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परिवार नियोजन की उल्टी चाल ने बढ़ाए वोटबैंक

— आभा शर्मा —
प्रधानमंत्री ने परिवार नियोजन अपनाने वालों की भावना को देशभक्ति से जोड़ते हुए उनके योगदान को सराहा है। यह सही है कि दशकों पहले बहुत से साधन संपन्न और शिक्षित लोगों ने, यहाँ तक कि बहुत से माध्यम वर्गीय परिवारों ने भी अपने परिवार सीमित रखने का स्वत: स्फूर्त निर्णय लिया था। अस्सी के दशक में परिवार नियोजन के तहत-‘हम दो हमारे दो’ का नारा दिया गया था। इसी के साथ सरकार ने देशवासियों से परिवार सीमित रखने की अपील भी की। उसी अपील का असर रहा, जो देश की जरूरत मानते हुए लाखों-करोड़ों परिवार एक या दो संतनों में सिमट गए। मगर आज उन्हीं परिवारों में एक टीस महसूस की जा रही है। राष्ट्रीय चिंता दूर करने में बने सहयोगी की आज कद्र न होने की टीस।
क्योंकि वर्तमान ने इन परिवारों के लिए अपने ही देश में राजनीतिक उपेक्षा का माहौल पैदा कर दिया गया है। इनके लिए प्रोत्साहन की जमीन तैयार करने की बजाय महत्वहीन माने जाने के हालात बनाए जा रहे हैं। करीब दो दशकों के राजतंत्र ने १९वीं सदी के शासनकाल के निर्णय और अपील को मानो भुला सा दिया है। तभी तो वे परिवार, समाज और वर्ग पूजे जा रहे हैं, जिन्होंने परिवार नियोजन की जमकर धज्जियां उड़ाई। बच्चों की लाइन लगा दी। संख्याबल उनके साथ है और राजनीति शरणागत है।
इसमें कोई शक नहीं कि परिवार नियोजन की अवधारणा अपनाने वाले देशों में भारत अग्रणी है। किंतु यदि तीन-चार दशक की जनसंख्या वृद्धि व राजनीतिक समृद्धि आंकड़ों पर नजर डालतें हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि अधिक बच्चे पैदा करने वाले परिवार, सीमित परिवार वालों से ज्यादा सुखी हैं। वे राजनीति की दिशा मोडऩे की ताकत से लैस वोटबैंक बन गए हैं। इसीलिए सरकारी सुविधाओं, योजनाओं और सब्सिडी का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। परिवार का आकार बड़ा होने का सुखद प्रभाव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष उनके जीवन के हर क्षेत्र में पड़ रहा है।
उनके सामने परिवार नियोजन अपनाने वाले परिवार खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। उन्हें अधिक आबादी के कुप्रभाव का दंश सबसे अधिक साल रहा है। फिर चाहे सरकारी शिक्षण संस्थों में बच्चों की दाखिला हो, सरकारी अस्पतालों में अनियंत्रित भीड़ा का दबाव या सडक़ पर वाहनों की रेलमपेल और व्यस्त घंटों में वाहन पार्किंग ढूंढऩे की जद्दोजहद, सीमित परिवार अपनाने वाला व्यक्ति हर कहीं खुद के लिए जगह पाने को जूझ रहा है।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि बड़े परिवार की स्थिति किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। बहुत से समुदायों में यह आम है। परिवार नियोजन अपनाने वाले परिवारों ने देश भक्ति तो निभाई पर अब उनका यह सोचना लाजिमी है कि क्या वे उस बहुसंख्यक आबादी की वजह से राज की हर सुविधा का सीमित लाभ पाकर ही संतुष्ट रहें। उन्हें एक प्रकार से अपने कत्र्तव्य पालन का खामियाजा उठाना पड़ रहा है।
