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किसान समझे जैविक खेती का महत्व

- आभा शर्मा -
माही नदी के खूबसूरत टापुओं और दोमट मिट्टी के किरमिची पहाड़़ों से घिरा, तालाबों में तैरते सुन्दर कमल और परिंदों की रौनक से गुलजार जिला है बाँसवाड़ा। बांस के पेड़ों की अधिकता के कारण ही संभवत: इस स्थान का यह नाम पड़ा होगा। राजस्थान के आदिवासी जिलों में से एक इस जिले को वागड़ के नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय लोग आपसी संवाद के लिए वागड़ी बोली ही बोलते हैं।
यहां अधिकतर भील, भीलमीणा, डामोर, निनामा आदि आदिवासी जातियां निवास करती हैं जिनका गुजारा खेती से होता है, पर ये अधिकतर छोटे और मझोले किसान हैं। इनमें से बहुत से परिवार जब अपने गुजारे लायक उपज भी नहीं कर पाते तो रोजगार की तलाश में पङ़ोसी राज्यों में चले जाते है।

खेती हुई महंगी
स्थानीय निवासियों का कहना है कि आजकल खेती बहुत महंगी हो गई है। क्योंकि खाद, बीज, कीटनाशक या अन्य कोई भी समाज हो, सबके लिए पहले पैसे चाहिए। पारंपरिक खेती और जीवनशैली में ऐसा नहीं था। तब खेती में इतनी लागत नहीं आती थी। पशुपालन और खेती दोनों एक दूसरे के पूरक थे। अब सवाल यह है कि फिर से अपनी जङ़ों की तरफ कैसे लौटा जाए। जैविक खेती एक अच्छा विकल्प है और आजकल इसके बारे में काफी जागरूकता भी बढ़ी है। पर उसमें भी बाजार से जुडऩे के साथ-साथ प्रामाणिकता कैसे हासिल करें यह जानना जरूरी है।
छोटे और मझोले किसानों को जैविक खेती से फिर से जोडऩे के लिए कुछ संस्थाएं उन्हें प्रोत्साहित कर रही हैं। इनमें से एक है वाग्धरा (वोलंटरी एसोसिएशन ऑफ एग्रीकल्चर जनरल डेवलपमेंट हेल्थ एंड रिकंस्ट्रकशन अलायन्स) जो दक्षिणी राजस्थान और पड़ोसी राज्य गुजरात तथा मध्य प्रदेश के नजदीकी आदिवासी क्षेत्रों में कार्यरत हंै। नॉट फॉर प्रॉफिट संस्था के रूप में पंजीकृत यह संस्था विगत तीन दशक से आदिवासी किसानों के साथ काम कर रही है।
संस्था के सचिव जयेश जोशी कहते हैं ‘यदि आप बाहरी समाधान ढूँढने की कोशिश करते रहेंगे तो आपकी समस्याएं जस की तस रहेंगी। आपके पास जो कुछ है, पहले उसे तो पहचानिए।’ जल, जंगल, जमीन, जानवर और बीज, ये पांच चीजें बहुत महत्वपूर्ण हैं, पर आज यह सभी व्यापार का हिस्सा हैं। सरकारी नीतियां ऐसी होनी चाहिए कि इनका व्यापार नहीं हो। इस इलाके में मक्का, मूंग, काला उड़द, वटला, रागी आदि फसलें होती हैं। स्थानीय लोग मक्का उगाना अधिक पसंद करते हैं क्योंकि साल में मक्का की तीन फसलें हो जाती हैं। यहां की जलवायु गेहूँ के लिए मुफीद नहीं है।

ऑर्गेनिक गाँव
उक्त संस्था के प्रयासों से सज्जनगढ़ ब्लॉक के जालिमपुरा गांव ने जैविक खेती को करीब-करीब पूरा अपना लिया है। मानसिंह गरासिया जैविक खेती अपनाने से बहुत खुश हैं। बारह सौ की आबादी वाले इस गांव में सभी लोग जैविक खेती से जुड़े हैं। कुशलगढ, सज्जनगढ, डांगरतलाई, आनंदपुरी और घाटोल ब्लॉक के 45 गांवों के किसान भी पूरे तौर पर जैविक खेती से जुड़े हैं। महिलाएं भी इस मुहिम में पीछे नहीं हैं। वे लोग नीम और आक मिला कर दस परणी कीटनाशक बनाती हैं। अनिता और करमा डामोर गाँव-गाँव जाकर जैविक खेती, वरमी कम्पोस्ट और दस परणी खाद के बारे में जाानकारी देती हैं। आमलीपाङा की बुजुर्ग अन्ना भी जैविक खेती करती हैं और अपनी बाड़ी से बहुत खुश हैं।

प्रमाणीकरण
किसानों को एक विश्वसनीय गारंटी प्रणाली की जरूरत होती है जिसे स्थानीय समुदाय, भौगोलिक क्षेत्रों और बाजारों की जरूरत के लिए काम में लिया जा सके। बिना प्रमाणीकरण के किसानों के लिए यह मुमकिन नहीं कि वे बाजार में अपनी साख बना सकें या अपने उत्पादों का उचित दाम पा सकें।
वाग्धरा आदिवासी बांसवाड़ा, डूंगरपुर सहित निकटवर्ती मध्यप्रदेश और गुजरात के करीब एक हजार गाँवों में काम कर रही है।
भूमिका
भूमिका लघु एवं सीमांत किसानों का अपना जैविक अभियान है। यह किसान द्वारा उपजाए जाने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता एवं जैविक होने की प्रतिभूति करता है। इसमें मिट्टी को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी प्रकार के खतरनाक रासायनिक उर्वरक और हानिकारक कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया गया है। इसकी शुरुआत जर्मनी की वेलटहंगरहिल्फ संस्था और वागधरा से हुई।
आदिवासी कृषि क्षेत्र की कई समस्याएँ हैं और चुनौतियां भी जिनका मुकाबला वाग्धरा जैसी संस्था अकेले नहीं कर सकती। जब ऐसी फसलों को बढ़ावा दिया जाता है, जो उस मिट्टी के लिए मुफीद नहीं हैं तो दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं निकलते, जैसे उदाहरण के लिए सोयाबीन जिसे बहुत पानी चाहिए, खाद चाहिए तो खाद-बीज सब बाजार से खरीदकर लाइए।
ट्रेक्टर फार्मिंग को बढ़ावा देने के लिए ट्रेक्टर से खेती हो रही है और पशुओं की भूमिका खत्म हो गई है।
वागङ के किसानों को आशा है कि नई भूमिका उनके लिए सफलता के नए द्वार खोलेगी।

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