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कश्मीर हमारा...

— हेमलता चतुर्वेदी —
कश्मीर पर द्विपक्षीय वार्ता बेनतीजा...अमेरिका ने की मध्यस्थता की पेशकश... सीमा पर दोनों ओर से गोलीबारी...सीमा पर सीजफायर...!
ये ऐसी सैट खबरें होती थीं, जो बचपन से अखबारों में पढी, पत्रकारिता में आने के बाद कई बार डेस्क पर बनाई और अगले दिन के अखबार में छपने के लिए छोड़ दी। यानी एक हिंदुस्तानी की उम्र के दो पड़ाव तक कुछ खबरें बदली ही नहीं। एक ही मुद्दा, एक ही भाषा,एक ही शैली और फिर वही खबर!! पर आज खबर बदली है। खबर भी खुश है और देशवासी भी!
संपूर्ण भारतवर्ष का सिरमौर, जो कूटनीति के चलते हमारा अपना हो कर भी हमारा नहीं कहला रहा था। वह अब केंद्र शासित प्रदेश है। 5 अगस्त 2019 के बाद आधिकारिक तौर पर हर भारतीय कह सकेगा कि हां कश्मीर भारत का है और हर कश्मीरी भारतीय। इस भावना के पीछे एक संस्मरण है, जिसे पाठकों के साथ साझा करना जरूरी है। जब हम विदेश में हों और वहां कोई अपने देश का मिले तो यह पहले पल में ही सुकून भरा अहसास होता है। मैं जब 2008 में स्कॉटलैंड प्रवास पर थी और वहां क्रिसमस के दिनों में एक दिन बाजार में हमें एक हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी से दिखने वाले भाई मिले। बात हुई। उनसे कुछ सामान खरीदा लेकिन अलविदा कहने से पहले जब उनसे पूछा आप कहां के रहने वाले हंै तो उनका जवाब था-कश्मीर। यह कश्मीर शब्द मेरे मन में काफी देर तक प्रतिध्वनित होता रहा। क्यों नहीं उस भाई ने खुद को भारतीय कहा? क्या भारत और कश्मीर अलग-अलग हैं? फिर लगा भारत-पाक के विवाद में पडऩे से बचने के लिए शायद कश्मीरी ऐसा कहते होंगे। पर अब कश्मीरियों को देश में या देश से बाहर डंके की चोट पर खुद को भारतीय कहने की आजादी मिली है। सरकार का यह कदम हर हिन्दुस्तानी के लिए स्वागत योग्य तो है ही फख्र की वजह भी, क्योंकि जब भी संपूर्ण देश की बात होती है कहा जाता है-‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक’। नमो-2 सरकार बनते ही, प्रधानमंत्री ने जो विश्वास शब्द अपने पिछले नारे में जोड़ा था, उसी विश्वास के चलते सरकार इतना बड़ा कदम उठा सकी, अन्यथा अब तक तो सरकारें अपनी ही जनता पर अविश्वास के चलते ठोस फैसला लेने से बचती रही हैं। कुछ माह पहले जब जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने कहा-’....पता नहीं फिर लोग कौनसा झंडा उठा लेंगे’ तो ऐसा लगा, जैसे नेता और जनता के बीच या तो तारतम्य है ही नहीं या फिर कुछ राजनेता वोट बैंक बनाए रखने के लिए इतने मजबूर हैं कि राष्ट्रीय हित न स्वयं समझना चाहते हैं और न जनता तक ऐसी भावना पहुंचाना चाहते हैं। यूं ही नरेंद्र मोदी क्षत्रप नहीं हैँ। क्षत्रप वही होता है, जो अपने क्षेत्र की हर सीमा का खयाल रखे। कश्मीर के बारे में निर्णय लेकर सरकार ने साबित कर दिया है कि देश के हर क्षेत्र पर उसकी पकड़ है और अपने देश के किसी हिस्से के संबंध में फैसला लेने का पहला अधिकार देश के शासक का है, किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं। अच्छी खबर यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, चीन और रूस भी कश्मीर पर पाकिस्तान की अपील को ठुकराते हुए भारत का फैसला संवैधानिक करार दे चुके हैं।

