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प्रियंका गाँधी आईं हैं, वाड्रा को संग लाईं हैं

— रतनमणि लाल —
आखिरकार कांग्रेस पार्टी ने वह कर ही दिखाया जिसकी सभी लोग लम्बे समय से अपेक्षा कर रहे थे और जिसका कांग्रेस कार्यकर्ताओं को बेसब्री से इन्तजार था। राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीतिक भूमिका का आधिकारिक ऐलान हुआ और उन्हें कांग्रेस पार्टी का महासचिव नियुक्त किया गया। जिस समय यह घोषणा हुई उस समय प्रियंका विदेश में थीं, और 4 फरवरी को देश वापस आने पर सबसे पहले वे कांग्रेस कार्यलय नहीं, बल्कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के कार्यालय गईं, जहाँ उनके पति रॉबर्ट वाड्रा को उनकी विदेश-स्थित सम्पत्तित्यों के सिलसिले में पूछताछ के लिए बुलाया गया था।
प्रियंका की नई भूमिका की घोषणा 23 जनवरी को एक वक्तव्य में दी गई, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि प्रियंका यह जिम्मेदारी फरवरी में ही संभालेंगी। उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (ए.आई.सी.सी.) के महासचिव के रूप में पूर्वी उत्तर प्रदेश की विशिष्ट जिम्मेदारी दी गई। इस जानकारी के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के कार्यालयों और कार्यकर्ताओं में एक अजीब सा जोश और उत्साह छा गया। लगा कि उनकी पार्टी को अगला लोक सभा चुनाव जीतने का अकाट्य मंत्र मिल गया है। यह बात अलग है कि अभी तक प्रियंका केवल अमेठी व रायबरेली में ही प्रचार करती रही हैं और पार्टी कार्यकर्ताओं की तमाम मांगों के बावजूद वे प्रदेश या देश के किसी भी अन्य स्थान पर प्रचार करने नहीं गईं। प्रियंका की ओर से बार-बार यही कहा गया कि वे अमेठी व राय बरेली केवल अपने परिवार के साथ खड़े होने जाती हंै।

ढलान पर पार्टी
सच तो यह है कि इन दोनों स्थानों पर लगातार जीत के बावजूद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पिछले बीस वर्षों से लगातार ढलान पर है। पार्टी प्रदेश की राजनीति में कोई बड़ी भूमिका नहीं निभा रही है,क्योंकि लोकसभा या विधानसभा में उसके ज्यादा सदस्य नहीं हैं। जहां लोकसभा में पार्टी के केवल दो सदस्य आए। अमेठी से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल और रायबरेली से पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी। वहीं विधान सभा में कांग्रेस के विधायकों की संख्या मात्र सात है, जबकि 2017 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस पार्टी ने सपा के साथ गठबंधन में लड़ा था। उस समय राहुल और सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा ‘युवा शक्ति’ का प्रतीक बताए गए इस गठबंधन को चुनाव में भाजपा से करारी हार मिली थी। उस समय भी कांग्रेस के भीतर इस गठबंधन के खिलाफ आवाज उठी थी और प्रियंका को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग कार्यकर्ताओं ने जोर शोर से उठाई थी, परन्तु ऐसा हुआ नहीं।

सकारात्मक असर
कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं कि महिलाओं, पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों के बड़े हिस्से पर प्रियंका की उपस्थिति से सकारात्मक असर पड़ेगा। प्रियंका के व्यक्तित्व, इंदिरा गांधी से तुलना और लोगों से आसानी से घुलमिल जाने की वजह से उनकी चुनाव प्रचार सभाओं में भीड़ बढऩे की पूरी सम्भावना है। कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में वैसे भी चुनाव प्रचार के लिए कोई लोकप्रिय चेहरा नहीं है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राज बब्बर व अन्य राज्य स्तरीय नेता स्थानीय राजनीतिक जोड़-तोड़ में ही व्यस्त रहते हैं, जिसकी वजह से पार्टी में कोई सक्रिय गतिविधि नहीं दिखती। ऐसे में स्थानीय नेताओं को काम करने के स्पष्ट निर्देश मिल सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों मंव प्रियंका ने पार्टी के लिए कुछ खास मौकों पर निर्णायक भूमिका निभाई है और अब उनकी उपास्थिति की वजह से प्रदेश में पार्टी में आन्तरिक अनुशासन सुधर सकता है। यही नहीं, पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रत्याशियों के चयन में भी प्रियंका का निर्णय मायने रखेगा, हालांकि पार्टी की ओर से ऐसे संकेत दिए गए हैं कि अंतिम निर्णय पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी का ही होगा। ऐसा इसलिए किया गया है जिससे प्रियंका को पार्टी में एक अतिरिक्त शक्ति केंद्र (पॉवर सेंटर) के रूप में न देखा जाए, बल्कि पार्टी के आन्तरिक ढाँचे का हिस्सा ही माना जाए।
जहां तक सपा-बसपा गठबंधन का प्रश्न है, प्रियंका की वजह से दोनों ही दलों में हलचल है और कांग्रेस को बाहर रखने के निर्णय पर पुनर्विचार किया जा रहा है। सीटों को लेकर इन दोनों दलों की आपसी सहमति और कांग्रेस के प्रति उनके रुख पर भी दोबारा विचार किया जा सकता है। यदि कांग्रेस लोक सभा चुनाव में अपनी सीटों की संख्या कुछ भी बढ़ा पाती है तो इसका श्रेय प्रियंका को ही मिलेगा और पार्टी सपा-बसपा को यह संकेत देने में सफल होगी कि 2022 के विधानसभा चुनाव में उसे हलके में नहीं लिया जा सकता।

