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पधारो म्हारे देस, करिये निवेश

- अशोक शर्मा -

राजस्थान कोरोना वायरस को काबू में रखने और अर्थव्यवस्था को सुचारू बनाये रखने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। लॉकडाउन खत्म होने के बाद धीरे धीरे आर्थिक गतिविधियाँ शुरू हुई हैं। जाहिर है अब बदली परिस्थितियों में मुख्यमंत्री कार्यालय में फिर से हलचल देखी जा सकती है। पर जब तक राजस्थान सरकार खास तौर पर और केंद्र सरकार मोटे तौर पर एक प्रतिस्पर्धी आधारभूत ढांचा प्रस्तुत करने तथा लाल फीताशाही को खत्म करने में अपनी प्रतिबद्धता नहीं दिखातीं तब तक चीन में स्थित अमेरीकी, जापानी, दक्षिण कोरिया अन्य विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश और उत्पादन के लिए आकर्षित करना आसान नहीं होगा। एक प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी बनने की राह में जोखिम कम नहीं हैं। रेगिस्तानी प्रदेश राजस्थान और केंद्र को कोई न कोई आक्रामक नीति अपनाने के बारे में सोचना पड़ेगा।
पिछले महीने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रवासी राजस्थानियों के साथ एक ग्लोबल वीडियो कॉफ्रेंस की थी। एक सरकारी वक्तव्य में कहा गया कि पचास देशों के 90 शहरों में रहने वाले राजस्थानी प्रवासियों ने इस वीडियो कॉफ्रेंस में भाग लिया। ये बड़ी अच्छी बातचीत रही। हालांकि गहलोत का उद्देश्य प्रवासियों से सिर्फ प्रदेश को बोली और संस्कृति के बारे में विचारों का आदान प्रदान और उनकी कुशलक्षेम पूछना ही था। बातचीत में निवेश पर ठोस चर्चा नहीं हुई। मगर ये कहा जा सकता है कि इस बातचीत से आगे की निवेश सम्बन्धी गोलमेज वार्ताओं का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वीडियोकांफे्रंस के माध्यम से सभी प्रवासी हितधारकों को संबोधित किया है। वे विदेशी निवेश में स्पष्ट और तथ्य आधारित बातचीत के पक्षधर हैं। उन्होंने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की भूल-भुलैया को समझने के लिए ‘टास्क फोर्स’ गठन सहित विभिन्न तरीकों पर काम करने की जरूरत समझी है। मकसद साफ है गहलोत चीन में स्थापित अमरीकी कंपनियों का रुख मरू प्रदेश राजस्थान की तरफ मोडऩा चाहते हैं। मुख्यमंत्री का कहना है कि, कोरोना संकट काल के वक्त दुनियाभर के निवेशक भारत की तरफ उम्मीद लगा रहे हैं। राजस्थान निवेश के गंतव्य के रूप में उभर रहा है और करीब हजार से अधिक कम्पनियां अपना बेस चीन से भारत में स्थानांतरित करने को तैयार हैं। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि राजस्थान देश का एकमात्र राज्य है, जिसने आर्थिक मंदी के दौर में निवेश को आकर्षित करने और उद्योगपतियों को प्रोत्साहित करने के लिए पैकेज के रूप में नीतिगत पहल की हैं।
यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि प्रधानमंत्री बनने से पूर्व स्वयं नरेन्द्र मोदी ने ओवरसीज मिशन बनाने की पहल पर बल देते हुए प्रत्येक राज्य को एक देश विशेष से संपर्क साधने को कहा था। प्रधानमंत्री ने हाल ही में निवेशकों को आकर्षित करने के लिए त्वरित रणनीति पर चर्चा करने के लिए एक बैठक बुलाई थी। इसमें उन्होंने राज्यों को विदेशी निवेश लाने के लिए अलग से अपने कार्यक्रम बनाने का आह्वान किया।

ट्रम्प चाहते मोदी की बड़ी भूमिका
