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जबरो करे हलाल, कठै करां गुहार

— अनिल चतुर्वेदी —
बैंकिंग सेक्टर को लेकर नागरिकों में जितना भय और आशंका इस समय देखी जा रही है, उतनी शायद ही कभी महसूस की गई हो। ये माहौल विगत कुछ वर्षों में बना है। कहा जा सकता है कि नोटबंदी के बाद से। लोगों को बैंक के साथ लेन-देन करने में बांध सा दिया गया है। बैंकिग सेवाओं पर तमाम तरह से शुल्क लगा दिए गए हैं। रकम निकासी सीमित कर दी गई है। जमाओं पर ब्याज दरें भी अस्थिर कर दी गईं हैं। बैंक बैलेंस पर जांच एजेंसियां ऐसे निगाह रखने लगी हैं, मानो सारे के सारे खाताधारक हवाला कारोबारी, सटोरिये या फिर कालाधन छिपाने वाले हों।
ऐसी जकडऩ के बाद भी दादागीरी ये कि बैंक अपने ग्राहकों का पूरा पैसा लौटाने की जिम्मेवारी से मुक्त कर दिए गए हैं। डूबने के हालात बनने पर बैंक केवल एक लाख रुपए ग्राहक को लौटाएंगे। भले ही उसकी कितनी भी रकम बैंक में जमा हो। एक लाख छोड़ सारी रकम बैंक के साथ ही डूब जाएगी। बैंकों के इस जबरेपन को सरकार ने बाकायदा कानून बनाकर शक्ति प्रदान की है। वैसे तो ये कानून बहुत पहले का है, लेकिन इस पर चर्चा ने हाल के वर्षों में जोर पकड़ा है। इसका कारण वही है—भय और आशंका।
जरा सोचिये..कोई शख्स अपनी मेहनत की कमाई बैंक में जमा करके निश्चिंत हो जाए। जमा राशि के हिसाब से अपना बजट तैयार करे, भावी मंसूबे बनाए। और अचानक, उसे गाढी कमाई डूबने का पता चले, वह भी अपने भरोसे के बैंक में। वो शख्स न तो कहीं गुहार लगा सकेगा, न ही सरकार से राहत की उम्मीद कर सकेगा। बस, ठगा सा महसूस करेगा और मन ही मन घुटता रहेगा। कमजोर दिल का हुआ तो राम को प्यारा हो जाएगा।
निर्दोष ग्राहकों के साथ बैंक की निर्दयता इससे गंभीर औऱ क्या हो सकती है? अफसोस इस बात का है कि इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था को लेकर न्यायपालिका भी मौन है। अभी तक किसी व्यक्ति अथवा संगठन की ओर से इस साफ दिखती दुव्र्यवस्था को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी गई है। वहीं, किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ने स्वपे्ररिेत संज्ञान तक नहीं लिया। वैसे तो पिद्दी-पिद्दी से मसलों पर जनहित याचिकाएं लगा दी जाती हैं, लेकिन सरकारी सुरक्षा कवच में बैंकों के कदाचार के खिलाफ किसी ने भी संजीदगी के साथ आवाज नहीं उठाई है। हम चाहेंगे कि राजस्थान हाईकोर्ट नहीं तो सुप्रीम कोर्ट ‘प्रेसवाणी’ के इस सम्पादकीय को ही संज्ञान में लेकर सरकार तथा रिजर्व बैंक से जवाब-तलब करे।
चूंकि न्यायपालिका से ही अब व्यवस्था में बड़े बदलाव की उम्मीद की जाने लगी है, इसलिए अदालत बैंकों के लिए केवाईबी (नो यॉर बैंक) जारी करना अनिवार्य करे। जिस प्रकार ग्राहकों की केवाईसी (नो यॉर कस्टमर) उन्हें परखने का पैमाना बना दी गई है, उसी तरह बैंक अपनी केवाईबी सार्वजनिक करेंंगे तो जनता को भी बैंकों की हैसियत देखकर उन्हें चुनने का विकल्प प्राप्त हो सकेगा। ग्राहकों के पैसों की सुरक्षा के लिए यह उपाय भी कारगर हो सकता है।
हमारे इस अंक में मनोरंजन के नाम पर लोगों से राठौड़ी वसूली को मुद्दा बनाया गया है। सिनेमाघरों और मल्टीप्लैक्सों में पहुंचने वाले सिने-दर्शकों को खान-पान की चीजें ऊंचे दामों पर बेची जा रही हैं। इस लूट को रोकने के प्रसाय किसी भी स्तर पर नहीं हो रहे हैं। महाराष्ट्र में अदालत की ओर से पाबंदी लगाने की पहल की गई, लेकिन शासन तंत्र की परोक्ष शह ने सिनेमाघर मालिकों को बेखौफ बना दिया है। लिहाजा दो-तीन घंटे के मनोरंजन में दर्शकों की जेब कटाई बदस्तूर जारी है। हम तो यही कहेंगे कि कम से कम कुछ समय के आनंद को अवसाद में बदलने से सभी जिम्मेदार बचें।

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हम लोगों की बात...
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