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छाया राजनीतिक कुहासा

— अशोक मलिक —
पंजाब में इन दिनों राजनीतिक सुस्ती छाई हुई है। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में अंदरूनी कलह मची है। विपक्षी दल बेजान दिख रहे हैं। उनमें अपनी भूमिका को लेकर असमंजस की स्थिति है। ऐसे में प्रदेश की राजनीति से हलचल गायब हो गई है। जनता इसका खामियाजा भुगतने को मजबूर है।
प्रदेश के सत्ताधारी-मंत्री, विधायक और नेताओं में असंतोष साफ झलक रहा है। विधायकगण सरकार के मंत्रियों को नकारा बता रहे हैं तो मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को कमजोर नेतृत्व वाला साबित करने में लगे हैं। विधायकों में गुटबाजी भी हावी हो चली है। सरकार के शुरुआती दिनों में क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू मंत्री होकर भी अपने राज के खिलाफ सुर बुलंद किए हुए थे। उनकी बिदाई के बाद कई कांग्रेस विधायकों ने बागी तेवर अपना लिए हैं। सिद्धू मंत्रीपद त्यागने के बाद से वैसे तो सियासी मंच से गायब हो गए हैं, लेकिन पर्दे के पीछे उनकी कारसेवा जारी हैं। वो कांग्रेस आलाकमान से नजदीकी बनाकर प्रदेश सरकार की कमजोरियां गिनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। पार्टी में अंदरूनी कलह के चलते सरकार के निराशाजनक प्रदर्शन पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ अब मंत्रिमंडल में बदलाव की आवश्यकता व्यक्त करने लगे हैं।
हालात ये हो चले हैं कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने चुनाव पूर्व जनता से जो वादे किए थे, उन्हें सरकार बनने के ढाई साल बाद भी पूरे नहीं कर पाए हैं। विपक्षी अकाली दल के नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल के रिश्तेदार प्रदेश के वित्त मंत्री मनप्रीत बादल सरकार की विफलता के लिए वित्तीय संकट की आड़ लेकर खुद को बचाने की कोशिश में लगे हैं। वैसे वे खुद इस संकट से उबरने के कोई ठोस उपाय आजतक नहीं कर पाए हैं।
मुख्यमंत्री चूंकि पटियाला राजघराने से ताल्लुक रखते हैं, इसलिए उनका अंदाज भी शाही बना हुआ है। राजधानी चंडीगढ़ में उनका मन नहीं लगता। ज्यादातर पटियाला के अपने राजमहल में समय बिताते हैं। चंडीगढ़ में रहते हैं तो अपने बंगले या पंजाब सरकार के गेस्ट हाउस में सरकार चलाते हैं। मंत्रिमंडल की बैठकें तक उनके बंगले पर होती हैं। सचिवालय स्थित मुख्यमंत्री कार्यालय तो कैप्टन महीने में एकाधाबार ही जाते हैं। उनकी बढ़ती उम्र तथा कार्यशैली दोनों से ही नहीं लगता कि वो प्रदेश की सेवा के लिए तत्पर हैं। इसीलिए पार्टीजन उनसे नाराज हैं, लेकिन जनता के बीच पूरी सरकार में सिर्फ उनकी ही छवि अच्छी बनी हुई है।
प्रदेश सरकार के पोचे प्रदर्शन के बावजूद विपक्षी दल - अकाली, भाजपा तथा आम आदमी पार्टी, मौके का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं। वे भी भीतरी मतभेद का शिकार होकर बेजान दिखने लगे हैं। मुख्य विपक्षी दल आप विभिन्न गुटों में बंट गया है। इस कारण पार्टी विधायकों में आपसी तालमेल नहीं बैठ पा रहा है। पार्टी जनमुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन तक खड़ा नहीं कर पाई है। अकाली दल-भाजपा गठबंधन की भी हालत बेहतर नहीं कही जा सकती है। अकाली दल ने एक-दो मौकों पर अमरिंदर सरकार के खिलाफ आवाज जरूर उठाई, लेकिन उससे जनता को जोडऩे में पार्टी नाकाम साबित हुई है। तीनों विपक्षी दल इस समय केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो गए हैं। कोई ठोस एजेंडे के अभाव में वे टाइम-पास करते नजर आ रहे हैं। पंजाब के लोगों ने बड़ी उम्मीद के साथ अकाली दल-भाजपा के बंधन को दरकिनार करते हुए कांग्रेस को बहुमत दिया था पर अब वे निराशा के दौर से गुजर रहे हैं। क्योंकि कांग्रेस सरकार ढुलमुल गति से चल रही है और भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है।

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