इसमें कोई दो राय नहीं है कि कोविड-19 महामारी विश्व अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी साबित हुई है। दुनिया सिर्फ ठहरी हुई ही नहीं है, यह काफी विपरीत स्थिति में है। इस तरह की परिस्थिति में कई बार आप पीछे चले ही जाते हैं। अमेरिका सहित जापान, कोरिया, सिंगापुर आदि देश बीजिंग के डूबते जहाज से कूदने को हैं और भारत के लिए यह एक अवसर है। ये देश चीन में स्थित अपनी कंपनियों को दूसरे देशों में जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। अमेरिका कब से भारत को आगे बढक़र इस क्षेत्र में अपनी वृहत भूमिका निभाने के लिए कह रहा है। ट्रम्प अपनी भारत यात्रा पर जोर देते हुए भारत को ‘इनक्रेडिबल कंट्री’ और मोदी को महान व्यक्ति और महान नेता कह चुके हैं। वहीं, चीनी नेता शी जिनपिंग ने जी-7 सम्मेलन में भारत को बुलाने और चीन में स्थित कंपनियों को भारत में बुलाने के ट्रम्प की योजना पर एतराज जाहिर किया है। चीनी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा ‘चीन और यूएस के बीच तनाव औद्योगिक श्रृंखला को अन्य स्थानों पर आकर्षित करने के लिए भारत के लिए एक अवसर नहीं हो सकता।’

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए कदम
इधर, राजस्थान के उद्योग मंत्री परसादी लाल मीणा ने हाल ही में एक व्यापार चैम्बर की वेबिनार संबोधित करते हुए प्रवासी उद्यमियों का राजस्थान में निवेश के लिए आवाह्न किया। उन्होंने कहा कि प्रदेश और देश में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया जा रहा है। राज्य सरकार शीघ्र ही एकल खिडक़ी व्यवस्था शुरू करने जा रही है, जहाँ सभी निवेशकों को सारी सुविधाएं एक जगह पर मिल सकेंगी।
इसी कड़ी में पूर्व मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने हाल ही में कहा, आपदा को अवसर में बदलने के लिए राजस्थान सरकार यूएस और जापान अधिकारियों के संपर्क में हैं और जापान ने प्रस्तावित निवेश में सकारात्मक रुख दिखाया है। यूएस अधिकारियों के साथ बातचीत जारी है। इससे पहले एक वीडियो कांफ्रेंस में उन्होंने कहा था कि चूँकि अमेरिकन कम्पनियां वर्तमान हालात में किसी कम्युनिस्ट देश में अपना बेस स्थापित नहीं करना चाहती हैं, ऐसे में राजस्थान सरकार ने भारत में संयुक्त राज्य के राजदूत केनेट जस्टर और जापानी राजदूत सतोशी को लिखा है और उन्हें भरोसा दिलाया है कि राज्य सरकार विदेशी निवेशकों की जरूरतों को समझती है। यदि उनके देश की कम्प्पनियाँ यहाँ निवेश करती हैं तो राजस्थान सरकार उन्हें हर संभव सुविधा और रियायतें मुहैया करवाएगी।
इसी प्रकार पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव-उद्योग डॉ. सुबोध अग्रवाल ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अध्यक्षता में आयोजित एक बैठक में कहा, हम विदेशी कंपनियों के प्रस्तावित निवेश पर ध्यान दे रहे हैं। प्रदेश में औद्योगिक गतिविधियों को फिर से चालू करवाना तो हमारा प्रयास है ही पर नये निवेश को आकर्षित करने की कोशिश भी की जा रही है। करीब 350 निवेशकों ने 11,628 करोड़ लागत के निवेश प्रस्ताव दिए हैं। हमने पहले ही निवेश आकर्षित करने के लिए राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना और औद्योगिक नीति की घोषणा कर दी है।
