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‘इंडिया’ के लॉकडाउन में ‘भारत’ बेहाल

- प्रेसवाणी डेस्क -

एक महामारी से बचने के लिए देश-दुनिया में लॉकडाउन किया गया, ये अच्छा फैसला रहा। पहली नजर में ये फैसला मानव कल्याण की सोच से लिया गया लगता है। जरूरत के लिहाज से, जब तक कोरोना वायरस के इलाज की कोई वैक्सीन या दवा नहीं तैयार हो जाती, तब तक तो इंसानी जिंदगी बचाने का लॉकडाउन ही एक मात्र प्रभावी उपाय है।
पर क्या इस लॉकडाउन को लागू करने में जल्दीबाजी की गई? क्या इस फैसले से हमारे शासक वर्ग की नोटबंदी के बाद एक बार फिर अदूरदर्शिता उजागर हुई है? अगर इन सवालों का जवाब ‘ना’ है, तब तो शासकों की वाह-वाह है। लेकिन यदि जवाब ‘हां’ है, तो ये बहुत ही भयानक और चिंता में डालने वाली सच्चाई है। देश के पश्चिमी भाग में प्रवासी मजदूरों का सडक़ पर उतर आना। पूर्वी भाग में अपने घर जाने के जुनून में बिना आगा-पीछा सोचे, पैदल ही निकल पडऩा। रास्ते में दाने-दाने को तरस जाना। जब कोविड-19 के प्रकोप से डरे शासन-प्रशासन द्वारा लोगों को घरों में कैद हो जाने और सोशल डिस्टेंसिंग के आदेश जारी किए जा रहे हों, उसी दौरान लगभग एक-चौथाई आबादी जान हथेली पर ले कर घरों से निकल रही है, तो ऐसे हालात उक्त दोनों सवालों के जवाब ‘हां’ होना ही साबित करते हैं।
एक ऐसा वर्ग घर वापसी को मजबूर हुआ है, जो सही मायने में राष्ट्र निर्माता है। उसी की अथक मेहनत ने देश में सडक़ों का जाल बिछाया है। रेल नेटवर्क को मूर्त रूप दिया है। इमारतों, स्मारकों को खड़ा किया है। कल-कारखानों में उत्पादन भी इसी वर्ग की बदौलत संभव हुआ है। मगर लॉकडाउन में इसी वर्ग की रोजी-रोटी छीन ली गई। कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं की गई। मानो जैसे ये वर्ग हाड़-मांस नहीं, कल-पुर्जों का बना हो। जिसे न तो भूख लगती है, न ही इसमें संवेदना पैदा होती है। शायद यही मानकर सब कुछ बंद करते समय शासकों द्वारा इसके बारे में सोचा नहीं गया। अब जब इसमें इंसान जागा है तो राज-पुरुष से लेकर राज-तंत्र तक के हाथ-पांव फूल रहे हैं। वे हड़बड़ी में राहतों का पिटारा इस तरह खोल रहे हैं, जैसे किसी रोते हुए बच्चे को हेन-तेन चुप कराने की कोशिश कर रहे हों।
राहतें भी ऐसी जो तत्काल नहीं, अगले दो-तीन माह बाद लाभ पहुंचाएंगी। मतलब आज जिसे प्रचंड गर्मी और भूख से मरना है, वो मर जाए। जो बचेंगे वो आगे राहतों के सहारे जिंदा रहने की स्थिति बना सकते हैं। ऐसा दृष्टिकोण उसी राजा का होता है जो अपनी प्रजा से कटा हुआ होता है, जिसमें दूरदर्शिता नाम मात्र की भी नहीं होती।
लॉकडाउन जैसा पाबंदियों से भरा फैसला लेना आसान नहीं होता। उसके लिए बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से आगे बढऩा होता है। खासकर भारत जैसे देश में। जहां आजादी के दशकों बाद भी सामाजिक असमानता चरम पर है। अमीर व सुविधाभोगी केवल 20-30 फीसदी हैं, बाकी आबादी विपन्नता और अभाव के किसी न किसी रूप का सामना कर रही है। निरक्षरता, बेरोजगारी तो 40 फीसदी देशवासी झेल रहे हैं। सडक़ों पर धंधा करने वाले इसी वर्ग के ज्यादातर लोग हैं, जो रोज कुआं खोद कर पानी पीने को आज भी मजबूर हैं। ताज्जुब है कि देशवासियों के विकट हालात के बावजूद लॉकडाउन लागू करने का फैसला मात्र चार घंटे के अंतराल से ले लिया गया।
देश के बुजुर्ग प्रधानसेवक ने गत 23 मार्च की रात आठ बजे लॉकडाउन घोषित कर रात 12 बजे इसे देशभर में लागू करवा दिया। ठीक उसी तरह, जैसे 8 नवम्बर 2016 को रात आठ बजे नोटबंदी की घोषणा कर रात 12 बजे से उसे प्रभावी कर दिया। ये फैसले ही उनकी अदूरदर्शिता तथा समूचे देश से अनभिज्ञता साबित करते हैं। अफसोस इस बात का भी है कि दोनों ही मौकों पर प्रधानसेवक के राष्ट्र के नाम सम्बोधन में सिर्फ सुविधाभोगी इंडिया का जिक्र किया गया, विपन्न भारत को लेकर कुछ नहीं बोला गया। उसकी तकलीफों का अनुमान तक नहीं लगाया गया। जबकि सीमित संसाधनों के सहारे गुजरबसर करने वाला विपन्न भारत ही नोटबंदी के बाद अब लॉकडाउन में सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। मजदूरों की घर वापसी इसका ज्वलंत उदाहरण है।
सवाल ये उठता है कि बिना आगे-पीछे की सोचकर पूरे देश पर असरकारी फैसले लेने वाले राज-पुरुष जनहितैषी होने की योग्यता रखते हैं क्या? प्रधानसेवक का इस कसौटी पर खरा उतरना नजर नहीं आता। कभी-कभी तो लगता है कि उनके भीतर प्रदेशस्तरीय नेता अभी भी सक्रिय है। वह भी ऐसे प्रदेश का नेता, जो सम्पन्न माना जाता है। जहां उद्योग और व्यवसाय का ही माहौल हैं। नौकरीपेशा तथा श्रमिक राज्य के मूल निवासी नहीं हैं। ऐसे प्रदेश से निकला नेता सीधे देश का शासक तो बन गया, लेकिन उसमें समग्र राष्ट्र का दृष्टिकोण विकसित नहीं हो पाया। हां, यदि वो भी अन्य राष्ट्रीय नेताओं की भांति कुछ वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय होकर प्रत्येक राज्य, भू-भाग जानने की कोशिश करते तो उनकी सोच भी परिपक्व होती। फिर प्रधानमंत्री बनकर उनका व्यक्तित्व कुछ और ही निखार लेता। उनमें वाकई चमत्कारी नेता का अक्स झलकता।
विडंबना यह है कि ऐसे कई राष्ट्रस्तरीय नेता अभी भी हैं, जो पूरे देश को साथ लेकर चलने की क्षमता रखते हैं। मगर सत्ताधारी भाजपा में इन कुशल नेताओं को मार्गदर्शक बना कर स्थायी क्वारेंटाइन में कैद कर दिया गया है। उधर, कांग्रेस तथा अन्य दलों के सक्षम नेता प्रधानसेवक का विकल्प बनने से बचते दिखाई देते हैं। इनमें सेवा का वो जुनून नजर नहीं आ रहा है जो जनता को आकर्षित करने के लिए जरूरी है।

