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राजस्थान के नतीजों पर नजर

- राजेन्द्र बोड़ा -
चार महीनों के अंतराल में राजस्थान दूसरी बड़ी चुनावी जंग की गिरफ्त में है। पिछले दिसंबर में राजस्थान के मतदाताओं ने अपनी विधानसभा के सदस्यों को चुनने के लिए वोट दिया था और अब वे लोकसभा में अपने प्रतिनिधि भेजने के लिए मतदान करेंगे। राजस्थान में मोटे तौर पर दो ही प्रमुख राजनीतिक दलों भारतीय जनता पार्टी तथा कांग्रेस में शासन के लिए पिछले काफी समय से प्रतिद्वंद्विता चलती आई है। यही प्रतिद्वंदिता हमने गत दिसंबर में राज्य विधानसभा के चुनावों में देखी थी और वही इन लोकसभा चुनावों में भी देख रहे हैं। राजस्थान में लोकसभा के मौजूदा चुनाव अत्यंत ही दिलचस्प परिस्थिति में हो रहे हैं। राज्य में कांग्रेस का नया-नया शासन है। वहीं केंद्र में यह पार्टी, 2014 ले लोकसभा चुनावों में हाशिये पर आ गई थी, सो वहां फिर से अपना वजूद बनाने के लिए जूझ रही है। केंद्र में बड़े बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में शासन चला रही एनडीए नया जनादेश पाने के लिए मतदाताओं के समर्थन की तलबगार है। परंतु मामला बहुत सीधा नहीं है। राज्य विधानसभा में हाल ही मामूली बहुमत से शासन में बैठी कांग्रेस, जो पिछले लोकसभा चुनावों में राज्य की सभी 25 सीटें भाजपा से हार गई थी, के सामने यह साबित करने की चुनौती है कि वह फिर से उठ खड़ी हुई है। उसे अपनी खोई प्रतिष्ठा पुन: हासिल करनी है। दूसरी तरफ, हाल के विधानसभा चुनाव में 2013 की जबर्दस्त जीत का वैभव दुहराने में नाकामयाब रही भाजपा की प्रतिष्ठा भी दांव पर है।
अपनी-अपनी प्रतिष्ठाओं को बचाने के लिए चुनावी दंगल में उतरी दोनों पार्टियों को हम वे सारे पैंतरे खेलते देख सकते हैं जो मतदाताओं को लुभाने के लिए राजनीतिक दल खेल सकते हैं। इन चुनावों में जो सबसे बड़ा पैंतरा चल रहा है, वह है नेताओं का एक दूसरे को नीचा दिखाने का, उनका मखौल उड़ाने का और झूठी-सच्ची कहानियां कहने का। राजनेताओं का दूसरा पैंतरा है मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने का कि उनका'राजÓआया तो अमुक मात्रा में नकदी लोगों को बिना कोई काम किए सीधे मिल जाया करेगी। वैचारिक आर्थिकी को राजनैतिक दलों ने समेट कर गंगा नदी में बहा दी है। भारतीय समाज में जातियां एक सच्चाई है। बावजूद सामाजिक सुधारों की बड़ी पहलों के देश में जाति विहीन समाज नहीं बन पाया है। चुनाव में चूंकि मतदाताओं की संख्या गिनी जाती है, इसलिए जातियों के आधार पर मतदाताओं के समूह राजनीतिक सौदेबाजी के आधार बनते हैं। इस बार भी राजस्थान में दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दल लोकसभा चुनावों के दौरान अन्य पैंतरों के साथ ही जातियों की गोटियां भी बिठा रहे हैं। इस खेल में भाजपा ने तो लोकसभा की एक सीट पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की नापसंदगी को नकारते हुए जाट नेता हनुमान बेनीवाल के लिए छोड़ दी और उसकी अपनी व्यक्तिगत राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक पार्टी को एनडीए के गठबंधन का सदस्य बना लिया। भले ही उनके साथ आने वाला नेता यदि बात बन जाती तो कांग्रेस के साथ जाने को भी तैयार था। कांग्रेस भी बाहर के लोगों को अपनाने में अपने सारे उसूल छोड़ चुकी है।
पतझड़ के मौसम में कोई पत्ता हवा के किस झोंके की तरफ सरक जाएगा,यह नहीं कहा जा सकता वैसे ही चुनावों में कौन सा नेता अपना रुतबा बनाए रखने के लिए किस पार्टी का दामन थाम लेगा, यह भी नहीं कहा जा सकता। इन चुनावों में कुछ खाटी नेताओं को पाला बदलते हुए हम ने देखा है। पिछली भाजपा सरकार की मुखिया वसुंधरा राजे को पानी पी-पीकर कोसने वाले हनुमान बेनीवाल इस चुनाव में भाजपा के ही नागौर में खेवनहार बन गए।