सिंधिया के समान ही जिम्मेदारी
लम्बे समय से उत्तर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं की निष्क्रियता भारी पड़ सकती है। ऐसे नेता पिछले कई सालों से अपने जिलों तक में कोई प्रभाव बना पाने में असमर्थ रहे हैं। चर्चा है कि कई वरिष्ठ राज्य-स्तरीय नेताओं को अपने जिलों में कांग्रेस प्रत्याशी को जिताने या उन्हें स्वयं चुनाव लडऩे की जिम्मेदारी दी जा सकती है, जैसा राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में राहुल के निर्देशानुसार किया गया था। इन राज्यों में इस प्रयोग के सफल परिणाम आने के बाद उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही किए जाने की उम्मीद है लेकिन उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा ने पिछले दो दशकों में गहरी जड़ें जमाई हैं और भाजपा ने भी अपना प्रभाव पूरे प्रदेश में बनाया है। ऐसे में प्रियंका की नई भूमिका के बाद भी कांग्रेस को कौन से और कितने जिलों में अपना जनसमर्थन मजबूत करने में सफलता मिलेगी, यह विचारणीय है।
उत्तर प्रदेश के लिए पहली बार कांग्रेस पार्टी द्वारा पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों का प्रभार दो अलग लोगों को दिया गया है और पश्चिमी क्षेत्र के लिए मध्य प्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया को महासचिव बनाया गया है। जहां पूर्वी उत्तर प्रदेश के नेता और संभावित प्रत्याशी यह उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी समस्याओं और दावेदारी पर प्रियंका अंतिम निर्णय लेंगीं, वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शायद ऐसा न हो पाए। जिस तरह दिल्ली स्थित कांग्रेस पार्टी कार्यालय में राहुल के कमरे के बगल वाले कमरे पर पहले प्रियंका के नाम की पट्टिका लगाईं गई और उसके थोड़ी देर बाद ही उसी कमरे के दोनों ओर प्रियंका व ज्योतिरादित्य सिंधिया के नामों की अलग-अलग पट्टिकाएं लगाई गई, उससे स्पष्ट है कि कांग्रेस पार्टी यही सन्देश देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश के लिए इन दोनों की जिम्मेदारी और कद बराबर है और राहुल गाँधी की बहन होने का प्रियंका को कोई लाभ नहीं दिया जा रहा है।

वाड्रा पहली प्राथमिकता
प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा पर कई मामलों में आरोप लगे हैं और इन आरोपों को लेकर भाजपा कांग्रेस पर हमलावर बनी रहती है। स्पष्ट है कि वे नहीं चाहती होंगी कि उनके पति की वजह से पार्टी को कोई राजनीतिक नुकसान हो, लेकिन अब, जब उन्हें एक बड़ी भूमिका दे ही दी गई है, तब रॉबर्ट वाड्रा के मामले पर पीछे रहने का विकल्प तो उपलब्ध ही नहीं है। राहुल गाँधी कह भी चुके हैं कि अब उनकी पार्टी आगे बढ़ कर ही मुकाबला करेगी और ‘बैकफुट’ पर नहीं खेलेगी। देखना यह है प्रियंका अपने पति का साथ देते हुए ज्यादा दिखना चाहेंगी, या उत्तर प्रदेश और देश में अन्यत्र कांग्रेस पार्टी के लिए कुछ जिम्मेदारी निभाते सामने आएंगी।
लखनऊ में चला उत्सव-रुपी ‘रोड शो’
कांग्रेस पार्टी में नए पद पर नियुक्ति के बाद पहली बार प्रियंका, अपने भाई राहुल और उत्तर प्रदेश में पश्चिमी क्षेत्र के पार्टी महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ सोमवार 11 फरवरी को लखनऊ आईं। पहले उनका लखनऊ आगमन 4 फरवरी को अपेक्षित था। जैसी उम्मीद की जा रही थी, प्रियंका के आगमन को एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया गया और हवाई अड्डे से यूपीसीसी के दफ्तर तक उनका काफिला एक ‘रोड शो’ के रूप में चला। पूरे रास्ते को कांग्रेस के झंडों, झंडियों, पोस्टर और बैनर से सजाया गया था और लोग भी उनको देखने और सुनने को उत्सुक दिखे लेकिन संक्षिप्त भाषण केवल राहुल ने ही दिया। शाम को कांग्रेस कार्यालय में एक बैठक की जानी थी, लेकिन शाम को ही प्रियंका जयपुर के लिए रवाना हो गईं, जहां उनके पति रॉबर्ट को ईडी के दफ्तर में पूछताछ के लिए बुलाया गया था।

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