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मो सम कौन कुटिल...

- डॉ. ओंकारनाथ चतुर्वेदी -
पने आराध्य के सामने खड़े होने की पहली शर्त है-यह आत्म स्वीकारोक्ति -‘मो सम कौन कुटिल...’ आज लोकतंत्र का मंदिर -ऐसे ही खल, कामी व दिखावटी भक्तों से भर चला है, जो जन सेवा के नाम पर वोट मांगते हैं और विजयी हो जाने पर उसी जनता को छलते हैं जो सत्ता प्राप्ति का साधन बनी। आज जन प्रतिनिधि जनता का विश्वास खेा बैठे हेैं। संसद सदस्य हों या विधान सभा सदस्य सभी अपने नीड़ संवारने में व्यस्त हो जाते हैं। उन्हें लगता है अपने बंगले बनवाने, सरकारी बंगलों को न्यूनतम दर पर कबाडऩे,जमीनें दबाने या-बिल्डर के साझीदार बनने से ही उनका जीवन धन्य है और इसी सारी उधेड़-बुन के बीच उनका कार्यकाल समाप्त हो जाता है। फिर वही मंगतूराम ्रधनी राम बन कर द्वार-द्वार आकर गाने लगते हैं- ‘भिक्षा / वोट दे दे रानी...’भोगी खड़ा है तेरे द्वार। और ऐसे खल कामी -लोकतंत्र की बारात के बाराती हंंैं,जो सता प्राप्ति के मेजिक नम्बर को पाने के लिए जुमलों व हवाई नारों को आसमान में उछालते हेंै ताकि जनता को लगे -कि यही उनकी स्वर्ग यात्रा का प्रस्थान बिन्दु हेै, पर बेचारी जनता नरक के गडडे में पड़ी छटपटाती रहती हेै। बच्चे बोरिंग के गहरे गड्डे में गिरते रहते हैं। संैकड़ों निरीह लोग नकली शराब पीकर मर जाते हैं। नव वधुओं को विवाह मंडप में गोली मार दी जाती हेै। छोटी -छोटी बच्चियों का अपरहरण, बलात्कार और हत्या होती रहती है।
लोकतंत्र के प्रहरियों के बेटे जेब में पिस्तौल डाले दुर्योधन -दुशासन बने घूम रहे हैं। लगता है धृतराष्ट्र का प्रेत फिर जाग उठा है। संसद सदस्य विधान सभा के सदस्य को सरे आम जूते से पीट रहा है। नकली शराब की भट्टियां चल रही हैं। रंगदारी का बाजार गरम हो चला है। नारी निकेतन के नाम पर फर्जी एनजीओ वैश्यालय चला रहे हैं। ‘धृतराष्ट्र’ मौन हेै। जिन संन्यासियों को काम-क्रोध, मद, लोभ व मोह से दूर रहना था, वो ही सता के मठों के महन्त बने घूम रहे हैं। साधु संत अब राजनेता बन चले हैं। लोकतंत्र में वैराग्य, भगवा वस्त्र-अपना अर्थ ही खो चले हेैं। साधु -संन्यासी अब मंजन, आटा, तेल, दाल और बेसन बेच रहे हैं। किसी को भी जीवन मूल्यों की, नैतिक मूल्यों की चिन्ता ही नहीं है। आज हर दुर्योधन बेकसूर है और हर युधिष्टिर -अज्ञातवास पर। प्रतिभा का सम्मान धूल धूसरित हो रहा है। नोन मिडिल क्लास सता मंदिर के वरिष्ठ पुजारी हैं। ‘ठोको-ठोको ताली’ लोकतंत्र की यात्रा जारी है। बेबस दर्शक मुग्ध है। उसकी आंखों के सामने ‘जुमलों की खेती’ लहरा रही है। सता के लिए मंगतराम के हिरण भाग रहे हेैं। भागते भूत की लंगोटी जो भी पकड़ ले वो सता मंदिर तक पहुंच ही जाएगा। सता मंदिर का यह पुजारी चाहे कोई भी हो, अपने कार्यकाल के स्मृति स्मारक की तलाश में भटक रहे हैं-बंगले के रूप में। लो, फिर चुनाव सिर पर आ गए। आचार संहिता लग गई है। उद्घाटन की पट्टशिलाएं मुंह ढंके स्मृति चिन्ह बन चली हैं। सभी राजनीतिक दल मुद्दों की तलाश मे भटकते फिर रहे हैं। कोई लैपटॉप बांट रहा है तो कोई सोने की चैन, कोई टेलिविजन बांट रहा है तो कोई वोट खरीदने के लिए बैंक खाते में ही सीधे रिश्वत भेज रहा है। अपने काम बनाने के लिए जनता के बीच घूसखोरी के संस्कार बोए जा रहे हैं। एक अकर्मण्य, नाकारा पीढ़ी गढ़ी जा रही है, जो पाव भर पूड़ी और आलू के साग पर लाभार्थी भीड़ बन जाती है। नोट तो ले लेती है, पर वोट नहीं देती। अब करोड़पतियों की फसल लहलहाने लगी है। जन प्रतिनिधि को नहीं, जाति प्रतिनिधि और करोड़पतियों को चुनाव में टिकट मिलता है। यदि आप करोड़पति हैं, किसी जाति बहुल क्षेत्र के हैं तो चुनावी टिकट आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। भले ही आप आपराधिक क्षेत्र के नामी सरदार हों, गैर सजा-याफ्ता सदस्य हों, पर अगर आपके गले में चुनाव जीतने की क्षमता वाला टैग लटका हो तो पार्टी हाईकमान आपके गले में माला डाल देगा। जाति भी तो ‘लोक’ है। इसीलिए हम इसे लोकतंत्र कहते हैं, जिसमें तीस प्रतिशत लोग तो वोट डालने ही नहीं निकलते। लिहाजा सत्तर प्रतिशत में सत्ता की दाल बांटी जाती है।
सत्ता मोहिनी स्वरूप है और देवासुर संग्राम की तैयारी चल रही है। कुछ दिन बाद सत्ता का अमृत बंटेगा। जो जीतेगा, पांच साल तक सत्ता का रसास्वादन करेगा। चुनाव आयोग ने होली से पूर्व आम चुनाव की घोषणा कर फागोत्सव की तैयारियां कर ली हैं। देखें किस रंग में रंगा सत्ता भक्त कुर्सी तक पहुंच यह स्वीकार करने का दम भरेगा...‘मो सम कौन कुटिल खल कामी!

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