीवान बनाया जाये और कुछ समय बाद काक के स्थान पर मेहरचंद महाजन ने कार्यभार संभाल लिया। मेहरचंद महाजन ने महाराजा से इस बात का आग्रह किया कि उन्हें कश्मीर का विलय भारत के साथ कर देना चाहिए। दूसरी ओर सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गुरुजी से आग्रह किया कि वे कश्मीर जाकर महाराजा हरिसिंह को भारत के साथ विलय के लिये राजी करें। गुरु गोलवलकर ने 18 अक्टूबर 1947 को श्रीनगर जाकर महाराजा हरिसिंह से भेंट की और उनसे तुरंत भारत में विलय के लिए आग्रह किया। लौटकर उन्होंने यह सूचना सरदार पटेल को भी दे दी।
उसी समय कबाइलियों के वेश में पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर की सीमाओं पर आक्रमण कर दिया और स्थिति ऐसी बनी कि उन्हें आक्रमण में प्रारंभिक सफलता मिलती चली गई और कश्मीर के कुछ भू-भाग पर उन्होंने कब्जा कर लिया। ऐसी स्थिति में मेहरचंद महाजन के आग्रह पर महाराजा हरिसिंह ने 25 अक्टूबर 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के अंतर्गत दिए गए विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर अपना दूत दिल्ली भेजा। उल्लेखनीय है कि इसी विलय पत्र पर देश की अन्य 561 रियासतों ने भारत में विलय किया था और उस विलय पत्र में किसी प्रकार की कोई शर्त नहीं थी। 26 अक्टूबर को भारत सरकार ने विलय को स्वीकार कर तुरंत अपनी सेनाएं भेजी। भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सेना को कश्मीर के हिस्से से वापस खदेडऩा शुरू कर दिया और पर्याप्त भू-भाग वापिस अपने कब्जे में कर लिया। भारतीय सेनाएं बढ़ती जा रही थीं किंतु 31 दिसम्बर 1947 और 1 जनवरी 1948 को माउंटबेटन के आग्रह पर नेहरू ने उस विषय को संयुक्त राष्ट्र संघ में दे दिया। यहां यह उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में भेजने के निर्णय की जानकारी गृहमंत्री सरदार पटेल को भी नहीं थी और ना ही कैबिनेट को। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 3 शर्तों के साथ युद्ध विराम की घोषणा कर दी गई और इस प्रकार कश्मीर का जो भाग पाकिस्तानी सेनाओं के अधिकार में रहा वह आज भी पाक शासित कश्मीर के रूप में मौजूद है। पं. नेहरू ने महाराजा से आग्रह कर शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री बना दिया। शेख अब्दुला ने यह शर्त रखी कि महाराजा हरिसिंह राज्य से बाहर रहेंगे। यह शेख अब्दुल्ला की महाराजा के प्रति पूर्व कटुता को प्रमाणित करता है। एक ओर निजाम हैदराबाद जिसने सशस्त्र विद्रोह का प्रयत्न किया उसे राज प्रमुख बनाया और हरिसिंह को निष्कासन। हरिसिंह बाकी जीवन कभी कश्मीर में प्रवेश नहीं कर सके। कश्मीर की नागरिकता संबंधी इन प्रावधानों के कारण ही 1947 में पाकिस्तान से विभाजन के समय जो पाक विस्थापित जम्मू जाकर बसे थे, वे अभी तक कश्मीर के नागरिक नहीं माने गये और उन्हें न कश्मीर के चुनावों में मताधिकार मिला, न वे भूमि खरीद सके, न उन्हें वहां नौकरी या अधिकार या उद्योग-धन्धे करने का हक मिला, न ही शासकीय ऋण प्राप्त करने की सुविधा मिली। ऐसे करीब10 लाख शरणार्थी कैम्पों में मजदूरी आदि कर अपने परिवारों का भरण-पोषण कर रहे हैं। जबकि उनके समान अन्य पाक विस्थापित भारत के अन्य भागों में जा बसे, वे उपरोक्त सभी सुविधाओं का उपभोग कर अपना भविष्य सुधारकर आनंद से रहे रहे हैं। ऐसे दो विस्थापित इन्द्रकुमार गुजराल और मनमोहन सिंह तो भारत के प्रधानमंत्री बन चुके हैं।