राजस्थान सरकार और शीर्ष अधिकरियों के बयानों के मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि चीन में स्थित विदेशी कंपनियों के प्रदेश में आकर निवेश करने की विपुल संभावना है। इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार पर है कि वे किस तरह आकर्षक नीतियां बनाए। राजस्थान को इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि और भी राज्य हैं और कई दूसरे देश भी हैं, जो चीन के बाहर निवेश की इच्छुक कंपनियों को आकर्षित कर रहे हैं। इसलिए राजस्थान सरकार को चाहिए कि निवेश के उचित माहौल का निर्माण करे। इसके लिए मुख्यमंत्री के अध्यक्षता में वरिष्ठ अधिकारियों को लेकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश टास्क फोर्स या राज्य मिशन का गठन किया जा सकता है।
उद्योग विभाग के मंत्री खरबों डॉलर के वैश्विक निवेश को आकर्षित करने के लिए जरूरी सहयोग और सुविधाएं प्रदान करने पर काम करें। प्रक्रिया नियमों के सरलीकरण से अलग-अलग विभागों और मंत्रालयों से समय पर मंजूरी दिलवाना, लक्ष्यबद्ध तरीके से मुख्य निवेशकों का मूल्यांकन कर निवेश की सुविधा प्रदान करना और समग्र निवेश वातावरण में नीति स्थिरता सुनिश्चित करना होगा।
अवसर हाथ से न जाने दे भारत : हुसैन हक्कानी
अमेरिका स्थित हडसन इंस्टिट्यूट में साउथ एंड सेन्ट्रल एशिया के निदेशक और पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्रियों नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो के सलाहकार, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपतियों जोर्ज बी. बुश और बराक ओबामा के कार्यकाल में वहां पाकिस्तान राजदूत रह चुके हुसैन हक्कानी से भारत में निवेश संभावनाओं पर बातचीत की गई। वाशिंगटन से फोन पर उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश-
प्रश्न : चीन से निवेश खिसकने के बदलते परिदृश्य में किस तरह से भारत सहित अन्य देश इसका लाभ उठा सकते हैं? आपकी क्या राय है? क्या नई दिल्ली बीजिंग का तार्किक विकल्प है? यदि नहीं तो क्या भारत को अपना अति आत्मविश्वास त्याग देना चाहिए कि निवेशक भारत का रुख करेंगे?
हुसैन हक्कानी : चीन से अपना हाथ खींचने वाली ज्यादातर कम्पनियां उत्पादक कम्पनियां हैं। उनके लिहाज से भारत चीन का तार्किक विकल्प है, जहाँ सौ करोड़ से अधिक की आबादी है और बड़ी संख्या में सस्ते मजदूर मिल सकते हैं। पर जहाँ तक व्यापार में सरल प्रक्रिया की रैंकिंग है, भारत की स्थिति मजबूत नहीं है और महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार (भूमि, श्रम और पूँजी) भी अभी लागू नहीं किये गए हैं, जो इन कंपनियों के लिए स्वागत योग्य वातावरण बनाने में सहायक हों। इस वजह से इनमें से कई कम्पनियां भारत आने के बजाय वियतनाम, थाईलैंड और ताइवान चली गई हैं। भारत के पास अभी भी इन कंपनियों को आकर्षित करने का मौका है, पर उसे बिना समय गँवाए कदम उठाने पड़ेंगे कि कहीं देरी से अवसर हाथ से न फिसल जाए। कम्पनियां व्यापार में सुगमता और लाभ के लिहाज से निवेश संबंधी अपने निर्णय लेंगी ना कि इसलिए कि उन्हें किसी एक देश से अधिक प्यार है या वे इसे अपने देश के रणनीतिक साझेदार के रूप में देखते हैं।
प्रश्न : व्हाइट हाउस के आर्थिक सलाहकार लैरी कुद्लो द्वारा अमेरिकन कंपनियों को चीन से वापस बुलाने का विचार व्यक्त करने के बाद अमेरिकन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स द्वारा बीजिंग और शंघाई में किये गए सर्वे के मुताबिक कई कंपनियों का वापस लौटने का मानस नहीं है। आपका क्या कहना है?
