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सडक़ों पर देश आखिर कब तक?

-प्रेसवाणी डेस्क -
कुछ समय पहले तक देश में एक नारा चल रहा था-‘मेरा देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है।’ परन्तु देश का मौजूदा माहौल आगे बढऩे वाला तो किसी भी दृष्टि से नहीं लग रहा। हर ओर आक्रोश, विरोध और आशंकाओं का कोहरा छाया है। सरकार का एक निर्णय जो सीधे जनता से जुड़ा है और उस पर पूरी तरह साफ स्थिति न होने की वजह से कहीं अफवाहों का दौर चल पड़ा है तो कहीं आशंकाओं के चलते छात्र विरोध प्रदर्शन पर उतर आए। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लागू होने के साथ ही एनसीआर को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई। नोटबंदी की तरह फिर कतार लगानी होगी। यह आकलन किया जाने लगा कि एनसीआर के लिए देशवासियों को पहचान संबंधी दस्तावेज दिखाने होंगे। विपक्षी दलों से लेकर शिक्षण संस्थानों तक में इस मामले पर राजनीति हो रही है। लोकप्रशासनिक प्रक्रिया संबंधी कानून को लेकर इस तरह का भ्रम फैलना न तो सरकार के लिए उचित है और न ही देश के नागरिकों के लिए। इस दिशा में अगला कदम जनजगरूकता अभियान चलाना होना चाहिए, ताकि बाहरी लोगों को नागरिकता के फेर में घिरे हमारे अपने नागरिक भय, संशय और आशंकाओं के साये से बाहर निकल सकें। हालांकि इन प्रदर्शनों के दो-तीन दिन बाद कुछ राज्यों में लोग सीएए तथा एनआरसी के समर्थन में भी सडक़ों पर उतरे। कई जगह लोग सीएए को सही ठहराते नजर आए। परन्तु इस सबके बीच आम जनता की दिनचर्या बे-पटरी हो चली है। किसी न किसी वजह से किसी न किसी प्रदेश में नेटबंदी हो जा रही है। हालांकि सरकार ने पूर्व में कई सराहनीय और साहसिक फैसले लिए लेकिन इस वर्ष के अंत तक देश फिर इस हालत में है कि नए साल का जश्न मनाने से पहले ही लोग बिना वजह की चिंताओं और अफवाहों में उलझ गए है। सत्ता पक्ष समझाइश में लगा है तो विपक्ष मुद्दे को भुनाने में। राजनीति से इतर भी कोई पक्ष होता है-जनता का पक्ष। इस पर सत्तासीन और विपक्षी दल दोनों को गौर करना होगा।

विरोध की शुरूआत पूर्वोत्तर से
असम में लोग सीएए के अस्तित्व में आने के बाद से सबसे ज्यादा गुस्से में हैं। असम के बाद दिल्ली-अलीगढ़ में इस कानून के खिलाफ आग भडक़ उठी। जामिया विश्वविद्यालय की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए। छात्रों का विरोध चिंताजनक है। उनमें बेरोजगारी को लेकर चिंता और नाराजगी पहले से ही है। इस नाराजगी ने सीएए के विरोध में उग्र रूप ले लिया है। हालांकि कुछ खबरें ऐसी आई कि विरोध करने वाले लोग छात्र नहीं थे। यह तथ्य गौर करने लायक है,क्योंकि छात्रों की आड़ में राजनीतिक उद्देश्य के लिए शैक्षणिक संस्थानों का दुरूपयोग होने से इनकार नहीं किया जा सकता। बेहतर हो कि शिक्षण संस्थानों को राजनीति से दूर ही रखा जाए अन्यथा देश की छवि खराब होगी।
सीएए का विरोध असम से निकल कर उत्तर प्रदेश होते हुए देश भर में फैल गया। नागरिकता संशोधन विधेयक को 10 दिसंबर को लोकसभा ने पारित किया। राज्य सभा में यह विधेयक 11 दिसंबर को पारित हुआ। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद 12 दिसंबर को यह विधेयक कानून बन गया। सबसे पहले इस कानून का विरोध पूर्वोत्तर राज्यों में शुरू हुआ।
असम में लोग इस कानून का विरोध कई वजहों से कर रहे हैं। इस कानून में तीन पड़ोसी देशों-बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से हिंदू सहित छह धर्मों के उन लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है, जो 31 दिसंबर 2014 तक भारत आ गए थे। बांग्लादेश से बड़ी संख्या में हिंदू असम में घुसपैठ करते रहे हैं। इनकी संख्या लाखों में है। असम के लोग नहीं चाहते कि बांग्लादेश से आए हिंदू भारत के नागरिक बनें। उनका मानना है कि इससे उनकी (असम के लोगों) अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी। उन्हें यह भी डर है कि उनके लिए रोजगार के मौके घट जाएंगे। यही नहीं उन्हें अपनी असमी भाषा के भी गौण हो जाने का डर सता रहा है। इसकी वजह यह है कि बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थी बांग्ला बोलते हैं। इसके चलते असम में बांग्ला का प्रभुत्व हो जाएगा और असमी दोयम दर्जे की भाषा बन जाएगी। पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में इनर लाइन परमिट लागू है, वहां यह कानून लागू नहीं होगा। असम के लोगों खासकर उत्तरी असम के लोगों को डर है कि इनर लाइन परमिट के चलते हिंदू शरणार्थी भारतीय नागरिक बनने के लिए असम में घुसपैठ करेंगे।

मुस्लिम नागरिकों के खिलाफ नहीं ये कानून
एक समस्या और है कि इस कानून से देश के मुसलमानों में कहीं न कहीं यह गलतफहमी फैल रही है कि अब शायद उन्हें देश से निकाल दिया जाए। विरोध की तीव्रता और उससे होने वाले नुकसान को भंापते हुए प्रधानमंत्री और भाजपा नेता अपील कर रहे हैं कि सीएए भारतीय मुसलमानों के खिलाफ नहीं है।
दिल्ली, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, लखनऊ व इलाहाबाद में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध की वजह यह है कि इसे मुस्लिमों के खिलाफ माना जा रहा है। लोगों में डर है कि इस कानून के चलते उनकी नागरिकता खतरे में पड़ जाएगी। कांग्रेस सहित कुछ प्रमुख विपक्षी दल इस कानून के खिलाफ हैं। इससे कानून के विरोध को हवा मिल रही है। इसीलिए अब सत्ताधरी दल के नेता विरोध के खिलाफ सीएए के समर्थन में रैलियां निकाल रहे हैं।
पहली बार एक ही मुद्दे पर देश मोटे तौर पर दो विचारधराओं में बंटा नजर आ रहा है। सबका विश्वास का नारा देने वाली सरकार के प्रति जनता में अचानक अविश्वास की भावना पैदा हो गई है। जनता के बीच मुद्दे पर बातचीत होती है, कुछ अफवाहें फैलती हैं और विरोध की चिंगारी देश के कोने-कोने तक सुलग उठती है। यह आग राजनेताओं और राजनीतिक दलों के लिए भले ही राजनीतिक रोटियां सेकने वाली हो लेकिन इससे जनहानि ही हो रही है। इसकी एवज में मुआवजे की घोषणा भी हास्यास्पद लगती हैं। कब तक और कितनी बार जनता यूं ही ठगी जाती रहेगी?

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