शेख अब्दुल्ला ने शासन संभालने के बाद भारत सरकार से आग्रह किया कि कश्मीर की विशिष्ट परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए उनके लिए भारत सरकार विशिष्ट सुविधाएं दे। जिसके अंतर्गत उनके लिये संविधान में अलग व्यवस्था की जाए। याद रहे कि उस समय देश की संविधान सभा संविधान का निर्माण कर रही थी। नवम्बर 1949 में (विलय के 2 वर्ष बाद) तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने धारा 370 के रूप में संविधान में एक अनुच्छेद सम्मिलित करने का निर्णय लिया, जिसके अंतर्गत कश्मीर के विशेष दर्जे को स्वीकार कर विदेश मामले, मुद्र्रा एवं संचार व्यवस्था तथा सेना सहित तीन मामलों को छोडक़र बाकी अन्य विषयों पर कश्मीर राज्य को पूर्ण अधिकार दे दिए गए।
यह विशेष व्यवस्था कराने के समय पं. नेहरू अमरीका गए हुए थे और उन्होंने बिना मंत्रिमण्डल की अनुमति निर्देशित किया कि ऐसी व्यवस्था को संविधान में जुड़वाया जाय। विधि मंत्री और संविधान के निर्माता डॉ. अंबेडकर ने नेहरूजी से कहा भी कि वे ऐसे किसी प्रावधान का मसौदा नहीं बनाएंगे। तब बिना विभाग के मंत्री गोपालस्वामी आयंगर से यह प्रावधान जुड़वाया गया। पं. नेहरू के इस प्रस्ताव पर कांग्रेस में ही तीव्र विरोध हुआ। इस विरोध का नेतृत्व मौलाना हसरत मोहानी ने किया, जिन्होंने रोष प्रकट करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर के विरुद्ध इस प्रकार के प्रस्ताव द्वारा भेदभाव बरता जा रहा है। तब आयंगर ने कांग्रेस के नेताओं से कहा कि पं. नेहरू के अमेरिका में होने के कारण उनके इस प्रस्ताव की अस्वीकृति विदेशों में गलत संदेश देगी। इसलिए इस प्रावधान को अस्थायी रूप से कुछ समय के लिए स्वीकार कर लिया जाये।
अक्टूबर 1947 के विलय और 1949 के इस संविधान प्रावधान से यह स्पष्ट है कि विलय के समय कश्मीर को विशेष सुविधा देने की कोई बात स्वीकार नहीं की गई थी। इसके बाद जम्मू-कश्मीर में अलग संविधान सभा बनी और उसमें यह प्रावधान किए गए कि जम्मू-कश्मीर का अलग ध्वज होगा, अलग संविधान होगा, उनके यहां का प्रमुख मंत्री प्रधानमंत्री कहलायेगा। राज्यपाल के स्थान पर सदर-ए-रियासत होगा और भारत का कोई नागरिक बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश नहीं कर सकेगा। साथ ही कश्मीर की नागरिकता भारत की नागरिकता से भिन्न होगी।
भारत के नागरिकों को कश्मीर में भूमि खरीदने, नौकरी करने अथवा शासन की सभी सुविधाएं नहीं मिलेंगी। इन प्रावधानों के विरोध में जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दल प्रजा परिषद ने प्रेमनाथ डोगरा के नेतृत्व मेें तीव्र विरोध किया। राज्य में प्रबल आंदोलन हुआ, जिसमें सैंकड़ों लोग गोलीकांड व लाठीचार्ज में मारे गए। हजारों लोग बंदी बनाए गए। प्रजा परिषद् ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित देश के अन्य नेताओं को उनके सम्मेलन में आकर स्थिति की जानकारी लेने का निमंत्रण दिया। भारतीय जनसंघ के डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी और हिन्दू महासभा के वी.