कश्मीर में व्यापार और चिंता
हालांकि इस फैसले के बाद देश की राजनीति तो बदली ही है। लोगों में बहस भी छिड़ गई है कि कहीं ऐसा न हो अब व्यवसायी कश्मीर में निवेश करें और वहां की प्राकृतिक खूबसूरती को नुकसान पहुंचाएं। यह आशंका अगर उठी है तो इसका समाधान भी जरूरी है।
हर जगह की अपनी विशिष्ट व्यावसायिक संभावनाएं होती हंैं और अगर उसी के अनुरूप विकास किया जाए तो प्रगति के द्वार प्रकृति स्वयं खोलती है। कश्मीर में सबसे पहले पर्यटन, फूलों, फलों और मेवों का व्यवसाय, केसर जैसी औषधि, कहवा, काँगड़ी, वहां के सलवार सूट, फिरन, शॉल, जैकेट, सिल्क, कशीदाकारी, जामवार और पश्मीना ये सब इतने बेमिसाल हैं कि इन्हीं उत्पादों का व्यवसाय वृहद् स्तर पर करके निर्यात संभावनाओं को हकीकत में उतारा जाए तो वहां कोई बड़ी इंडस्ट्री लगाने की जरूरत नहीं है। जिस घाटी में फिल्मों की शूटिंग से राजस्व आसानी से बढ़ाया जा सकता है, वहां खनन जैसी गतिविधियों के बारे में कल्पना भी करना उचित नहीं, बहस तो दूर की बात है।
एक तो जब से कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा है और 35 ए हटे हैं कुछ लोग सिर्फ एक ही चीज पर फोकस कर रहे हैं कि अब वहां जमीन ली जा सकेगी। दरअसल 35 ए के तहत देश के बाकी राज्यों के लोगों को वहां जमीन खरीदने का अधिकार नहीं था।
इस अनुच्छेद को भेदभावपरक माना जाता रहा है, लेकिन देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसे हटाने को लेकर कई तरह की आशंकाएं जाहिर की थी। नेहरू का मानना था कि ऐसा हुआ तो कश्मीर पर देश के अन्य हिस्सों के अमीरों का कब्जा हो जाएगा। असल में यह नियम कश्मीर में डोगरा शासकों के जमाने से था। इसके अलावा तथ्य यह भी है कि बाकी राज्यों के नागरिकों को जमीन खरीदने से रोकने का नियम हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, अंडमान-निकोबार, नागालैंड आदि राज्यों में भी लागू है। इसी तरह उत्तराखंड में भी बाहरी लोगों के जमीन खरीदने पर रोक है। वैसे कश्मीर के इस नियम का विरोध भी आजादी के बाद से ही होने लगा था। अशोक पांडेय की पुस्तक ‘कश्मीरनामा’ के अनुसार, नेहरू ने लोकसभा में कहा था, यह कोई नई चीज नहीं है, बल्कि एक पुराना नियम है जो चला आ रहा है और मुझे लगता है कि यह बहुत अच्छी चीज है और इसे जारी रखना चाहिए, क्योंकि कश्मीर एक बेहद लुभावनी जगह है और अगर यह नियम रद्द किया गया तो यहां के निवासियों के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा, क्योंकि अमीर लोग यहां की सारी जमीन खरीद लेंगे। यह वास्तविक कारण है और यह कारण अंग्रेजों के जमाने से, सौ साल से अधिक वर्षों से लागू है। अब इस प्रकार की आशंकाओं के चलते क्षेत्र विशेष को सामान्य गतिविधियों से वंचित करना भी उचित तो नहीं। इसके लिए कुछ मापदंड और नियम निर्धारित किए जा सकते हैं।

