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सरकार सबसे बड़ी मुकदमेबाज

- अजय चतुर्वेदी -
भारत की अदालतों में सबसे ज्यादा मुकदमे सरकारी विभागों के हैं। इसीलिए सरकार को सबसे बड़ी मुकदमेबाज कहा गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2016 तक सर्वोच्च न्यायालय में 60,750, उच्च न्यायालयों में 40 लाख तथा जिला और अधीनस्थ अदालतों में 2 करोड़ 74 लाख मामले विचाराधीन थे। करीब 46 प्रतिशत लंबित अदालती मामले केवल सरकारी विभागों से संबंधित थे। एक जानकारी में बताया गया कि केवल चार दिन में ही (जून 9 से 12, 2017 तक) सरकारी मुकदमों की संख्या में दो हजार से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। आठ जून को इन मुकदमों की संख्या 1,33,059 थी जो बारह जून को 1,35,060 हो गई।
रेलवे के सबसे ज्यादा मुकदमे
भारतीय रेलवे के सबसे ज्यादा 66,685 मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हंै। इनमें से 10,464 मामले तो दस साल से अधिक सालों से विचाराधीन हैं। सबसे कम केवल तीन पंचायती राज मंत्रालय के विचाराधीन हंै। सरकार के टाप 10 मुकदमे वाले विभागों में रेलवे के बाद दूसरे नंबर पर वित्त मंत्रालय है, जिसके 15,646 मामले लंबित हैं। संचार मंत्रालय के 12,621, गृह मंत्रालय के 11,500, रक्षा मंत्रालय के 3433, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के 3275, शहरी विकास के 2306,श्रम तथा रोजगार मंत्रालय के 1774, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के 1714, तथा कामर्स एंड इंडस्ट्री मंत्रालय के 1430 मामले अदालतों में लंबित हंै।
कैसे कम हो मुकदमों की संख्या?
कई कदम उठाने के बावजूद सरकारी मुकदमों की संख्या में कमी न आना वास्तव में सरकार के लिए चिंता का विषय है। हालांकि विचाराधीन मामलों में कमी लाने के लिए कुछ कदम उठाए गए हैं जैसे हर विभाग में नोडल अधिकारी की नियुक्ति, मामलों के शीघ्र निराकरण के लिए वैकल्पिक तरीकों को अपनाना, गैर जरूरी मामलों में अपील दायर करने से बचना, मध्यस्थ द्वारा मामले का निराकरण तथा बिना मतलब के मुकदमों को वापस लेना। सरकार ने मामलों को निपटाने में आन लाइन समाधान के प्रयास भी शुरू किए हैं और इनके नतीजे भी बेहतर आ रहे हैं।
मुकदमों की संख्या बढऩे की वजह क्या है?
अक्सर यह देखा गया है कि नियमों की कथित अवहेलना के कारण पीडि़त पक्ष न्याय पाने के लिए अदालत की शरण में चला जाता है। अदालतों ने भी कई मामलों में टिप्पणी भी की है कि विभागाध्यक्ष ने मनमाने आदेश जारी किए। सरकार अपने स्तर पर ही मामले का निपटारा कर सकती थी। कुछ सेवाओं को छोडक़र अन्य सेवाओं के अफसरों और कर्मचारियों की यह शिकायत रहती है कि सब कुछ ठीक होने के बावजूद उन्हें समय पर भी पदोन्नति नहीं दी जाती। कोई न कोई बहाना बना कर मामले को बेवजह लटकाए रखा जाता है जिसके कारण कई लोग बिना पदोन्नति पाए रिटायर हो जाते हैं और उन्हें आर्थिक नुकसान भी होता है। हाल ही एक ऐसा मामला दिल्ली में सामने आया, जिसमें केंद्रीय सचिवालय सेवा के करीब सौ अधिकारियों की विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक बुलाई, लेकिन बैठक यह कहकर समाप्त कर दी गई कि कोई भी अधिकारी पदोन्नति के योग्य नहीं है। जब सभी अधिकारी अयोग्य थे तब बैठक क्यों आयोजित की गई? सरकार के खिलाफ बढ़ते मुकदमों की संख्या के पीछे सबसे बड़ा कारण यही है कि अदालतों की टिप्पणी के बावजूद कथित दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती। सूत्रों के मुताबिक मनमानी के कारण ही मुकदमों की संख्या और उस पर अने वाला खर्च बेतहाशा बढ़ता जा रहा है। मुकदमों की संख्या कम करने की दिशा में उठाए गए सरकारी कदम ऊंट के मुंह में जीरा हंै। जरूरी है कि मनमानी करने वाले अधिकारियों की नकेल कसी जाए।

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एक्सक्लूसिव इंटरव्यू
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