प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत वर्ष लाल किले की प्राचीर से 130 करोड़ देशवासियों को संबोधित करते हुए भारत की बढती जनसंख्या पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था, जो नागरिक अपने परिवार छोटे रखते हैं, वह एक प्रकार की देशभक्ति में लीन हैं। मोदी ने जनसंख्या विस्फोट पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आने वाली पीढिय़ों के लिए यह बड़ी चुनौती है। केंद्र और राज्य सरकारों को इससे निपटने के लिए कदम उठाने चाहिए। मोदी की चिंता को बढाने वाली संयुक्त राष्ट्र संघ की वो हालिया रिपोर्ट है, जिसमें कहा गया है कि भारत वर्ष 2027 तक जनसंख्या के मामले में चीन को पीछे छोड़ देगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी इस विश्व जनसंख्या परिद्र्श्य-2019 रिपोर्ट के मुताबिक साल 2050 तक भारत की आबादी में 273 मिलियन की वृद्धि होगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस सदी के आखिर तक दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश भारत ही रहेगा। वर्ष 2019 में चीन की अनुमानित आबादी 1.43 अरब बताई गई, जबकि भारत की जनसँख्या 1.37 अरब बताई गई है। बढ़ती जनसंख्या को लेकर चिंतित होने के कारण अनेक हैं। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैय्या करवाने की चुनौती तो है ही, साथ में शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर दबाव जैसे मुद्दे भी जुड़े हैं।
देश में सोशल मीडिया और अन्य मंचों पर यह चिंता व्यक्त की जाने लगी है कि जिन परिवारों में अधिक बच्चे हैं, वे सरकारी सुविधाओं, सब्सिडी और देश के संसाधनों का सबसे अधिक लाभ उठाते हैं। जो अपना परिवार सीमित रखते हैं, उन करदाताओं पर यह एक प्रकार का भार है। क्योंकि जो लोग परिवार सीमित रख रहे हैं, वे देश के संसाधनों का दोहन भी कम कर रहे हैं, पर टैक्स अधिक चुका रहे हैं।
कुछ दिनों पहले दिल्ली हाईकोर्ट में भी एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें आबादी नियंत्रण के लिए कड़े कदम उठाने की गुहार की गई थी। वर्ष 2018 में करीब 125 सांसदों ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई थी कि देश में ‘टू चाइल्ड नॉर्म’ की पालना सुनिश्चित की जाए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भी कई मौकों पर जनसंख्या विस्फोट के मुद्दे पर चिंता व्यक्त की गई है। हालांकि उसकी चिंता एक खास समुदाय को लेकर रही है, जबकि कई अन्य समुदाय भी जनसंख्या वृद्धि के कारक बने हैं। संघ के अनुसार मुस्लिम समुदाय की तेजी से बढ़ती जनसंख्या ने हिन्दू विकास दर को पीछे छोड़ दिया है और इससे देश के कई हिस्सों का जनसांख्यिकी अनुपात बदल गया है। संघ द्वारा इस बात पर भी चिंता व्यक्त की जाती रही है कि मुस्लिम वर्ग अपनी बढ़ती आबादी का लाभ उठा रहे हैं।

पेचीदा मसला
जनसंख्या नियंत्रण होना चाहिए या नहीं, यह काफी पेचीदा और संवेदनशील मसला है। विडंबना ये है कि अभी भी ऐसे तमाम लोग है, जो मानते हैं कि परिवार कितना बड़ा या छोटा रखा जाए, इसका निर्णय करने का अधिकार परिवारों को ही होना चाहिए। इसे सरकार द्वारा नियंत्रित करने की कोई नीति नहीं होनी चाहिए। पर यदि संसाधन सीमित हों और देश को विकास की राह पर भी आगे बढऩा है तो जनसंख्या को सीमित रखने के उपायों के बारे में सोचना सबकी जिम्मेदारी