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लेखा सेवा के मजे !!

- प्रेसवाणी डेस्क -
जो सरकारी सेवा पंजाब, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा कई अन्य राज्यों में खास अहमियत नहीं रखती है, वही राजस्थान में सबसे महत्वपूर्ण बना दी गई है। लेखा सेवा राजस्थान में इतनी अहम हो गई है कि यहां लेखाधिकारियों के सबसे ज्यादा पद स्वीकृत हैं। महज दो साल के भीतर इनके पद दुगने से भी ज्यादा कर दिए गए। यही नहीं, इस सेवा के शीर्ष कैडर को सवा पांच साल पूरा होते ही वो वेतनमान (7600ग्रेड-पे) दिया जाने लगा है, जो आईएएस जैसी शीर्ष केन्द्रीय सेवा के अधिकारियों को नौ साल पूरे होने पर दिए जाने का प्रावधान है।
राजस्थान लेखा सेवा के अधिकारियों का यह स्वर्णिम दौर तो तब है, जब इस राज्य की जनसंख्या तथा प्रशासनिक कामकाज का आकार कई राज्यों से कम है। आबादी के मामले में देश के सबसे बड़े राज्य—उत्तर प्रदेश तक में इतने लेखाधिकारी नहीं हैं, जितने राजस्थान में। वहां लेखा एवं वित्त सेवा के करीब 800 अधिकारियों का अमला विशाल शासन तंत्र का वित्तीय प्रबंधन संभाल रहा है, जबकि राजस्थान में 1371 लेखाधिकारियों की लंबी-चौड़ी फौज खड़ी कर दी गई है। जाहिर है इन पर काम का उतना दबाव नहीं है, जितना यूपी में है। फिर भी यह फौज काम के मामूली दबाव के बीच मलाईदार सुविधाओं के मजे ले रही है।
अमूमन किसी राज्य में प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, इंजीनियरिंग तथा चिकित्सा सेवा को महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि इनका सीधा जुड़ाव जनता एवं विकास कार्यों से रहता है। इसीलिए इन सेवाओं का सांगठनिक ढांचा, वेतनमान तथा प्रक्रिया समान रखे जाते हैं और इनके मसलों को प्रथामिकता से निपटाया जाता है। किंतु राजस्थान में उल्टी गंगा बह रही है। यहां शार्षस्थ प्रादेशिक सेवाओं में लेखा सेवा को न केवल शामिल किया गया है, बल्कि इसे बाकी सभी सेवाओं पर भारी बना दिया गया हैं। एक प्रकार से शार्षस्थ सेवाओं की सहायक भूमिका वाली लेखा सेवा के राजपत्रित अधिकारियों ने समस्त सेवाओं के शीर्ष कैडर को काफी पीछे छोड़ा हुआ है।
इस मामले का सबसे रोचक पहलू यह है कि वित्त विभाग पर ही सभी विभागों के पद सृजन में वित्तीय स्वीकृति जारी करने की जिम्मेवारी होती है। किंतु ये विभाग अन्य विभागों के पद प्रस्तावों पर तो अडंंगे लगाता रहता है और उसकी आड़ में लेखा सेवा के पद बढता चला जा रहा है।
वित्त विभाग के इस खेल की पुष्टि सरकारी पत्रावलियों तथा अधिसूचनाओं से होती है। वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री को दिए गए ज्ञापन के अनुसार उस समय राज्य में आऱएएस के 934 पद, आरपीएस के 641 पद तथा लेखा सेवा के 635 पद स्वीकृत थे। किंतु मात्र दो सालों में बाकी सेवाओं के उच्च कैडर पदों में तो मामूली बढोत्तरी हुई, जबकि वित्त (राजस्व) विभाग की दिनांक 10-5-2013 को जारी अधिसूचना के अनुसार लेखाधिकारियों के पद दुगने से भी ज्यादा (1357) कर दिए गए। 2017 तक इन्हें बढाकर 1371 कर दिया गया। वित्त विभाग की 2-5-2017 को जारी अधिसूचना में लेखा अधिकारियों के स्वीकृत पदों की यही संख्या बताई गई है।
सवाल यह उठता है कि उत्तर प्रदेश जैसे सर्वाधिक आबादी वाले राज्य में, जहां 75 जिले हैं और 621 आईएएस अधिकारियों का स्वीकृत कैडर है। वहां यदि लेखा सेवा के महज 800 अधिकारियों से काम चलाया जा रहा है तो केवल 32 जिलों तथा 313 स्वीकृत आईएएस कैडर वाले राजस्थान राज्य में 1371 लेखाधिकारियों की लंबी-चौड़ी फौज क्यों खड़ी की गई है? राज्य लेखा सेवा पर ऐसी मेहरबानी क्यों ? यह एक गहन जांच का विषय है। जिस प्रकार यहां वित्तीय प्रबंधन संभालने वाले राजपत्रित लेखा अधिकारियों को उपकृत करने के लिए नियम-कायदे ताक पर धरे जा रहे हैं, उससे लगता है कि समूचे शासन तंत्र में महाघोटाले का व्यवस्थित सिस्टम ही विकसित कर दिया गया है।
ऐसे में राज्य के विकास को गति कैसे मिलेगी? प्राथमिक सेवाओं को पीछे कर लेखा सेवा को गैरवाजिब महत्व दिए जाने पर राज्य सरकार को गौर करना चाहिए, वरना बात दूर तलक जा सकती है। वैसे एक रोचक घटनाक्रम हाल ही में सामने आया है। लेखा सेवा के शीर्ष कैडर ने खुद के स्वीकृत पदों पर आंच न आने देने के लिए कनिष्ठ सेवा वाले ऑडिट ब्यूरो को बंद कराने की फाइल चलाई है। अगर शीर्ष कैडर की ये कवायद फलित होती है तो सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। मतलब, गैरजरूरी पदों में कटौती के नाम पर ऑडिट ब्यूरो की बलि चढा दी जाएगी, इससे शीर्ष कैडर के स्वीकृत पदों में कटौती भी नहीं होगी। इस चाल को भी समझ कर राज्य सरकार को ऑडिट ब्यूरो के बारे में कोई निर्णय लोना चाहिए।

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