press-vani
  • press-vani
  • press-vani
  • press-vani
मंदी के दौर में अर्थशास्त्र पर शास्त्रार्थ

इन दिनों दुनिया भर में अर्थशास्त्र को लेकर शास्त्रार्थ चल रहा है। आईएमएफ से लेकर विश्व बैंक और भारतीय रिजर्व बैंक तक अपनी-अपनी तरह से आर्थिक सुस्ती पर चिंता जता रहे हैं। यहां गौर करने वाली बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की पॉलिसी रिपोर्ट में भी कहा गया है कि दुनिया भर में आई सुस्ती और व्यापारिक टकराव जैसे कारणों से मंदी होती अर्थव्यवस्था का असर भारत में भी दिखाई दे रहा है। सबसे पहले ये समझना ज़रूरी है कि ये जो हालात हैं वो ऐसे नहीं हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था अब पूरी तरह गिरने लगी है बल्कि इसके बढऩे की रफ़्तार कम हुई है। पहले जहां हम कऱीब साढ़े छह या सात फीसदी पर बढ़ रहे थे, वहीं अब हम घटकर पाँच फीसदी या उसके आसपास पर बढ़ रहे हैं। अक्टूबर 2019 की रिपोर्ट में रिजर्व बैंक ने कहा है कि घरेलू चुनौतियों के कारण भी आर्थिक गतिविधियां सिकुड़ गई हैं। आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था विषम चुनौतियों का सामना करने वाली है। रोजगार वाले सेक्टर माने जाते हैं ऑटोमोबिल और रीयल एस्टेट। इन दोनों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है। औद्योगिक गतिविधियों की रफ्तार थम गई है। बैंकों से वाणिज्यिक क्षेत्र में जाने वाला फंड काफी घट गया है। कुल मिलाकर हर ओर सुस्ती का माहौल है। ऐसे में, एक बात समझ से परे है कि बड़े स्तर पर आयोजन और कुछ लोगों द्वारा महँगी गाडिय़ों की खरीद जैसे खर्चों में कमी क्यों दिखाई नहीं दे रही। इसका एक उदाहरण है-नवरात्रि पर बड़ी संख्या में गाडिय़ां खरीदी गई। एक ओर नवरात्रि के दौरान 200 मर्सिडीज कार बिकने की खबर आती है तो दूसरी ओरटाटा और मारुति द्वारा उत्पादन घटाने की बातें सामने आई हैं।
गिरावट तो सब ओर है। आंकड़े बताते हैं- वाणिज्यिक गाडिय़ों की बिक्री में 62.11 प्रतिशत की गिरावट आई है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र की विकास दर माइनस 23 प्रतिशत है। स्कूटर बिक्री में गत वर्ष के मुकाबले 16.60 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। मोटरसाइकिल की बिक्री में 23.29 प्रतिशत की गिरावट देखी गई।
हाल ही आईएमएफ ने भारत की आर्थिक स्थिति पर चिंता जताई थी और विश्व बैंक ने भी चालू वित्त वर्ष में भारत की विकास दर कम रहने का अनुमान लगाया है। इस वर्ष अर्थशास्त्र के लिए नोबल पुरस्कार जीतने वाले अभिजीत बनर्जी ने भी कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खराब है। बनर्जी के अनुसार भारत में लोग खर्च में कटौती कर रहे हैं और यह गिरावट जिस तरह से जारी है उससे लगता है कि इस पर काबू नहीं पाया जा सकता। उनका कहना था, ‘जहां तक मैं समझता हूं भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत बहुत ही खराब है। एनएसएस का डेटा देखें तो पता चलता है कि 2014-15 और 2017-18 के बीच शहरी और ग्रामीण भारत के लोगों ने अपने उपभोग में भारी कटौती की है। सालों बाद ऐसा पहली बार हुआ है। यह संकट की शुरुआत है।’
आंकड़ों पर संशय: अभिजीत बनर्जी ने भारत में आंकड़े इकट्टा करने के तरीके में हुए विवादित बदलाव का भी जिक्र किया। हाल ही आरोप लगे हैं कि भारत सरकार विकास दर और राजस्व घाटे के जो आंकड़े दिखाती है वह असल नहीं है। ऐसा आरोप मोदी सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम भी लगा चुके हैं।अभिजीत बनर्जी ने भी कहा कि सरकार के आंकड़ों पर कई तरह के संदेह हैं। अभिजीत बनर्जी फिलहाल अमरीका के मशहूर संस्थान मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में पढ़ाते हैं।