है। क्योंकि यदि संसाधन सीमित हैं और जनसंख्या अनियंत्रित, तो बहुत सी चुनौतियां पेश आती हैं। ऐसा नहीं है कि भारत अकेला ऐसा देश है जो जनसंख्या विस्फोट की समस्या से जूझ रहा है। चीन में भी यही समस्या है, लेकिन उसने अपनी बढती आबादी पर रोक लगाने के लिए ‘वन चाइल्ड नॉर्म’ लागू किया, यानी सिर्फ एक बच्चा। इसपर कड़ाई से उसने अमल भी किया। इस मुहिम में चीन सरकार की इच्छाशक्ति और ईमानदार प्रयास की सबसे महत्वपूर्ण हैं।
इसके ठीक विपरीत हमारे देश की सरकार ने पहले परिवार नियोजन के लिए ‘बच्चे बस दो या तीन ही अच्छे’ का नारा बुलंद किया। उसके बाद ‘हम दो, हमारे दो’ पर जोर दिया गया, बस। इन नारों को अमलीजामा पहनाने में सरकारी प्रयास पूरी तरह विफल साबित हुए। सरकार ने सिर्फ अलख जगाई, आगे तमाम देशवासियों ने जागरूकता का उजियारा फैलाने की कोशिश की। इसी क्रम में आजकल तो यह भी देखा जा रहा है कि बहुत से शहरी कामकाजी और काफी हद तक संपन्न दंपत्ति स्वयं की इच्छा से एक से अधिक बच्चे पैदा नहीं कर रहे हैं।

प्राइवेट मेम्बर्स बिल
संसद के विगत सत्र में सांसद राकेश सिन्हा द्वारा 12 जुलाई 2019 को एक प्राइवेट मेम्बर बिल पेश किया गया था। तब देश में एक बार फिर से यह मुद्दा गरमा गया है कि क्या भारत को अपनी जनसंख्या नीति में बदलाव करना चाहिए? आबादी नियंत्रित करने के लिए दंड का प्रावधान होना चाहिए या प्रोत्साहन अधिक कारगर होगा?
इस जनसंख्या विनियमन विधेयक को प्रस्तुत करते हुए राज्यसभा सदस्य राकेश सिन्हा ने कहा कि आबादी विस्फोट से देश के संसाधनों और पर्यावरण पर भारी दबाव है, जो आगामी पीढ़ी के विकास और प्रगति पर प्रतिकूल असर डालेगा। उनके विधेयक में सुझाव था कि सरकारी कर्मचारियों को यह अंडरटेकिंग देनी चाहिए कि वे दो से अधिक बच्चे पैदा नहीं करेंगे। उन्होंने दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले लोगों को चुनाव लडऩे से वंचित रखने का सुझाव भी दिया। साथ ही अधिक बच्चे पैदा करने वाले परिवारों को कल्याणकारी योजनाओं, सरकारी सुविधाओं और सब्सिडी आदि से वंचित रखने का सुझाव था। जाहिर है, मौजूदा वोटबैंक समुदायों को ये विधेयक कैसे माफिक लगता, इसी कारण वे विधेयक को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा से प्रेरित मानते हुए इसकी आलोचना करने लगे हैं।
विधेयक के मुख्य बिंदु
जनसंख्या विनियमन विधेयक 2019 के उद्देश्य और कारणों में कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या आकलन के अनुसार भारत 2050 तक सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। इस वृहद् आबादी और देश की विविधता को देखते हुए नीति निर्माताओं और देश के सामने भोजन, साफ पेयजल, सुलभ आवास, गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा, आर्थिक और जीवनयापन के अवसर, घरेलू बिजली, सुरक्षित जीवन जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना एक बड़ी चुनौती होगी। चूँकि देश के आर्थिक और पर्यावर्णीय साधन सीमित हैं, इसलिए इस बात पर विचार करने की गंभीर जरूरत है कि हम आगामी पीढ़ी के लिए सांख्यिकी बदलाव की प्रक्रिया की रूपरेखा कैसे बनाएं। हालांकि शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है फिर भी भारत अभी भी गाँवों में निवास करता है, जो जनसंख्या विस्फोट के प्रमुख कारक भी हैं। गांवों में देश की 69 प्रतिशत आबादी रहती है। वहीं, शहरों के बेतरतीब विकास से लाखों लोगों को बुनियादी जरूरतों के बिना जीवन यापन करना पड़ रहा है।