हटा अनजाने भय का साया
जो लोग इस फैसले के बाद सिर्फ व्यापार की बात कर रहे हैं, उन्हें इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि गर्त हटाए बिना सही तस्वीर दिखाई नहीं देती। अलगाववाद, आतंकवाद, स्वार्थ की राजनीति और भ्रष्टाचार कश्मीर की खूबसूरत तस्वीर पर जमी ऐसी ही गर्त बन चुके थे। पहले इसे हटाना जरूरी है, उसके बाद आप व्यापार और सामान्य जनजीवन की बात करें। आम हिंदुस्तानी कश्मीर भ्रमण का विचार आते ही पहले माहौल का अंदाजा लगाता है कि अगर वहां शांति हो तो ही जाया जाए। फिर अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की तो बात ही क्या करनी? वे तो मीडिया की खबरों से पहले ही कश्मीर को बजाय ऊम्दा पर्यटन स्थल के, आतंकवाद की जमीन मान बैठे हैं। यह दाग धुलना जरूरी है। व्यापार संवद्र्धन तो कई चरणों बाद की बात है, पहले जो नैसर्गिक आय के साधन हैं, उन्हें सजीव बनाया जाना जरूरी है। इसके लिए आतंकवाद और पत्थरबाजी उद्योग बंद करना जरूरी था। डल झील और उसमें हाउस बोट या शिकारे चलाने वाले कश्मीरी बिना किसी भय के केवल पर्यटकों की आवाजाही सामान्य होने से ही अपनी रोजी-रोटी फिर से चला सकेंगे। डल झील में कुछ शिकारों में लोग थोड़ा बहुत कश्मीरी सामान पर्यटकों को बेचने के लिए भी रखते हैं। यह भी आमदनी का अच्छा जरिया है। मनमोहक डल झील और उसमें खिले कमल के फूल पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण है।

कश्मीरी व्यापारी भी आशान्वित
अब तक बाहरी तो क्या कश्मीर के स्थानीय व्यापारी ही बेफिक्री से व्यापार नहीं कर पाते थे। ताजे बदलाव से स्थानीय व्यापारियों को भी उम्मीद बंघी है कि उनकी आय बढ़ेगी और कश्मीर का राजस्व भी। कश्मीरी सेब विक्रेता संघ के एक पदाधिकारी के अनुसार अब कश्मीर में आम हिन्दुस्तानियों को डर-डर के काम करने की जरूरत नहीं होगी। सरकार द्वारा कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले से कश्मीर के सेब किसानों का कारोबार काफी बढ़ जाएगा। कश्मीर में बिना किसी प्रतिबंध के आवाजाही से कश्मीर से बाहर के कारोबारियों में प्रतिस्पर्धा होगी और इसका फायदा कश्मीर के सेब कारोबारियों को होगा।
इसी प्रकार हैंडी क्राफ्ट्स (हथकरघा) उद्योग से जुड़े व्यापारियों का भी मानना है कि अब कश्मीर में शांतिपूर्ण स्थितियों में ट्रेड फेयर लगाया जा सकेगा। हैंडीक्राफ्ट्स का सामान और कालीन निर्यात में बढोत्तरी की संभावनाएं भी जगी हैं। जम्मू-कश्मीर की बसोहली पेंटिंग की भी देश-विदेश में अच्छी खासी मांग है। कश्मीरी सिल्क और कालीन की इसके खूबसूरत रंगों और बनावट की वजह से विश्व भर में खास पहचान है। गर्म कपड़ों, पेपर मैशी, कृषि आधारित उद्योग और सीमेंट उद्योग में भी कश्मीर में विकास की अपार संभावनाएं हैं।
कश्मीर के प्रसिद्ध कृषि उत्पाद हैं-सेब, नाशपति, चेरी, अखरोट, बादाम, केसर, स्ट्राबेरी और आलुबुखारा। क्षेत्र की 80 फीसदी आबादी कृषि व्यवसाय पर निर्भर है।
जम्मू- कश्मीर का दूसरा बड़़ा व्यवसाय है- हैंडीक्राफ्ट्स। पेपरमैशी, लकड़ी का काम, शॉल बनानाना, कालीन निर्माण और कशीदाकारी। इसमें कालीन निर्यात विदेशी मुद्रा विनिमय का सबसे अच्छा स्रोत है। इस उद्योग में करीब 3.40 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है, जिसके अब और विस्तार होने की संभावनाएं जगी हैं। कश्मीरी सिल्क की निर्यात में काफी मांग है। इसकी वजह है इसकी खास चमक। केंद्र शासित पदेश बनने के बाद कश्मीरी सिल्क उद्योग को बढावा दिया जाए तो देश के अन्य भागों में भी इसके खरीददार बढ सकते हैं।
फिलहाल प्रादेशिक प्रदर्शनियों में कश्मीरी उत्पाद दूसरे राज्य भेजे जाते रहे हैं। उम्मीद है अब जम्मू-कश्मीर में स्थनीय, अंतरराज्ययी, अंतर्देशीय और अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय को गति मिलेगी। यह प्रगति पथ की शुरूआत है। शुभ संकेत और समाचार है, तो...मुड़ के न देखो दिलबर...!!

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