जी. देशपाण्डे सहित अनेक नेताओं ने सम्मेलन में भाग लिया और प्रजा परिषद् के आंदोलन को पूर्ण समर्थन दिया। इसके परिणाम स्वरूप देश भर में इन दलों के द्वारा आंदोलन का निश्चय किया। सैंकड़ों की संख्या में सत्याग्रही जम्मू जाने लगे और वहां जाकर उन्होंने इन प्रावधानों के विरोध में सत्याग्रह किया। सत्याग्रहियों का उद्घोष होता था - ‘एक देश में दो निशान, दो विधान, दो प्रधान - नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे’ एवं परमिट व्यवस्था हटाई जाए।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सत्याग्रहियों का नेतृत्व संभाला और स्वयं उद्घोषणा की कि वे 6 मई 1952 को बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश करेंगे। डॉ. मुखर्जी के साथ सांसद उमाशंकर त्रिवेदी, दिल्ली प्रदेश जनसंघ के अध्यक्ष वैद्य गुरुदत्त व अटल बिहारी वाजपेयी थे। पठानकोट के पास कश्मीर सीमा में माधोपुर पहुंचने पर डॉ. मुखर्जी सहित 2 लोगों को बंदी बना लिया गया।
डॉ. मुखर्जी ने अटल बिहारी वाजपेयी को निर्देशित किया कि जाकर देश को बता दो कि ‘डॉ. मुखर्जी ने बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश कर लिया है, चाहे बंदी के रूप में।’ आंदोलन चलता रहा। यकायक 24 जून को प्रात:काल समाचार आया कि 23 जून की रात डॉ. मुखर्जी का देहांत हो गया। इसके पूर्व उनके स्वास्थ्य के संबंध में कभी कोई जानकारी नहीं दी गई। संपूर्ण देश में दु:ख की लहर थी। चारों ओर मांग उठ रही थी कि मुखर्जी की संदेहास्पद परिस्थितियों में मौत की जांच की जाए। किंतु पं. नेहरू की सरकार ने उसे भी अनसुना कर दिया और इस प्रकार यह देश भक्त कश्मीर के एकीकरण के लिए स्वयं का बलिदान कर गए। आंदोलन भी स्थगित हो गया।
किंतु उसके कुछ समय पश्चात ही भारत सरकार द्वारा शेख अब्दुल्ला को स्वतंत्र देश की मानसिकता संबंधी गतिविधियों में लिप्त पाए जाने के कारण प्रधानमंत्री पद से हटाकर बंदी बना लिया गया और उनके स्थान पर बक्शी गुलाम मोहम्मद को नियुक्त किया गया। कश्मीर सरकार के आग्रह पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा 1954 में धारा 35-ए सम्मिलित की गई जिसमें यह प्रावधान किया गया कि कश्मीर के निवासियों को विशेष अधिकार दिए जाएं इसके अतिरिक्त किसी भी बाहरी व्यक्ति को कश्मीर में जमीन खरीदने, नौकरी ना करने आदि अनेक व्यवस्था की गई।
यहां तक व्यवस्था की गई कि कश्मीर की कोई लडक़ी भारत के किसी लडक़े से शादी कर लेती है तो उसकी कश्मीर की नागरिकता समाप्त हो जाएगी और उसके पैतृक अधिकार समाप्त हो जाएंगे। यह भी व्यवस्था की गई कि कोई भी जम्मू-कश्मीर में उद्योग-धन्धे नहीं लगा सकता। तभी से निरंतर इन प्रावधानों के विरोध में मांग होती रही किंतु किसी भी शासन ने इनको समाप्त करने का साहस नहीं दिखाया। नरेन्द्र मोदी को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने दोनों व्यवस्थाओं को समाप्त कर कश्मीर का पूर्ण एकीकरण किया है।

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