विश्व बैंक के मुताबिक भारत में जीएसटी, नोटबंदी और बढ़ती बेरोजगारी दर ने गरीब परिवारों की समस्याएं बढ़ा दी हैं। आर्थिक मंदी के हालात के बीच भारत को विश्व बैंक से झटका लगा है। संस्था ने अब चालू वित्त वर्ष में भारत की विकास दर का अनुमान घटा दिया है। विश्व बैंक ने इसे छह फ़ीसदी कर दिया है। इससे पहले अप्रैल में उसने इसे 7.5 प्रतिशत बताया था। हालांकि, दक्षिण एशिया आर्थिक फोकस के ताजा संस्करण में विश्व बैंक ने यह भी कहा कि मुद्रास्फीति अनुकूल है और यदि मौद्रिक रुख नरम बना रहा तो वृद्धि दर धीरे-धीरे सुधर कर 2020-21 में 6.9 फीसदी और 2021-22 में 7.2 फीसदी हो जाने का अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की संयुक्त वार्षिक बैठक से पहले जारी इस रिपोर्ट में लगातार दूसरे साल भारत की आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट का अनुमान व्यक्त किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019-20 की पहली तिमाही में मांग के मामले में निजी खपत में गिरावट और उद्योग एवं सेवा दोनों में वृद्धि कमजोर होने से अर्थव्यवस्था में सुस्ती रही। 2018-19 में चालू खाता घाटा बढक़र सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2.1 प्रतिशत हो गया। एक साल पहले यह 1.8 प्रतिशत रहा था। इससे बिगड़ते व्यापार संतुलन का पता चलता है। भारत में गरीबी में कमी जारी है, लेकिन अब इसकी रफ्तार सुस्त हो गई है। आरबीआई के गवर्नर रहे रघुराम राजन ने भारत में जीडीपी की गणना के तरीके पर भी नए सिरे से गौर करने का सुझाव दिया है। राजन ने अर्थव्यवस्था में इस समय दिख रहे धीमेपन को ‘बेहद चिंताजनक’ करार देते हुए कहा कि सरकार को ऊर्जा एवं गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्रों की समस्याओं को तत्काल सुलझाना चाहिए। उन्होंने कहा कि निजी निवेश प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को नए कदम उठाने चाहिए। साल 2013-16 के बीच गवर्नर रहे राजन ने भारत में जीडीपी की गणना के तरीके पर नए सिरे से गौर करने का भी सुझाव दिया है। इस संदर्भ में उन्होंने भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम के शोध निबंध का हवाला दिया, जिसमें निष्कर्ष निकाला गया है कि देश की आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ा चढ़ाकर आंका गया है। उन्होंने कहा ‘निजी क्षेत्र के विश्लेषकों की ओर से आर्थिक वृद्धि को लेकर कई तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं, जिनमें से कई संभवत: सरकार के अनुमान से काफी नीचे है। आर्थिक सुस्ती निश्चित रूप से बहुत चिंताजनक है।’ गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2018-19 में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार 6.8 प्रतिशत पर रह गई, जो 2014-15 के बाद से सबसे कम रहा। विभिन्न निजी विशेषज्ञों और केंद्रीय बैंक का अनुमान है कि इस साल जीडीपी वृद्धि सात प्रतिशत के सरकारी अनुमान से कम रहेगी।
राजन ने कहा कंपनियां चिंतित हैं। पूर्व गवर्नर ने कहा कि अर्थव्यवस्था एवं वृद्धि दर को गति देने के लिए नए सुधारों की जरूरत है। उन्होंने कहा अंतरराष्ट्रीय बाजार से कर्ज लेना सुधार नहीं है बल्कि एक कार्रवाई भर है। हमें असल में यह समझने की जरूरत है कि हम किस प्रकार दो या तीन प्रतिशत अधिक वृद्धि हासिल कर सकते हैं। उन्होंने ऊर्जा एवं गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र को लेकर तत्काल कदम उठाने की वकालत की। राजन ने कहा कि निजी क्षेत्र को निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के लिए नए सुधार लागू किए जाने चाहिए। राजन के अनुसार बहुसंख्यकवाद और अधिनायकवाद भारत को आर्थिक ढलान वाले रास्ते पर ले जा रहा है। राजन ने संस्थाओं को कमजोर करने का भी आरोप लगाया है।