अदालती रूख हैरतभरा
प्रवासी मजदूरों की घर वापसी के मसले पर अदालतों का रवैया भी हैरत में डालने वाला है। खासकर सुप्रीम कोर्ट का रूख। एक-दो राज्यों के हाईकोर्ट ने तो फिर भी संवेदनशीलता दिखाई। मगर सुप्रीम कोर्ट ने तो पहले यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि मजदूर रेल पटरियों पर सोएंगे तो कोई क्या कर सकता है। इस घोर गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी के बाद वरिष्ठ वकीलों ने तो यहां तक कह दिया कि शीर्ष कोर्ट आपातकाल जैसा बर्ताव कर रहा है। और भी संगठनों की कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वप्रेरित संज्ञान लेकर भूल-सुधार की ओर कदम बढ़ाए।
वहीं, तमिलनाडु तथा दिल्ली हाईकोर्टों ने मजदूरों की पीड़ा पर संवेदना ही नहीं जताई, बल्कि सरकारों की लचर व्यवस्थाओं के लिए खिंचाई भी की। तमिलनाडु हाईकोर्ट ने तो यहां तक कह दिया कि मजदूरों का हाल देख कर किसी की भी आंखें भर जाएं। देखा जाए तो हाईकोर्टों के सख्त रवैये और आदेशों की वजह से ही पलायन कर रहे मजदूरों को थोड़-बहुत राहत पहुंचाने को केन्द्र व संबंधित राज्य सरकारें मजबूर हुईं हैं। वरना सुप्रीम कोर्ट ने तो केन्द्र से लेकर राज्यों तक शासन-प्रशासन को मजदूर मुद्दे पर उदासीनता बरतने की एक तरह से छूट दे दी थी।