पूर्व और दक्षिण एशिया के कई देशों जैसे दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, विएतनाम, बांग्लादेश, थाईलैंड आदि ने छोटे परिवार की अवधारणा को प्रभावी तरीके से अपनाया है और इसका लाभ उन्हें मिला है। इसलिए इस विधेयक में भारत में भी छोटे परिवारों के माध्यम से जनसंख्या नियंत्रण का उद्देश्य निहित है। इसमें सीमित परिवार रखने वाले केंद्र सरकार और सार्वजनिक उपक्रम के कर्मचारियों के लिए कार्यकाल में एक अतिरिक्त इन्क्रीमेंट का सुझाव है। साथ ही सरकारी आवासीय योजनाओं में मकान या प्लाट खरीदने में सब्सिडी, बैंक आदि से बेहद कम ब्याज पर कर्ज, इनकम टैक्स में रिबेट, ट्रेन, सडक़, हवाई सफर में सब्सिडी सहित पितृत्व अवकाश, स्वास्थ्य और इन्स्युरेंस सुविधाओं जैसे अनेक प्रोत्साहनों का जिक्र है। इसमें शिक्षा और अच्छे शैक्षिणक संस्थानों में दाखिले सम्बन्धी सुविधाओं का भी उल्लेख है।
इन लाभों के लिए सरकारी कर्मियों को अंडरटेकिंग देनी होगी कि वे दो से अधिक बच्चे पैदा नहीं करेंगे।
दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले परिवारों को इस विधेयक में प्रस्तावित प्रोत्साहनों और सुविधाओं का लाभ नहीं मिल सकेगा। उन्हें विविध ऋणों पर उपलब्ध सब्सिडी कम मिलेगी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभ भी सीमित होंगे। उन्हें बैंकों से ऋण के लिए अधिक ब्याज दर चुकानी होगी। दो से अधिक बच्चों वाले कर्मियों को मातृत्व और पितृत्व अवकाश की सुविधा तो मिलेगी, लेकिन अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि देने की बात विधेयक में नहीं की गई है। विधेयक में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि दो से अधिक बच्चों वाले लोग संसद, विधान सभा आदि का चुनाव भी नहीं लड़ पाएं।

भारत में टू चाइल्ड नॉर्म की पालना
पिछले ही साल असम सरकार ने घोषणा की थी कि दो से अधिक बच्चे वाले लोग वर्ष जनवरी 2021 से सरकारी नौकरियों के लिए पात्र नहीं होंगे। राजस्थान प्रदेश पंचायत चुनाव में दो से अधिक बच्चों वाले प्रत्याशियों को नकारने वाला पहला राज्य है। बाद में इसे आन्ध्र प्रदेश और हरियाणा, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ ने भी अपने यहां लागू कर दिया। राजस्थान में सरकारी नौकरियों में भी इस नियम को लागू किया गया। कमोबेश 12 राज्यों में अलग-अलग तरह से दो बच्चों की नीति लागू हो चुकी है। नौकरियों में भी और पंचायत चुनावों में भी। यह बात और है कि बाद में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में इसे वापस भी ले लिया गया। टू चाइल्ड नॉर्म का विरोध करने वाले लोगों का तर्क है कि इससे लोगों के प्रजातान्त्रिक और प्रजनन सम्बन्धी अधिकारों का हनन होता है। पर सीमित संसाधनों में अधिक जनसंख्या को बुनियादी सुविधाएं मुहैय्या करवाना भी सरकारों के लिए एक बड़ी चुनौती है। यदि नागरिक स्वयं ही जागरूकता से परिवार नियोजन को अपनाएँ तो समस्या काबू में रह सकती है।