हिंदुत्ववादी विचारधारा में दीक्षित और पनपे भाजपा के घनश्याम तिवाड़ी, जिनका सारा राजनैतिक आधार कांग्रेस के वैचारिक विरोध पर खड़ा हुआ, उन्हें प्रदेश कांग्रेस के मुख्यालय में उस पार्टी के कसीदे पढ़ते हुए देखना व सुनना दिलचस्प रहा, जिसको वे हमेशा कोसा करते थे।
वहीं, गुर्जरों को रेहड़ी की तरह हांक कर उन्हें रेल की पटरियों तथा सड़कों पर लाने वाले किरोड़ी सिंह बैंसला दूसरी बार भाजपा में दाखिल हुए तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। साथ में वे अपने बेटे को भी ले कर आए जिसके लिए वे आगे की राजनीतिक गोटिया खेलेंगे।
बैंसला अपने बेटे का राजनीतिक भविष्य बनाने की कोशिश में हैं तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी अपने बेटे को इन चुनावों में कांग्रेस की राजनीति में ठीक से स्थापित करने के प्रयास में लगे नजर आए। जब वैभव गहलोत को जोधपुर से चुनावी रण में उतारा गया। भाजपा नेता वसुंधरा राजे अपने बेटे दुष्यंत सिंह को संसद में तीन बार जितवा कर पहले ही उसे आधार दे चुकी है। दुष्यंत सिंह इन चुनावों में झालावाड़ से चौथी बार फिर मैदान में हैं।
इस बार के चुनाव भारतीय राजनीति के उस नए पक्ष को भी उजागर करते नजर आते हैं, जिसमें राजनीति में वैचारिक आर्थिक दर्शन तिरोहित हो चुका है तथा वह जन-सेवा की बजाय व्यवसाय या कारोबार का रूप ले चुका है। जातियों की दृष्टि से देखें तो राजस्थान में चुनावी राजनीति पारिवारिक विरासत बनी रही है। इसका परिचय इन चुनावों में फिर खुल कर हमारे सामने हैं। अजमेर से कांग्रेस उम्मीदवार रिजु झुंझुनवाला अचानक सामने आए हैं जो पूर्व मंत्री बीना काक के दामाद हैं। चूरू से पूर्व विधायक मकबूल मंडेलिया के बेटे रफीक मंडेलिया, कभी कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे रामदेव सिंह महरिया के भतीजे सुभाष महरिया (सीकर), विधायक मुरारीलाल मीणा की पत्नी सविता मीणा (दौसा), आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के लिए राजस्थान में एकमात्र सीट जीतने वाले नाथूराम मिर्धा की पोती ज्योति मिर्धा (नागौर) और पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के बेटे मानवेन्द्र सिंह (बाड़मेर) अपनी अपनी पारिवारिक विरासत संभालने की जुगत में हैं। ये दृष्टांत बताते हैं की किस प्रकार सामाजिक और जातीय समीकरणों के चलते घराने राजनीतिक दलों से बड़े हो जाते हैं।
चुनावी मुद्दों की बात करें तो वे सिर्फ मीडिया की सुर्खियों में हैं। राजनीतिक दलों ने अपने घोषणा पत्रों में वादों के अंबार लगाए हैं,मगर येन केन प्रकरेण मुद्दा प्रधान मंत्री मोदी पर सीमित हो कर रह गया है। कांग्रेस का सारा चुनाव प्रचार इस बात पर सिमट गया है कि मोदी हटाओ। मोदी को'चोरÓ साबित करने के लिए कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपना सारा अमला झोंक दिया है। उधर भाजपा'मोदी है तो देश सुरक्षित हैÓके लिए समर्पित हो चुकी है।
राजस्थान के मतदाता छह तथा 19 मई को अपना फैसला ईवीएम मशीनों में दर्ज करेंगे। चुनाव प्रचार की रंगत और चहल पहल मीडिया और सोशल मीडिया में अधिक छाई हुई है क्योंकि नई यंत्र तकनीक ने प्रचार के लिए आभासी दुनिया में एक विशाल स्पेस मुहैया कराया है और दो प्रमुख राजनीतिक दल राजस्थान में भी उसका भरपूर उपयोग कर रहे हैं।

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