पलायन के दोषी नहीं हुए दंडित
देशभर के मजदूरों को सडक़ पर ला पटकने के दोषियों को बख्शा क्यों गया है? ये सवाल हर संजीदा भारतवासी के जेहन में बार-बार उठ रहा है। केन्द्र ने तो पहले 15 दिन, फिर 21 दिन, उसके बाद तीन हफ्ते और अब दो हफ्ते का चार-चरणीय लॉकडाउन लगाकर दिहाड़ी श्रमिकों तथा सडक़ों पर छोटा-मोटा धंधा करने वालों को हलाल कर उनकी रोजी-रोटी छीनी। मगर सरकारी निर्माण कार्यों के ठेकेदारों, फैक्ट्री मालिकों, दुकानदारों, निजी कंपनियों और सामंती किसानों ने तो पहले लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही अपने-अपने कारिंदों को निकाल बाहर कर दिया।
ये सभी रोजगार-दाता लॉकडाउन में कुछ समय तक तो कामगारों को शरण दे ही सकते थे। उनकी देखभाल कर सकते थे। जबकि इन्होंने कामगारों की मेहनत से ही करोड़ों, अरबों की कमाई की है। आज जब देश को कोरोना संकट ने घेरा तो सम्पन्न मालिकों ने अपने आश्रितों पर ही सबसे पहले गाज गिरा दी। उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया।
इन व्यवसाईयों के स्वार्थ का चरम लॉकडाउन के तीसरे चरण में नजर आया, जब इनके कारोबार के फिर से शुरू होने की स्थितियां बनीं। तब ये ही लोग सरकार पर मजदूरों को रोकने का दबाव बनाने लगे। इसके लिए इन्होंने मीडिया मुगलों का भी सहारा लिया, ताकि घर लौट रहे कामगारों को रोका जा सके।
इस खेल में शासन-प्रशासन ने रोजगार-दाताओं के सहयोगी की ही भूमिका लगातार निभाई। हालांकि दिखावे के लिए सरकार ने इनसे श्रमिकों को नौकरी से न निकालने, उनका पैसा न रोकने की अपील की और आदेश भी निकाले, लेकिन इस पर अमल की गंभीरता बिलकुल नहीं दिखाई। और तो और लॉकडाउन का चौथा चरण आते-आते केन्द्र ने वेतन कटौती न करने का आदेश ही वापस ले लिया। सरकार के इस एकपक्षीय नजरिये और नियोक्ताओं की हरकत ही मजदूरों की दुर्दशा का प्रमुख कारण बनी है। पर अफसोस कि संगठित मालिकों का बाल बांका नहीं हुआ, जबकि असंगठित नौकर सडक़ों की धूल फांक रहे हैं। ऐसे मालिकों को दंडित करने की बजाय सरकार ने लॉकडाउन के दौरान उन्हें जो कुछ आर्थिक नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा भी हाथों-हाथ कर दी है।

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