एक तरह से देखा जाए तो भारत में परिवार नियोजन की अवधारणा का सूत्रपात पहली लोकसभा के गठन के पूर्व ही हो गया था। हालांकि महात्मा गांधी परिवार नियोजन के लिए किसी सरकारी अभियान के पक्षधर नहीं थे पर सरकार को शुरू से ही इस बात की जरूरत महसूस हुई कि जनसंख्या पर नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन किया जाना चाहिए। यह और बात है कि आपातकाल के दौरान हुई कथित ज्यादतियों के चलते यह अभियान पटरी से उतर गया। देखा जाए तो आपातकाल की ज्यादतियां ही जनसंख्या वृद्दि की दृष्टि से टर्निंग प्वाइंट साबित हुईं। उसके बाद किसी सरकार की सख्ती बरतने की हिम्मत नहीं हुई औऱ आबादी बेरोकटोक बढती चली गई। जिसके चलते अस्सी के दशक में ‘हम दो हमारे दो’ अभियान शुरू किया गया। वर्ष 2000 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति आई, जिसमें 2045 तक जनसंख्या को स्थिर करने का लक्ष्य रखा गया। देश के जिन राज्यों में प्रजनन दर अधिक है, वहां के सामाजिक-आर्थिक सूचकांक अपेक्षाकृत कम हैं। जब किसी भी स्थान का शिक्षा और आर्थिक स्तर बेहतर होता है तो आम तौर पर बाल मृत्यु दर कम हो जाती है। परिवार नियोजन सबसे अच्छा साधन विकास है, यह भारत के सन्दर्भ में सामयिक प्रतीत होता है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, राजस्थान और मध्य प्रदेश सामाजिक-आर्थिक सूचकांकों की दृष्टि से काफी निचले पायदान पर हैं, खास तौर पर महिलाओं की स्थिति के सन्दर्भ में और यहाँ प्रजनन दर भी अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक है। उदाहरण के लिए बिहार में महिला शिक्षा की स्थिति चिंताजनक है तो वहां प्रजनन दर भी चिंताजनक है। इसके विपरीत केरल में महिला शिक्षा करीब करीब शत-प्रतिशत है, वहां प्रजनन दर भी बहुत कम है।
तेजी से बढ़ती प्रजनन दर जनसंख्या वृद्धि के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। सामाजिक, आर्थिक एवं अन्य उपायों की पालना से इस पर नियंत्रण के उपाय अति आवश्यक हैं। वरना भारत विकास की दौड़ में पिछड़ जायेगा। ये पिछड़ाव तो वैश्विक परिप्रेक्ष्य में नजर आएगा, लेकिन देश के भीतर की तस्वीर और भी चिंताजनक होगी। सीमित व छोटे परिवारों की शिक्षित, सुसंस्कृत संतानें उपेक्षा से व्यथित होकर वतन छोडऩे को मजबूर होंगी, जबकि बेहिसाब बच्चों वाले वोटबैंक परिवार संख्याबल का नंग-नाच दिखाएंगे। इससे आज का बेहाल भारत इतिहास के दोहराव की उस अवस्था में पहुंच सकता है, जहां एकबार फिर विदेशी आक्रांता सोने की इस चिडिय़ा को पिंजरे में कैद करने की स्थिति में होंगे। ये हालात पैदा न हों, इसके लिए सरकार को सबसे पहले मजबूत इरादा दिखाते हुए वोटबैक का लालच त्यागना होगा। फिर, न सिर्फ आबादी पर काबू पाने की ईमानदार कोशिश करनी होगी, बल्कि सीमित परिवार वालों के लिए आकर्षक प्रोत्साहन पेश करने होंगे। मौजूदा राजनेताओं को ये बात याद रखनी होगी कि उनकी वास्तविक दोशभक्ति पढ़े-लिखे, सुसंस्कृत लोगों को आगे बढाने से साबित होगी, न कि भीड़तंत्र को पालकर उसे जाहिल-नकारा बनाने से। भीड़तंत्र के साथ नेतागण राजभोग का आनंद तो ले सकेंगे, लेकिन प्रजासुख के परमानंद से सदा वंचित रहेंगे।

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