हुसैन हक्कानी : कम्पनियां तभी वापस लौटेंगी जब उन्हें प्रोत्साहन, मुनाफे और निवेश पर लाभ का यकीन हो। जो उत्पादक कम्पनियां हैं और उनके लिए दूसरी जगह शिफ्ट होने का अर्थ है करोड़ों डॉलर का नुकसान, जो उन्होंने वर्षों पहले फेक्ट्रियां लगाने में निवेश किए हैं। जापानी सरकार ने इस बात को समझा है और इसलिए वे अपनी कंपनियों को चीन से बाहर बुलाने के लिए कीमत अदा कर रही है। कुछ अमेरिकन कम्पनियां शुद्ध रूप से राजनीतिक कारणों या देशभक्ति से चीन के बाहर जा सकती हैं, पर उनमें से भी अधिकतर को आर्थिक प्रोत्साहन की जरूरत पड़ेगी। अमेरिका की सरकार चीन से बाहर आने वाली कंपनियों को करों में राहत दे सकती है और न आने वाली कंपनियों पर ज्यादा टैक्स लगाने का निर्णय भी ले सकती है। चीन ने विश्व की अर्थ व्यवस्था और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में खुद की इतनी गहरी जड़ें जमा ली हैं कि उसे हिलाना इतना आसान नहीं है। कंपनियों का मुनाफे का मकसद इस काम को और भी जटिल बना सकता है।


अन्य राज्यों की पहल
राजस्थान को अपना प्रोत्साहन दायरा बढ़ाना चाहिए। साथ ही विदेशी निवेश को आकर्षित करने की रणनीति क्रियान्वयन के लिए छोटी समय सीमा निर्धारित करनी चाहिए। क्योंकि अन्य राज्य भी इस अवसर को लपक रहे हैं। तमिलनाडु सरकार ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक विशेष निवेश प्रोत्साहन टास्क फोर्स गठित की है, ताकि चीन के बाहर निवेश की इच्छुक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को आकर्षित किया जा सके। मुख्यमंत्री के. पलानिस्वामी ने करीब एक दर्जन ऑटोमोबाइल उत्पादक कंपनियों से अपने राज्य में निवेश का आह्वान किया है। वे खास तौर पर जापान, कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और संयुक्त राज्य अमरीका की कंपनियों को लाने का प्रयास कर रहे हैं। इस टास्क फोर्स मंद इन देशों के व्यापार संगठनों के प्रतिनिधि होंगे। सरकार विशेष प्रोत्साहन पैकेज और निवेश की इच्छुक कंपनियों को फास्ट ट्रेक मंजूरी की व्यवस्था करेगी। इसी प्रकार आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने कहा है कि निवेश आकर्षित करने के लिए राज्य सरकार भूमि, जल, बिजली और कुशल श्रम उपलब्ध करवाने के लिए तैयार है। हरियाणा सरकार ने हाल ही में विदेशी सहयोग का एक पृथक विभाग स्थापित किया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और भारत में जापान के राजदूत सतोशी सुजुकी की अध्यक्षता में आयोजित एक संयुक्त बैठक में खट्टर ने उनकी सरकार द्वारा विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए उठाये गए नए कदमों और भूमि आवंटन से लेकर उत्पादक इकाइयों को लीज पर जमीन देने आदि के बारे में विचार साझा किये। उत्तर प्रदेश सरकार सहित देश के कुछ अन्य राज्यों ने जैसे मध्य प्रदेश और गुजरात ने अपने श्रम कानूनों के कुछ हिस्सों को निलंबित किया है, जो फैसला भले ही विवादित रहा हो, पर कुछ कंपनियों ने इस वजह से तुरंत भारत आने का निर्णय ले लिया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में कई अमरीकी कंपनियों के साथ वीडियो कॉफे्रंसिंग की हैं। उत्तर प्रदेश सरकार उन्हें आकर्षित करने के लिए एक पैकेज पर काम कर रही है। जहाँ तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रश्न है, गुजरात शिखर पर रहा है और उसने चीन से भारत आकर निवेश करने वाली कंपनियों के लिए एक नोडल अधिकारी भी नियुक्त कर दिया है।

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