पूर्व आरबीआई गवर्नर ने कहा कि सरकार की आर्थिक नीतियां टिकाऊ नही हैं और इसकी लोकलुभावन नीतियां भारत को लैटिन अमेरिका के रास्ते ले जा सकती हैं। रघुराम राजन ने देश के राजकोषीय घाटे को लेकर गहरी चिंता हुए कहा कि बढ़ता राजकोषीय घाटा एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को एक बेहद ‘चिंताजनक’ अवस्था की ओर धकेल रहा है। उन्होंने कहा, ‘पिछले कई साल तक अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में पर सुस्ती आई है। साल 2016 की पहली तिमाही में विकास दर 9 प्रतिशत रही थी, वह अब घटकर 5.3 फीसदी पर आ गई है।’ रघुराम राजन ने कहा कि आर्थिक दृष्टिकोण की कमी की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही है।

विश्व की 90 फीसदी अर्थव्यवस्थाएं ढलान पर-आईएमएफ
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जियॉरजीवा की मानें तो इस वक्त दुनिया की 90 फीसदी अर्थव्यवस्थाएं ढलान पर हैं। 2019-20 में आर्थिक विकास दर पिछले दस साल में सबसे कम होगी। अमरीका और जर्मनी जैसे देशों में बेरोजगारी ऐतिहासिक रूप से कम है, लेकिन वहां भी आर्थिक गतिविधियां नरम पड़ती जा रही हैं। वैश्विक कारोबार रुक सा गया है। भारत और ब्राजील जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्था पर मंदी का असर होने वाला है। 2018-19 के अप्रैल से मध्य सितंबर तक फंड फ्लो 7 लाख 36 हजार 87 करोड़ रूपए था, जो 2019 के अप्रैल से मध्य सितंबर तक मात्र 90,995 करोड़ ही हुआ है। यानी 88 प्रतिशत की कमी आती है। फंड फ्लो में सिर्फ लोन ही नहीं होता बल्कि विदेशी निवेश वगैरह कई घटक शामिल होते हैं। हर रिपोर्ट में मांग में कमी की बात हो रही है। मांग कम इसलिए है कि लोगों के पास नौकरी नहीं है। नौकरी है तो सैलरी नहीं बन रही है। हालांकि सरकार ने कर्मचारियों का महंगाई भत्ता बढऋाने की बात कही है। पेंशनधारियों को भी इसका लाभ मिलेगा। रिजर्व बैंक की मॉनिटरी पॉलिसी रिपोर्ट में वैश्विक संकट को बड़ा कारण बताया गया है। रिजर्व बैंक ने 2019-20 के लिए जीडीपी की दर घटा दी है।
ग्लोबल कंपटिटिवनेस इंडेक्स में भारत का स्थान 10 पायदान नीचे खिसक गया है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं भारत से अच्छी हो गई हैं। पहले अमेरिका नंबर वन पर था, मगर अब सिंगापुर उसकी जगह पर आ गया है। भारत का स्थान 58 था जो अब 68 पर आ गया है। कोलंबिया, दक्षिण अफ्रीका और टर्की जैसे देशों ने अपनी स्थिति भारत से बेहतर कर ली है। इसी सूचकांक में कॉरपोरेट गवर्नेंस के मामले में भारत का स्थान 15 वां हैं यानी अच्छा है। एशियन डेवलपमेंट बैंक की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक बाजार में धीमेपन के बाद भी बांग्लादेश ने ये ग्रोथ हासिल किया है और आगे भी करने की उम्मीद है। गारमेंट सेक्टर में बांग्लादेश ने काफी बढ़त ले ली है। उसके निर्यात में 84 प्रतिशत हिस्सा इसी सेक्टर से आता है। भारत में गारमेंट सेंक्टर की हालत खराब है।

मंदी का असर आम जनता की बचत पर
आर्थिक मोर्चे पर भारत के लिए बुरी ख़बरों के आने का सिलसिला थम नहीं रहा।चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में विकास वृद्धि पाँच प्रतिशत पहुंचने और ऑटो सेक्टर में भारी सुस्ती के बाद सरकार ने कुछ उपायों की घोषणा की है। सरकार का कहना है कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती है और इससे उबरने के लिए तमाम उपाय किए जा रहे हैं, जबकि कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अर्थव्यवस्था में मंदी आ चुकी है, विकास दर नकारात्मक हो चुकी है लेकिन सरकार और कई अर्थशास्त्री इसे अर्थव्यवस्था की सुस्ती ही मान रहे हैं। पंजाब एवं महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड पर जिस तरह आरबीआई ने लेन देन पर अंकुश लगाया इसके बाद से ही बैंक के ग्राहक हैरान परेशान हैं।

बैंकों में पैसा कितना सुरक्षित?
