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बवाल खत्म

— अनिल चतुर्वेदी —
अयोध्या मसला हल हो गया। राम मंदिर की जमीन के इस विवाद को निपटाने में न जाने कितनी पीढियां खप गईं। सुप्रीम कोर्ट ने मैराथन सुनवाई की। उसके बाद फैसला सुनाया, जिसमें न्याय से ज्यादा आस्था का पुट समाहित रहा। इसे एक नजरिये से कह सकते हैं कि शीर्ष कोर्ट ने देश की अपार जनभावना के मद्देनजर न्याय किया है।
कहते हैं न, न्याय वो जो होता दिखे। यह न्याय बहुसंख्यकों के साथ होता दिखा है। देश का बड़ा वर्ग संतुष्ट हुआ है। हो भी क्यों न, आखिर ये वर्ग भारत को अपना राष्ट्र, अपनी धरती मानता है। यहां इसकी आस्था और विश्वास को समुचित स्थान व सम्मान नहीं मिलेगा तो कहां मिलेगा? और भी तो देश हैं, जहां बहुसंख्य समाज का विश्वास और परंपराएं स्थापित हैं। धर्म-कर्म उनके अपने हैं। धर्मनिरपेक्ष देश हों या धर्म विशेष देश, सभी जगह बहुसंख्य आबादी की आस्था ही सर्वोपरि है। धर्मनिरपेक्ष देशों में धार्मिक स्वतंत्रता जरूर है। इसके तहत अन्य धर्मावलंबियों को भी अपने मत के निर्वहन की आजादी है। फिर भी बोलबाला बहुसंख्यक समाज का ही रहता है। इसाई देशों में ईसा मसीह पूजे जाते हैं तो मुस्लिम देशों में सिर्फ इस्लाम को अहमियत दी जाती है। लिहाजा भारत में भी बहुसंख्य हिंदुओं की धार्मिक भावना को महत्व मिलता है तो क्या हर्ज है?
रही बात सुप्रीम कोर्ट के उल्लेखित फैसले को समभावी नजरिये से देखने की तो कहा जा सकता है कि इसमें कानून अंधा होने की मान्यता के साथ थोड़ा समझौता जरूर हुआ है। यदि अयोध्या विवाद की कोर्ट में हुई मैराथन सुनवाई पर गौर करें तो समझौते की बात स्पष्ट हो जाती है। सुनवाई के दौरान ऐसे कई मौके आए जब मुस्लिम पक्ष की दलीलों का तार्किक जवाब सामने वाले पक्षकारों के पास नहीं था। कोर्ट द्वारा भी उठाए गए दो-तीन बिंदुओं पर रामलला पक्ष द्वारा संतोषजनक दलीलें प्रस्तुत नहीं की जा सकीं। एकाधा अवसर पर तो ठोस दलीलों के अभाव में इस पक्ष के वकील सिर्फ यही कह पाए कि मुद्दा करोड़ों हिंदुओं का आस्था का है, जिसकी कोर्ट अनदेखी नहीं कर सकता। पूरी बहस का खास पहलू यह भी रहा कि एक ओर से जहां वकीलों की फौज जिरह कर रही थी, वहीं मुस्लिम पक्ष से मुख्य रूप से केवल एक बड़े वकील ने मोर्चा संभाला। उनकी दमदार बहस से कई बार कोर्ट रूम का माहौल गरमाया भी।
लगभग महीने भर लगातार चली बहस के बाद ऐसा लगा कि कुछ बिंदुओं पर हिंदू पक्ष की कमजोर पैरवी का असर फैसले पर पड़ सकता है। हालांकि ऐसा हुआ नहीं और बहुसंख्यक समाज की इच्छा के अनुरूप ही फैसला सुनाया गया। मगर कोर्ट ने मस्जिद के संबंध में जो आदेश दिए, उनसे स्पष्ट आभास होता है कि कोर्ट ने खुद अपने फैसले को न्याय की कसौटी पर खरा नहीं पाया है। इसीलिए उसने मस्जिद निर्माण अयोध्या में ही किसी प्रमुख स्थान पर कराने का आदेश देकर तथा बाबरी मस्जिद ढहाए जाने को कानून के खिलाफ बताकर फैसले को संतुलित बनाने की कोशिश की।
हमने इस अंक में अयोध्या विवाद पर शीर्ष कोर्ट के फैसले को ही मुख्य मुद्दा बनाया है। ‘मुद्दे की बात’ में इस विषय पर चर्चा इस उम्मीद के साथ की गई है कि अब ये बवाल सदा के लिए खत्म हो और देश प्रगति का राह पकड़े। बातें, वादे खत्म हों, काम पर ध्यान दिया जाए।

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