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हिंसा-तिकड़म कब तक?

— अनिल चतुर्वेदी —

दिल्ली विधानसभा के चुनावी नतीजे हमारे इस अंक का प्रमुख मुद्दा हैं। इसी पर अंदर के पेजों में करीने से छ्द्रिन्वेषण (पोस्टमार्टम) किया गया है। मगर चुनाव बाद दिल्ली को जिस तरीके से सुलगाया गया है, उसे करीने का पर्यायवाची बताना भी गंभीरता को कमतर आंकना होगा। मतलब ये कि दिल्ली में जो हरकती हिंसा का तांडव हुआ, वो घोर निंदनीय है।
क्या लाशों के ढेर पर बैठकर राज करना ही मौजूदा शासकों का लोकतंत्र बन गया है ? तभी तो, लगता है, ‘बदला लेने’ और ‘ठोकने’ वाला कट्टर शासन तंत्र विकसित करने की ठान ली गई है। यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि बीते दिसम्बर माह में एक खांटी संघनिष्ठ भाजपा नेता ने ‘प्रेसवाणी’ में दिल्ली स्कूली शिक्षा का गुणगान करने पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि आप बिलकुल निराधार रिपोर्टिंग करते हैं। दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था बकवास हो चुकी है। नेताजी ने तैश में आकर दिल्ली सुलगाने का इशारा भी कर दिया। कहा, अब तो वहां आर-पार के हालात बन गए हैं। बिछ जाएं लाशें। पर अब ठिकाने लगाकर ही दम लेंगे।
समझ में नहीं आता कि जिस भाजपा के दशकभर पहले के शासनकाल में तत्कालीन राजनेताओं ने लोकतांत्रिक समरसता का बेहतरीन उदाहरण पेश किया, उसी पार्टी में 10-15 सालों के भीतर कट्टरपंथ कैसे हावी हो गया ? क्या ये बदलाव तब औऱ अब के राजनेताओं के अपने-अपने क्षेत्रीय दृष्टिकोण मंे फर्क की वजह से आया है ? जाहिर है, आज के पार्टी आका उस सीमावर्ती राज्य से ताल्लुक रखते हैं, जिसके पड़ोस में घोर कट्टरपंथी चिर-बैरी देश है। उस देश के साथ तनावपूर्ण रिश्तों का लबादा ओढ़े हमारे वर्तमान राज-पुरुष पूरे देश पर राष्ट्रवाद का नशा चढ़ाने पर तुले हुए हैं।
यहां एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं खुद प्रधानसेवक का प्रशंसक रहा हूं। उन्होंने मजबूत इच्छाशक्ति का नजारा पेश कर कुछेक बड़े ही साहसिक फैसले लिए हैं। मगर इसका मतलब ये तो नहीं कि पूरे देश में बहुसंख्यकवाद की आंधी चलवा दी जाए, जिसमें अल्पसंख्यकों को खलनायक बताकर उन्हें उड़ा ले जाने की कोशिश होने लगे। शासक वर्ग को ये नहीं भूलना चाहिए कि हर कौम, समुदाय में गद्दार मौजूद हैं। यकीन न हो तो अपराध ब्यूरो का रिकॉर्ड खंगाल लिया जाए। इसमें बहुसंख्यक वर्ग के भी तमाम उपाध्यायों, त्यागियों, मिश्राओं, राजपूतों औऱ रैगरों के नाम मिल जाएंगे, जिन्होंने अपना ईमान बेचकर दुश्मन देशों के लिए जासूसी तथा आतंकियों की मदद की है। महिलाओं पर कहर बरपाने वाले बहुसंख्यक पिशाचों की भी कमी नहीं है। सवाल ये है कि क्या ये राक्षस अल्पसंख्यकों को नेस्तनाबूद करने भर से इंसान बन जाएंगे और फिर, देश में रामराज्य स्थापित करने में प्रण-प्राण से जुट जाएंगे ? शासक वर्ग को कट्टरपंथ के इस कोण पर भी गौर कर भूल-सुधार की सोचनी चाहिए।
इस समय मन को विचलित करने वाला एक और घटनाक्रम देखने को मिल रहा है, जिसने हमारी न्याय-व्यवस्था की विश्वसनीयता को दांव पर लगा दिया है। वीभत्स निर्भया कांड के दोषियों को बचाने की पैंतरेबाजी ने अदालती फैसलों को उपहास का विषय बना दिया है। न्याय की देवी की निष्पक्षता पर ग्रहण लगा दिया है। इस मामले में नैतिकता तथा समूचे देश की भावना को ठेंगा दिखाकर कानूनी दांवपेंच के जरिए अदालती आदेशों को पलीता लगाने का जो खेल खेला जा रहा है, उससे कोर्ट-कचहरी और वकीलों को लेकर बनी आमधारणा की ही पुष्टि होती है कि मुकदमे तथा वकील के चक्कर में उलझकर दमड़ी तक निकल जाती है। पेशागत प्रतिबद्धता के नाम पर दोषियों के सलाहकारों द्वारा न्यायिक संस्थाओं की बधिया उधेड़े जाने से प्रश्न यही उठता है कि क्या पेशेवर अंदाज, लोगों को यांत्रिक और संवेदन-शून्य बनाता चला जा रहा है ?

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