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निजी अस्पताल बना मिसाल

— अशोक बंसल —
देशभर में सरकारी और निजी अस्पतालों के संचालक कोरोना के मरीजों को आफत मान रहे हैं, लेकिन मथुरा के के.डी. मेडिकल कालेज से जुड़ा अस्पताल संकट के इस काल में लोगों के लिए वरदान साबित हो रहा है। शहर के जिला अस्पताल के अलावा स्थानीय प्रशासन ने दो अन्य मेडिकल कॉलेज अस्पतालों को कोविड सेंटर बनाया है। इनमें के.डी. अस्पताल तो पिछले डेढ़ माह से कोरोना के मरीजों के उपचार में जी जान से जुटा है, जबकि सोंख रोड स्थित दूसरे अस्पताल में कोरोना का एक भी मरीज आज तक भर्ती नहीं हुआ है। राहत और खुशी की बात यह है कि चिकित्सा की आधुनिक सुविधाओं से लैस के.डी. अस्पताल से कोरोना संक्रमण के ढाई दर्जन मरीज उपचार के बाद सकुशल घर वापस जा चुके हैं, जबकि आज इतने ही मरीज यहाँ भर्ती हैं। इन मरीजों में शहर के प्रसिद्ध वकील और मथुरा बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष महेश्वर नाथ चतुर्वेदी के अतिरिक्त इसी अस्पताल के वाइस चेयरमैन पंकज अग्रवाल भी शामिल हैं।
हैरत की बात यह है कि मथुरा जनपद में करीब सवा सौ निजी अस्पताल हैं। इनमें कॉर्पोरेट कल्चर वाला 200 बिस्तरों वाला एक अस्पताल भी शामिल है। ये सभी अस्पताल सामान्य दिनों में जटिल से जटिल रोगों के भरोसेमंद उपचार के विज्ञापन देते रहते हैं, लेकिन आज ये मानवता की सेवा से कन्नी काटे हुए हैं। इन अस्पतालों के मालिक चिकित्सकों को संक्रमण का भय सता रहा है। ऐसे में के.डी. मेडिकल अस्पताल के चिकित्सकों द्वारा की जा रही चिकित्सा सेवा को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है। इस अस्पताल के डाक्टर केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई गाइडलाइन्स पर अमल करते हुए न केवल पीपीई किट का इस्तेमाल कर रहे हैं, बल्कि यहां भर्ती मरीजों को भोजन, फल, चाय, बिस्किट और मिनरल पानी के साथ काढ़ा भी उपलब्ध कराया जा रहा है। कोरोना संक्रमण से ठीक हुए कई मरीजों को यदि वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ी, तो उसका उपयोग भी किया गया।
उल्लेखनीय है कि के.डी. अस्पताल में भर्ती मरीजों के इलाज का पूरा खर्च अस्पताल प्रशासन ही वहन कर रहा है। एक मरीज पर लगभग 2500 रुपए से 3000 रुपए प्रतिदिन खर्च हो रहा है। पीपीई किट, ग्लव्स और मास्क जिला प्रशासन ने उपलब्ध करवाए हैं। वर्तमान में करीब 35 पीपीई किट की दैनिक खपत हो रही है।
एक सप्ताह इस अस्पताल में भर्ती रहे कोरोना मरीज वकील महेश्वर नाथ चतुर्वेदी ने बताया कि उनके दोनों फेफड़ों में संक्रमण काफी फैल गया था और उनकी उम्र भी 65 वर्ष से अधिक है। जब तक अस्पताल में रहे मनोबल में कोई कमी नहीं आने दी। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद से महेश्वर नाथ अपने मित्रों से फोन पर बतियाते रहे और अस्पताल के चेयरमेन रामकिशोर अग्रवाल के गुणगान करते रहते हैं।
अस्पताल के चेयरमैन अग्रवाल ने बताया कि उनके मेडिकल कालेज में 125 से अधिक चिकित्सक हैं। अनेक ऐसे है जिनके पास देशभर के प्रतिष्ठित अस्पतालों में काम करने का अनुभव है। मानवीय आपदा के समय चिकित्सक को धरती पर भगवान माना जाता है। ऐसे में वह साधारण इंसान की तरह डर जाए या अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए, यह समाज के प्रति अन्याय होगा। के.डी. मेडिकल कालेज के चिकित्सक कोरोना वॉरियर बनकर मरीजों के इलाज में जुटे हैं। अस्पताल की प्रशासनिक जिम्मेदारियों को संभालने वाले समीर गौतम ने बताया चेयरमैन और एमडी स्वयं एक-एक चीज पर नजर रखे हुए हैं और सारी व्यवस्थाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर रहे है।
शहर के प्रसिद्ध एडवोकेट सुरेंद्र मोहन शर्मा ने कहा यह पहला अवसर है, जब मथुरा में एक निजी कालेज ने सार्वजनिक सेवा के लिए द्वार खोल दिए हैं।

पुत्र इलाज से बढाई विश्वसनीयता
राम किशोर अग्रवाल को अपने अस्पताल की चिकित्सीय व्यवस्थाओं पर इतना भरोसा है कि उन्होंने अपने पुत्र पंकज अग्रवाल को कोरोना संक्रमण से ग्रस्त होने पर अपने ही के.डी. मेडिकल कालेज में भर्ती कराया, न कि दिल्ली के किसी बड़े निजी नर्सिंग होम में। पंकज ग्रेटर नोएडा में ‘जी. एल. बजाज इंजीरियरिंग कालेज’ के चेयरमैन हैं। वह ग्रेटर नोएडा प्रवास के दौरान ही संक्रमित हुए थे। प्रारम्भ में पंकज दिल्ली के एम्स में भर्ती हुए, लेकिन वहां से उन्होंने मथुरा आकर के.डी. हॉस्पिटल में इलाज कराना बेहतर समझा।
राम किशोर अग्रवाल ने बताया कि यदि अस्पताल के संचालक स्वयं बीमार पडऩे पर अन्य स्थानों पर जाकर इलाज कराएं, यह बात अपने अस्पताल की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करती है। उन्होंने कहा, इस महामारी में धनवानों को आगे बढक़र पीडि़त मानवता की सेवा के प्रकल्प खोजने चाहिए। लक्ष्मी पुत्र होने का आशय स्वयं के लिए सुख सम्पत्ति जुटाना ही नहीं, बल्कि जरूरत के वक्त समाज के काम आना भी है। इसके अतिरिक्त, व्यक्ति जिस शहर में रहता है उस शहर का ऋण उस पर होता है। कोरोना जैसा काल धनपतियों और साधन सम्पन्नों की परीक्षा का भी काल है। मेरा संस्थान इस परीक्षा में कामयाब होगा, मुझे पूरा यकीन है।

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