दो दिन पहले एचडीएफ़सी बैंक के चेयरमैन दीपक पारेख ने कहा कि सिस्टम में आम आदमी की बचत की सुरक्षा के कोई उपाय नहींं हैं। बैंकों के लगातार बढ़ते एनपीए और सरकार की ओर से एनपीए माफ़ करने से बैंकों पर दबाव बढ़ गया है। ऐसे में आम आदमी बैंकों में अपनी जमा बचत को लेकर थोड़ा चिंतित है। यह कोई नई बात नहीं। ऐसा पहले भी हुआ है। जनवरी में जब रोजग़ार के आंकड़ों की रिपोर्ट आई थी तब सरकार ने चुनाव के कारण उसे नहीं माना था।
कंपनियों के लिए अर्थशास्त्री सबसे अहम आंकड़ों पर नजऱ रखते हैं। ये जीडीपी का कऱीब 38 फीसदी हिस्सा है। आंकड़ों के इस संकलन में पेट्रोलियम, इलेक्ट्रिसिटी और माइनिंग आदि क्षेत्र शामिल होते हैं, वो उत्पाद कंपनियां जिनकी खपत करती हैं। हर महीने इसका आंकड़ा आता है और उससे यह साफ़ ज़ाहिर है कि यह क्षेत्र साल डेढ़ साल से कमज़ोर चल रहा है, वो रफ़्तार नहीं दिखाई दे रही है। इसके पीछे कुछ हद तक नोटबंदी भी एक वजह हो सकती हैं। मंदी के समय में ब्याज दरों पर भी असर होता है और साफ़ दिख भी रहा है, लेकिन उसका एक और कारण यह भी है कि स्टेट बैंक और दूसरे सरकारी बैंक आज उस स्थिति में नहीं है कि वे ऋण दे पाएं। उनके पहले के भी ऋण वापस नहीं हुए है जिससे उनके पास पूंजी कम हो गई है।
वो आजकल ट्रेड फाइनेंस पर काम कर रहे हैं. जैसे कि किसी छोटे दुकानदार को पैसा दिया, उसका सामान आया और जब उसे पैसे मिले तो उसने बैंक का लोन वापस दे दिया। उसमें दो-तीन या छह महीने से ज़्यादा नहीं लगते हैं, जबकि किसी कंपनी के नई फैक्ट्री लगाने या नए प्रोजेक्ट के लिए दिए गए लोन को वापस मिलने में 10 साल तक लग जाते हैं। बैंक अब प्रोजेक्ट पर जोखिम नहीं ले रहे हैं। आरबीआई ने 11 बैंकों को सुधार की श्रेणी यानी प्रॉम्पट कैरेक्टिव एक्शन के तहत रखा था। कुछ बैंक इससे बाहर हो गए हैं। जो बैंक बचे हैं उनमें सुधार नहीं होता है तो लोगों का पैसा डूब सकता है। इसलिए आरबीआई कुछ बैंकों का विलय करके उन्हें चालू रखने की कोशिश करेगी। हालांकि, 2008 की मंदी बिल्कुल अलग थी। अगर रियल स्टेट पर असर देखें तो हमारे शीर्ष 6 से 8 शहरों में बहुत बड़ी संख्या ऐसे घरों की है जिनमें लोगों का पैसा अटका हुआ है। कऱीब एक लाख करोड़ रूपया फंसा हुआ है। अगर ये घर तैयार नहीं हुए तो मांग नहीं बढ़ेगी। एक बार मांग कम हो जाए तो उसे फिर से पैदा करना बहुत मुश्किल होता है।
2008 की मंदी में ये हुआ था कि बाज़ार बहुत ज़बरदस्त गिरा था। इसके अलावा उपभोक्ता बाज़ार में बहुत तेज़ी से क़ीमतें बढ़ी थीं और पेट्रोल, कच्चे तेल की क़ीमत 147 डॉलर के कऱीब पहुंच गई थी। इस कारण अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार पड़ी थी। लोगों की नौकरियां जा रही थीं। कंपनियां अपने उत्पाद कम कर रही थीं। उदाहरण के तौर पर जनरल मोटर्स ने हमर नाम की अपनी एक गाड़ी का उत्पादन 2008 के बाद बंद कर दिया। अभी देखें तो जो कंपनियां विस्तार के लिए निवेश करना चाहती हैं। उन्हें बैंक ऋण नहीं दे रहे हैं। कंपनियों में भी ये भरोसा नहीं है कि लोग उनका सामान खरीदेंगे इसलिए वो भी नई फैक्ट्रियां लगाने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। इन हालातों में अगर आज बैंक दिवालिया होता है तो लोगों की परेशानी तो बढ़ेगी ही। हालांकि, उपाय ये होता है कि दूसरा बैंक उसे खरीद लेता है ताकि लोगों पर इसके असर को कम किया जा सके ।
आर्थिक सुस्ती के कारणों पर गौर किया जाए तो मोटे तौर पर बैंक खातों को एनपीए कर फरार हो जाने वाले डिफॉल्टर भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। इसके अलावा अर्थ जगत में बढ़ता डिजिटलीकरण,जिसके चलते हर लुभावने ऑनलाइन ऑफर या पेमेंट को जनता हाथोंहाथ ले रही है। यानी खर्चे बढ़ रहे हैं, जबकि आय उतनी ही है। इस उलटफेर में बड़ी रकम में निवेश में कटौती आई है। इन कारणों पर भी गौर करना जरूरी है। -प्रेसवाणी डेस्क

press-vani
हम लोगों की बात...
press-vani ad